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अमेरिका की जांच पर भड़का भारत का उद्योग, कहा ये बड़ा खतरा

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अमेरिका की धारा 301 जांच के खिलाफ भारतीय उद्योग संगठनों ने कड़ा विरोध जताया और कहा कि भारत में उत्पादन केवल घरेलू मांग के हिसाब से होता है

Last Updated- April 17, 2026 | 8:23 AM IST
India US Trade Deal

भारत के उद्योग जगत ने विनिर्माण में हमेशा जरूरत से ज्यादा क्षमता का आरोप लगाकर धारा 301 के जरिये उसकी जांच के अमेरिकी फैसले का कड़ा विरोध किया है। उद्योगों का तर्क है कि देश में क्षमता का विस्तार मांग के मुताबिक होता है, न कि निर्यात को प्रभावित करने के लिए क्षमता बढ़ाई जाती है। उन्होंने अमेरिका को ऐसी दंडात्मक व्यापार कार्रवाई को लेकर आगाह करते हुए कहा है कि इससे साझा रणनीतिक उद्देश्य कमजोर पड़ सकते हैं।

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) कार्यालय को दिए गए ज्ञापन में विभिन्न उद्योग संगठनों और कंपनियों ने कहा कि घरेलू आर्थिक हकीकतों के मुताबिक भारत में विनिर्माण होता है और अतिरिक्त उत्पादन वैश्विक व्यापार की गति को विकृत करने से इसका कोई संबंध नहीं है।

टेक्सटाइल दिग्गज शाही एक्सपोर्ट्स ने अपने ज्ञापन में कहा, ‘भारत का विनिर्माण संरचनात्मक अतिरिक्त क्षमता का संकेतक नहीं है, बल्कि घरेलू मांग की बुनियादी जरूरतों के मुताबिक आवश्यक है। अमेरिका को कोई भी दंडात्मक व्यापार कार्रवाई नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे अनजाने में साझा भूराजनीतिक और आपूर्ति श्रृंखला के लचीलेपन के लक्ष्य कमजोर पड़ सकते हैं।’

ट्रेड ऐक्ट 1974 के तहत शुरू की गई धारा 301 की जांच में यह जानने की कवायद होती है कि क्या संबंधित देश ऐसी नीतियां या बाजार की स्थिति बना रहा है, जिससे ढांचागत हिसाब से विनिर्माण क्षेत्र में अतिरिक्त क्षमता बन रही है और इसकी वजह से कारोबार का प्रवाह बाधित हो रहा है।

शाही एक्सपोर्ट्स ने बताया कि भारत के कपड़ा और परिधान बाजार लगभग 182 अरब डॉलर का है, जिसमें से लगभग 80 प्रतिशत घरेलू मांग में इस्तेमाल होता है। कुल विनिर्माण का लगभग 37 अरब डॉलर का निर्यात होता है और इसमें से दो-तिहाई से अधिक अमेरिका से इतर बाजारों में जाता है। इससे अमेरिका के बाजार में सीमित कारोबार का पता चलता है। अमेरिका के परिधान आयात में भारत की हिस्सेदारी लगभग 6 प्रतिशत है, और शिपमेंट माल पाटने पर केंद्रित न होकर ऑर्डर के मुताबिक जाता है। इसमें ‘डंपिंग या मूल्य को विकृत करने का कोई सबूत नहीं है।’

ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एक्मा) का भी कहना है कि यह क्षेत्र बाजार की मांग के मुताबिक चलता है और सरकार के समर्थन से कोई अनुचित लाभ नहीं होता है। इसने कहा कि भारत वाहन कल पुर्जा क्षेत्र में बाजार को प्रभावित करने वाली सब्सिडी, कम वेतन, सरकारी उद्यमों या सब्सिडी वाले ऋण का असर नहीं है। इसने कहा है कि निर्यात वृद्धि बहुराष्ट्रीय ओएमई की वैश्विक सोर्सिंग की रणनीति से जुड़ी है। साथ ही अमेरिका के आयात में भारत की हिस्सेदारी कीमत या आपूर्ति को प्रभावित करने के हिसाब से बहुत कम है।

फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (फिक्की) ने तर्क दिया कि भारत की नीतियां ‘न तो अनुचित हैं न भेदभावपूर्ण’। इसमें कोई सबूत नहीं मिलता कि अमेरिकी वाणिज्य पर यह बोझ डाल रही हैं। इसने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिकी विनिर्माण आयात में भारत की हिस्सेदारी मामूली है, जो बाजार को विकृत करने या घरेलू उत्पादन की जगह लेने के लिए नाकाफी है।

कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलाव की ओर इशारा किया है। संगठन का कहना है कि चीन से अमेरिकी आयात में तेज गिरावट आई है और यह 2016 के 41.7 अरब डॉलर से घटकर 2024 में 20.8 अरब डॉलर रह गया है। इन प्रतिस्पर्धी वजहों से भारत का निर्यात बढ़ा है।

इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस ने कहा कि क्षेत्र में अतिरिक्त क्षमता बनाने या बनाए रखने के उद्देश्य से कोई नीति नहीं बनी है। वहीं इंडियन सोलर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने कहा है कि घरेलू कमी के कारण विनिर्माण बढ़ा है। इसने कहा, ‘भारत वर्तमान में सौर उत्पादों की गंभीर कमी का सामना कर रहा है, और इसकी मौजूदा उत्पादन क्षमता स्थानीय मांग को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है।’ संगठन ने कहा कि यह क्षेत्र अमेरिकी वाणिज्य पर बोझ नहीं डालता है।

कालीन निर्यात संवर्धन परिषद ने कहा कि कालीन जैसे श्रम केंद्रित क्षेत्र में कारीगरों के करघों के मुताबिक उत्पादन होता है और यह पूरी तरह मांग से संचालित है। इस क्षेत्र में 85 से 90 प्रतिशत उत्पादन ऑर्डर पर होता है। इंडियन स्टील एसोसिएशन ने इस बात पर जोर दिया कि क्षमता में बढ़ोतरी बुनियादी ढांचे के विकास और शहरीकरण के अनुरूप है, जिसमें प्रति व्यक्ति खपत अभी भी वैश्विक औसत से नीचे है। एसोसिएशन ने यह भी उल्लेख किया कि अमेरिका माल भेजने वाले निर्यातकों को पहले से ही धारा 232 के तहत शुल्क व अन्य कारोबारी व्यवधानों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे अतिरिक्त कदम का कोई मतलब नहीं रह जाता है।

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First Published - April 17, 2026 | 8:23 AM IST

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