भारत को लंबे समय तक ऊर्जा की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। इसका असर उद्योग पर पड़ेगा। इसकी सबसे ज्यादा मार विनिर्माण और निर्माण उद्योग पर पड़ेगी। क्रिसिल ने अपनी रिपोर्ट में इंगित किया कि मौजूदा वित्त वर्ष पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लागत दबाव के कारण वृद्धि धीमी होगी और उत्पादक के मार्जिन पर दबाव पड़ने की उम्मीद है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भूराजनीतिक दबाव कम होने के बावजूद ऊर्जा की आपूर्ति धीरे-धीरे सामान्य होने की उम्मीद है। इसका कारण संचालन में रुकावटें और जोखिम की आशंका से बचने की प्रवृत्ति हो सकती है। क्रिसिल ने चेतावनी दी है कि भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि वित्त वर्ष 27 में सुस्त होकर 6.6 प्रतिशत होने की उम्मीद है जबकि यह वृद्धि बीते वर्ष 7.7 प्रतिशत थी। ऊर्जा की अधिक लागत और इनपुट लागत बढ़ने से वित्त वर्ष 27 की जीडीपी में सुस्ती की उम्मीद है। इसमें गिरावट का जोखिम ज्यादा है।
उसने कहा, ‘उद्योग, कृषि और सेवाओं की एक अनिवार्य लागत तेल व गैस के उच्च दामों ने उत्पादकों के लिए लागत दबाव को बड़ा दिया है। यह दबाव कुछ क्षेत्रों में ग्राहकों पर डाला जाएगा। हालांकि कुछ अन्य क्षेत्रों के उत्पादकों का मार्जिन कम हो सकता है। इन दोनों ही कारकों से मौजूदा वित्त वर्ष की जीडीपी सुस्त होने की आशंका है।’
उत्पाद की लागत में प्राकृतिक गैस की 1 प्रतिशत हिस्सेदारी की तुलना में कच्चा तेल व पेट्रोलियम उत्पाद की कहीं अधिक हिस्सेदारी 8.4 प्रतिशत है। इससे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर ज़्यादा और व्यापक होता है। इस मामले में क्रिसिल ने बताया, ‘प्राकृतिक गैस की तुलना में कच्चे तेल की चिंताएं अधिक लंबे समय तक रहने की आशंका है।’
रिपोर्ट में कहा गया है कि लैंड ट्रांसपोर्ट, माइनिंग, केमिकल्स और प्लास्टिक जैसे प्रमुख इनपुट क्षेत्र सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं और ये क्षेत्र मूल्य श्रृंखला में गहराई से जुड़े होते हैं। इससे पूरी अर्थव्यवस्था पर लगात का दबाव बढ़ सकता है। विनिर्माण, निर्माण और खनन क्षेत्र में 40 प्रतिशत ईँधन की लागत और संबंधित इनपुट से जुड़ी होती हैं। इससे वे कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के प्रति खास तौर पर संवेदनशील हो जाते हैं। भू-राजनीतिक तनाव कम होने के बावजूद संचालन से जुड़ी हुई मुश्किलें और जोखिम से बचने की संभावित प्रवृत्ति को देखते हुए ऊर्जा की आपूर्ति धीरे-धीरे ही सामान्य होने की उम्मीद है।