श्रम संहिताओं और राज्य स्तर के शॉप ऐंड स्टैब्लिशमेंट ऐक्ट के प्रमुख प्रावधानों के बीच टकराव से कानून के अनुपालन को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बन रही है। श्रम विशेषज्ञों का कहना है कि काम के घंटे, ओवरटाइम, छुट्टी और छुट्टी के बदले नकदी जैसे प्रमुख प्रावधानों को लेकर दोनों कानूनों के बीच ओवरलैपिंग के कारण कंपनियों में अनिश्चितता बनी रहेगी।
केंद्र और राज्य दोनों स्तरों के कानूनों के समानांतर लागू होने से यह समस्या उत्पन्न हो रही है, जहां राज्य रोजगार के प्रमुख पहलुओं पर नियम बनाते रहते हैं। श्रम संहिताएं एक व्यापक ढांचा प्रदान करती हैं, वहीं राज्य कानूनों में भिन्नता के कारण अलग-अलग सीमाएं और शर्तें निर्धारित हैं। इसके कारण कंपनियों, खासकर कई राज्यों में काम करने वाली कंपनियों को एक साथ कई मानकों का पालन करना पड़ रहा है।
शार्दूल अमरचंद मंगलदास ऐंड कंपनी की पार्टनर पूजा रामचंदानी ने कहा, ‘श्रम संहिताओं और स्टेट शॉप्स लेजिस्लेशन के दोहरे अनुपालन की अनिश्चितता अभी भी जारी है। काम के घंटे, ओवरटाइम, छुट्टी और उसके नकदीकरण से संबंधित मामलों में श्रम संहिताओं के तहत अलग-अलग प्रावधान हैं। इसकी वजह से अनुपालन लागतमें बढ़ोतरी होगी या अनुपालन न होने का जोखिम बढ़ जाएगा।’
शॉप्स ऐंड स्टैब्लिशमेंट्स ऐक्ट राज्यों की जरूरत के मुताबिक बने श्रम कानून हैं। इनसे कार्यालयों, दुकानों और रेस्तरां जैसे वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों में काम करने की परिस्थितियों को नियंत्रित किया जाता है। इनमें काम के घंटे, ओवरटाइम, छुट्टी जैसे क्षेत्र शामिल हैं। चूंकि प्रत्येक राज्य अपने नियम निर्धारित करता है, इसलिए ये कानून अक्सर अधिकार क्षेत्रों में भिन्न होते हैं, जिनमें काम के घंटे, ओवरटाइम, छुट्टी, खुलने और बंद होने के समय, और रोजगार की शर्तें शामिल होती हैं।
ईवाई इंडिया में पीपल एडवाइजरी सर्विसेज (टैक्स) के पार्टनर पुनीत गुप्ता ने कहा कि एक प्रमुख चिंता व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति संहिता, 2020 (ओएसएच कोड) और स्टेट शॉप ऐंड स्टैब्लिशमेंट ऐक्ट के बीच टकराव की है। यह संहिता विशेष रूप से श्रम कानूनों के तहत परिभाषित श्रमिकों पर लागू होती है, जबकि राज्य अधिनियम अपने स्वयं के परिभाषाओं के आधार पर कर्मचारियों या श्रमिकों पर लागू होते हैं, जो कवरेज, बहिष्करण और वेतन सीमाओं के मामले में राज्यों में व्यापक रूप से भिन्न होते हैं।
इस मामले से अवगत लोगों के अनुसार उद्योग संघों ने श्रम मंत्रालय के समक्ष यह चिंता जताई है और स्पष्टीकरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। पीडब्ल्यूसी इंडिया में पार्टनर और रेगुलेटरी ऐंड बिजनेस सॉल्यूशंस के लीडर अंकुर जैन ने कहा, ‘श्रम संहिता में प्रतिदिन 8 घंटे और प्रति सप्ताह 48 घंटे काम करने का प्रावधान है, जिसमें स्प्रेड-ओवर (काम शुरू करने और समाप्त करने के बीच का समय) में लचीलापन है, वहीं कई राज्यों के शॉप्स ऐंड स्टैब्लिशमेंट ऐक्ट में इस समय सख्त दैनिक सीमा या अधिक प्रतिबंधात्मक स्प्रेड-ओवर शर्तें निर्धारित हैं।’