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फेड नहीं फूड: अर्थशास्त्रियों ने घरेलू महंगाई देखने पर दिया जोर

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अर्थशास्त्रियों की बहस: खाद्य मुद्रास्फीति बनाम अमेरिकी फेड की नीतियां, क्या है भारत की राह?

Last Updated- November 08, 2024 | 10:25 PM IST
Economists

कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मौद्रिक नीति खासकर अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा किए जाने वाले दर संबंधित बदलावों के मुकाबले खाद्य मुद्रास्फीति जैसे स्थानीय कारकों पर ज्यादा निर्भर करेगी। ‘फूड ऑर फेड’ शीर्षक वाली पैनल परिचर्चा के दौरान इक्रा में मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने अनुमान जताया कि भारत में कोई भी दर कटौती संभवतः 50 आधार अंकों तक सीमित होगी, जो यह दर्शाता है कि आरबीआई द्वारा फेड के आक्रामक दर कटौती के उपायों को अपनाने की संभावना कम है और इसके बजाय वह स्थानीय आर्थिक जरूरतों के हिसाब से दर कटौती की समय-सीमा का विकल्प चुनेगा।

उन्होंने कहा, ‘दर कटौती की समय-सीमा इस पर ज्यादा निर्भर होनी चाहिए कि हमारी स्वयं के स्थानीय संदर्भ में क्या सही है न कि इस संदर्भ में फेड के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश की जाए।’ नायर ने मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं पर खाद्य और किराये जैसे स्थानीय मुद्रास्फीति कारकों के महत्व पर जोर दिया।

उन्होंने कहा, ‘खाद्य मुद्रास्फीति घरेलू मुद्रास्फीति की धारणा पर हावी है।’उन्होंने बताया कि किराना और किराया जैसे आवश्यक मद भारतीय परिवारों में मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारतीय स्टेट बैंक में समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष ने खाद्य मुद्रास्फीति और वैश्विक ब्याज दर संबंधित रुझानों के दोहरे महत्व को स्वीकार किया, लेकिन उनका मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को सहने के लिहाज से मजबूत दिख रही है।

हाल के वर्षों के आंकड़ों का जिक्र करते हुए घोष ने कहा कि भारत की मुद्रा और ब्याज दरें केवल वैश्विक उतार-चढ़ाव पर प्रतिक्रिया करने के बजाय घरेलू बुनियादी सिद्धांतों के अनुरूप रही हैं।

उन्होंने कहा, ‘इनमें से ज्यादातर आंकड़े अब वैश्विक घटनाक्रम से अपेक्षाकृत अप्रभावित हैं क्योंकि वे समय के साथ मजबूत हुए हैं।’ उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता के बावजूद भारत के आर्थिक मापदंड स्थिर बने हुए हैं।

खाद्य मुद्रास्फीति, फेड के असर और भारत के दृष्टिकोण के बारे में पूछे गए सवाल पर घोष ने खाद्य मुद्रास्फीति को देश में एक निरंतर और जटिल चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारक (जैसे बेमौसम बारिश और तापमान में उतार-चढ़ाव) मुद्रास्फीति पर नियंत्रण को विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण बनाते हैं, क्योंकि ये कारक अब दैनिक जीवन का सामान्य हिस्सा बन गए हैं।

घोष ने कहा, ‘भारतीय संदर्भ में खाद्य मुद्रास्फीति हमेशा से एक पहेली बनी हुई है, और जलवायु कारकों के हमारे दैनिक जीवन पर प्रभाव पड़ने के कारण यह चुनौती आगे भी बनी रहेगी।’ उन्होंने कहा कि जहां खाद्य मुद्रास्फीति के रुझानों पर लगातार बहस चल रही है, वहीं वे भारत की आर्थिक वास्तविकता का एक महत्वपूर्ण और अपरिहार्य घटक बने हुए हैं।

घोष ने भारत के दर-कटौती दृष्टिकोण की विशिष्ट प्रकृति पर भी विस्तार से प्रकाश डाला तथा बताया कि अतीत में वैश्विक आर्थिक प्रतिक्रियाओं के साथ समन्वित दर वृद्धि के विपरीत, दर-कटौती आमतौर पर देश-केंद्रित होती है।

उन्होंने कहा, ‘यदि आप 2008 के बाद के चले आ रहे पैटर्न पर विचार करें तो पता चलेगा कि दर वृद्धि अक्सर वैश्विक रूप से समन्वित रही है, लेकिन दर कटौती अक्सर अलग अलग देशों की जरूरतों के अनुरूप की जाती है।’उन्होंने कहा कि इससे आरबीआई के इस रुख को बल मिलता है कि भारत में कोई भी संभावित दर कटौती फेड के अनुरूप न होकर घरेलू परिस्थितियों के अनुरूप होगी।

एलऐंडटी के मुख्य अर्थशास्त्री सच्चिदानंद शुक्ल ने विपरीत नजरिया अपनाया है। मौजूदा परिदृश्य पर उनका मानना है कि अमेरिका की मजबूत औद्योगिक और व्यापार नीतियों के साथ-साथ डॉलर के दबदबे का वैश्विक स्तर पर प्रभाव पड़ रहा है। शुक्ला का मानना है, ‘अमेरिकी नीतियों के इस मजबूत समावेश का बाजार परिदृश्य पर व्यापक प्रभाव पड़ता है और आरबीआई इसे पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकता।’

उन्होंने कहा, ‘अमेरिका में चुनाव के बाद बड़ा बदलाव आया है और यह दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों की प्रतिक्रिया का हिस्सा होगा। मुझे नहीं लगता कि आरबीआई वास्तव में इसे नजरअंदाज कर सकेगा। हां, फूड महत्वपूर्ण है, और यह सीपीआई बास्केट में महत्वपूर्ण रहा है। लेकिन बड़ा परिवर्तन हुआ है और इसका कुछ हिस्सा आरबीआई की प्रतिक्रियात्मक कार्य प्रणाली से भी जुड़ना चाहिए।’

सिटीग्रुप इंडिया के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य अर्थशास्त्री समीरन चक्रवर्ती ने इस बात पर जोर दिया कि जिंस कीमतों और परिवहन लागत जैसे सामान्य कारक सभी अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करते हैं, लेकिन भारत सहित उभरते बाजारों में केंद्रीय बैंक फेड के साथ तालमेल बिठाते हुए दरों में कटौती करने के लिए बाध्य नहीं हैं, जो घोष के विचारों के अनुकूल है।

उन्होंने कहा, ‘जब फेड ब्याज दरें बढ़ाता है, तो मुद्रा संबंधी चिंताओं के कारण उसी तरह ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव होता है, लेकिन जब फेड ब्याज दरें घटाता है, तो ऐसा नहीं देखने को मिलता।’ आदित्य बिड़ला ग्रुप में मुख्य अर्थशास्त्री इला पटनायक ने कहा कि मौजूदा समय में खाद्य, विकास की स्थिति और फेड की स्थिति यह संकेत दे रही हैं कि ब्याज दरों में कटौती के लिए अभी इंतजार करना होगा।

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First Published - November 8, 2024 | 10:24 PM IST

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