कोविड-19 महामारी के कारण बड़ी संख्या में सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यम (एमएसएमई) समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में इस क्षेत्र के लिए एक और राहत पैकेज दिए जाने की जरूरत है। बैंकों और इस क्षेत्र के कारोबारियों वित्त मंत्रालय से यह मांग की है।
उन्होंने कहा कि ओमीक्रोन के कारण महामारी की तीसरी लहर आने से एक बार फिर एमएसएमई क्षेत्र पर बुरा असर पड़ा है। बैंकों और एमएसएमई उद्योग के प्रतिनिधियों ने इस सेक्टर को आपातकालीन क्रेडिटलाइन गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) की तर्ज पर समर्थन दिए जाने की मांग की है, जो महामारी की शुरुआत में पेश की गई थी।
ईसीएलजीएस के तहत नैशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी (एनसीजीटीसी) द्वारा 100 प्रतिशत क्रेडिट गारंटी उस कर्ज पर दी जाती है, जो बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां देती हैं।
इसके साथ ही 180 दिन के बकाये के विस्तारित वर्गीकरण में भी बड़ी संख्या में एमएसएमई खाते खराब खाते में तब्दील हो गए हैं, उनके प्रतिभूति का इस्तेमाल एमएसएमई द्वारा किया जाता है। परिणामस्वरूप प्रवर्तक अतिरिक्त सिक्योरिटी देने में सक्षम नहीं होते, जिसकी मांग पुनर्गठन पैकेज स्वीकार करने के लिए कर्जदाता द्वारा की जाती है। सरकार को दिए गए बजट पूर्व ज्ञापन में फेडरेशन आफ इंडियन एमएसएमई (फिस्मे) ने कहा, ‘महामारी के दौरान प्रभावित इकाइयों की अतिरिक्त सिक्योरिटी के 100 प्रतिशत गारंटी कवर की जरूरत को लघु और सूक्ष्म उद्योगों के लिए क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट के माध्यम से पूरी की जा सकती है या एनसीजीटीसी से नए तरीके से इसकी सुविधा दी जा सकती है।’
इसके अलावा दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) में संशोधन की मांग की गई है, जिससे एमएसएमई के बकाये की बेहतर रिकवरी हो सके।
बड़ी संख्या में ऐसे एमएसएमई भी हैं, जो कंपनियों के आपूर्तिकर्ता है। कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) और आईबीसी के तहत परिसमापन प्रक्रिया के दौरान एमएसएमई आपूर्तिकर्ताओं को केवल ऑपरेशन क्रेडिटर के रूप में देखा जाता है। बजट पूर्व ज्ञापन में फिस्मे ने कहा है, ‘इन दोनों प्रक्रियाओं में एमएसएमई के बकाये को सामान्यतया छोड़ दिया जाता है, और उन्हें बहुत मामूली या कोई रिकवरी नहीं मिलती।’ इसमें कहा गया है कि प्रक्रिया ऐसी है कि एमएसएमई आपूर्तिकर्ताओं को परिसमापन या सीआरआईपी के दौरान बड़े खरीदारों की तुलना में कुछ भी नहीं मिलता है। इसके उपचार के लिए फिस्मे ने सुझाया है कि एमएसएमई को मौजूदा ऑपरेशनल क्रेडिटर श्रेणी के तहत अलग से उप श्रेणी में वर्गीकृत किया जाना चाहिए।