पश्चिम बंगाल में पहली बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार बनने से केंद्र सरकार द्वारा राज्य में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को गति दिए जाने की संभावना है। इनमें से कई खास तौर पर रेलवे से संबंधित परियोजनाएं भूमि अधिग्रहण से जुड़ी समस्याओं के कारण अटकी हुई हैं।
भाजपा ने शुभेंदु अधिकारी को राज्य का नया मुख्यमंत्री चुना है। उन्होंने अपने चुनावी घोषणा पत्र में राज्य के लिए मल्टीमोडल लॉजिस्टिक समाधान का वादा किया था ताकि तटीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जोड़ा जा सके।
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि कुछ विभागों ने राज्य में अटकी परियोजनाओं की सूची तैयार की है। रेलवे ने ऐसे 17 परियोजनाओं की पहचान की है जो लंबे समय से अटके हुए थे और जिनकी प्रगति पर कोई निगरानी नहीं रखी जा रही थी।
अधिकारी ने बताया कि 4,000 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैली और लगभग 4,500 करोड़ रुपये की लागत वाली इन परियोजनाओं पर फिर से काम शुरू किया जाएगा।
रेलवे करीब 12 ऐसी परियोजनाएं भी अपने हाथ में लेगा जिन्हें पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है लेकिन केंद्र सरकार अभी तक उनके लिए जमीन हासिल नहीं कर पाई है। संसद में रेल मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार शिवोक-रंगपो लाइन को छोड़कर, रेलवे बाकी 11 परियोजनाओं में एक हेक्टेयर भूमि का भी अधिग्रहण नहीं कर पाया है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की नवीनतम मासिक रिपोर्ट के अनुसार राज्य में वर्तमान में 84 केंद्रीय परियोजनाएं चल रही हैं। विभिन्न बुनियादी ढांचा मंत्रालयों की इन परियोजनाओं की अनुमानित लागत 1.5 लाख करोड़ रुपये है और इनकी लागत पहले ही लगभग 14,000 करोड़ रुपये बढ़ चुकी है। हालांकि कोयला और बिजली परियोजनाओं के पूरा होने की समय-सीमा में महत्त्वपूर्ण बदलाव हुआ है मगर लागत में कोई वृद्धि नहीं हुई है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ी हुई लागत का बड़ा हिस्सा रेलवे से जुड़ा है, जिसकी अनुमानित लागत 49,559 करोड़ रुपये से बढ़कर 60,771 करोड़ रुपये हो गई।
ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में कई परियोजनाओं में 10 साल तक की देरी देखी गई है, जिसमें एक बिजली परियोजना की लागत में इस अवधि में दोगुनी होकर 2800 करोड़ रुपये पहुंच गई।
इनमें से कई परियोजनाएं विशेष रूप से रेलवे द्वारा भूमि की कमी के कारण अटकी हुई हैं। केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के बीते समय में राज्य में परियोजनाओं की प्रगति की कमी को लेकर तृणमूल कांग्रेस के पश्चिम बंगाल के सांसदों के साथ तीखी बहस हुई हैं।
संसद में एक सवाल के जवाब में वैष्णव ने कहा था कि रेलवे को 4,662 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता थी, जिसमें से पश्चिम बंगाल सरकार (तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार) केवल 27 फीसदी ही दे पाई है।
कोलकाता मेट्रो में भी परियोजना की गति में तेजी आने की संभावना है। यह भारतीय रेलवे द्वारा संचालित भारत की एकमात्र मेट्रो रेल प्रणाली है और इसमें अतीत में धीमी प्रगति देखी गई है।
रेल मंत्रालय ने कहा था, ‘लगभग 52 किमी की कुल लंबाई के 4 मेट्रो गलियारों से संबंधित कार्य प्रगति पर है, जिसमें से 20 किमी कार्य भूमि अधिग्रहण और अन्य मुद्दों के कारण रुका हुआ है। बाकी मेट्रो खंड में काम प्रगति पर है लेकिन राज्य सरकार की ओर से कई मामलों में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।’अधिकारियों को 25,000 करोड़ रुपये के प्रस्तावित गहरे समुद्र वाले ताजपुर बंदरगाह परियोजना में भी कुछ तेजी आने की उम्मीद है। इस परियोजना में पहले कई बड़ी कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई थी। पश्चिम बंगाल की तत्कालीन सरकार ने परियोजना के लिए अभिरुचि पत्र आमंत्रित की लेकिन फिर निविदा रद्द कर दी गई।