Middle East Tensions: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब भारतीय बाजारों पर भी दिखने लगा है। आईसीआईसीआई बैंक ग्लोबल मार्केट की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले हफ्ते बॉन्ड की ब्याज दरों में थोड़ी गिरावट आई थी, लेकिन हफ्ते की शुरुआत में हालात बदल गए। तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं और दुनिया में अनिश्चितता बढ़ी, जिसके कारण सोमवार को बॉन्ड यील्ड फिर ऊपर चली गई। बाजार को डर है कि अगर यह तनाव लंबा चला, तो असर सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
पिछले हफ्ते बॉन्ड बाजार को आरबीआई गवर्नर के बयान से राहत मिली थी। उन्होंने कहा था कि बाजार में पर्याप्त नकदी बनी रहेगी। साथ ही यह चर्चा भी थी कि जरूरत पड़ने पर आरबीआई बाजार से सरकारी बॉन्ड खरीद सकता है। नई जीडीपी सीरीज में नॉमिनल जीडीपी के आंकड़े कम आने से भी ब्याज दरों में नरमी की उम्मीद बढ़ी थी। इन सब कारणों से बॉन्ड यील्ड नीचे आई थी। लेकिन जैसे ही पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा, बाजार का रुख तुरंत बदल गया और यील्ड फिर चढ़ने लगी।
रिपोर्ट कहती है कि तेल महंगा होने का सीधा असर रुपये, महंगाई और आर्थिक बढ़त पर पड़ता है। उदाहरण के तौर पर 2005 से 2014 के बीच जब कच्चा तेल औसतन 82 डॉलर प्रति बैरल रहा, तब महंगाई भी ऊंची रही और औसतन करीब 8.7 प्रतिशत तक पहुंची। वहीं 2015 से 2025 के दौरान तेल की औसत कीमत घटकर 69 डॉलर रही, तो महंगाई भी कम होकर करीब 5 प्रतिशत रही। बैंक का अनुमान है कि अगर तेल की कीमत 10 डॉलर प्रति बैरल और बढ़ती है, तो खुदरा महंगाई में करीब 0.50 से 0.60 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि जब तक तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास नहीं पहुंचता, तब तक आर्थिक विकास पर बड़ा असर पड़ने की संभावना कम मानी जा रही है।
तेल की कीमत बढ़ते ही रुपये पर दबाव बढ़ गया है। वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में निवेशक सुरक्षित निवेश की ओर बढ़ते हैं, जिससे डॉलर मजबूत हो जाता है और रुपये पर असर पड़ता है। हालांकि पिछले हफ्ते विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने करीब 0.7 अरब डॉलर का निवेश किया, जिससे रुपये को कुछ सहारा मिला। आरबीआई ने भी बाजार में दखल देकर उतार चढ़ाव को काबू में रखने की कोशिश की। फिर भी पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच रुपये में कमजोरी की आशंका बनी हुई है।
हाल ही में 10 साल के सरकारी बॉन्ड की नीलामी में मांग ठीक रही और सरकार ने तय 320 अरब रुपये जुटा लिए। यानी निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है। लेकिन दूसरी तरफ राज्यों ने अपने बॉन्ड के जरिए तय कार्यक्रम से ज्यादा कर्ज उठाया है। इससे राज्यों के बॉन्ड और केंद्र के सरकारी बॉन्ड की ब्याज दरों के बीच का अंतर और बढ़ सकता है। यह इस बात का संकेत है कि बाजार में कर्ज लेने का दबाव धीरे धीरे बढ़ रहा है।
फिलहाल बैंकिंग सिस्टम में करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी है। हफ्ते की शुरुआत में जीएसटी भुगतान की वजह से थोड़ी नकदी बाहर गई थी, लेकिन महीने के आखिर में सरकार के खर्च बढ़ने से हालात फिर बेहतर हो गए। रिपोर्ट कहती है कि अगर विदेशी निवेशक पैसा निकालने लगते हैं, तो यह अतिरिक्त नकदी जल्दी घट सकती है। ऐसे में जरूरत पड़ने पर आरबीआई को बाजार में और पैसा डालकर स्थिति संभालनी पड़ सकती है।
आईसीआईसीआई बैंक का कहना है कि फिलहाल बाजार में सावधानी का माहौल बना रहेगा। तेल की ऊंची कीमतें और वैश्विक तनाव के कारण शेयर और बॉन्ड बाजार पर दबाव रह सकता है। बैंक का अनुमान है कि 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड निकट अवधि में 6.60 से 6.80 प्रतिशत के बीच रह सकती है। अगर पश्चिम एशिया में तनाव जल्दी थम जाता है तो बाजार को राहत मिल सकती है। लेकिन अगर हालात और बिगड़ते हैं तो रुपये पर दबाव बढ़ेगा, महंगाई का खतरा बढ़ सकता है और बॉन्ड यील्ड भी ऊपर जा सकती है।
कुल मिलाकर यह सिर्फ एक क्षेत्रीय टकराव नहीं है। इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था, रुपये की मजबूती और बाजार की दिशा पर पड़ सकता है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि यह संकट कितने समय तक चलता है और तेल की कीमतें कितनी ऊपर जाती हैं।