मुकेश अंबानी की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी, रिलायंस लाइफ साइंसेज बायोफ्यूल के उत्पादन में इजाफा करने के लिए जल्दी ही अपने कारोबार का विस्तार करेगी।
रिलायंस लाइफ साइंसेज इस वक्त आंध्र प्रदेश के काकीनाडा जिले में चल रही अपनी पायलट परियोजना के तहत गैर खाद्य फसलों से सालाना 6,500 टन बायोडीजल का उत्पादन कर रही है। अब कंपनी इसके वास्ते पेराई और संग्रहण केंद्रों का निर्माण करेगी, ताकि उसका बायोफ्यूल उत्पादन सालाना एक लाख टन से ज्यादा हो सके।
कंपनी के अध्यक्ष के.वी. सुब्रमण्यम ने बताया कि,’बायोफ्यूल आगे चलकर हमारी कमाई का एक अहम जरिया बनने वाला है। हम इस वक्त इसके लिए कारोबारी योजना बना रहे हैं।’
वैसे, उन्होंने पेराई और संग्रहण केंद्रों पर होने वाले निवेश के बारे में कुछ भी कहने से साफ इनकार कर दिया। वैसे, उद्योग जगत के सूत्रों की मानें तो इन केंद्रों के लिए 150 से 200 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी।
एक टन बायोफ्यूल के उत्पादन के वास्ते करीब एक हेक्टेयर में लगी फसल की जरूरत होती है। इस हिसाब से कंपनी को एक लाख टन बायोफ्यूल उत्पादन के लिए एक लाख हेक्टयेर जमीन पर लगी फसल की जरूरत होगी।
सूत्रों के मुताबिक इस निवेश का बड़ा हिस्सा कच्चे माल को हासिल करने में खर्च करने में होगा। इस वक्त रिलायंस लाइफ साइंसेज मुख्य रूप से बायोटेक दवाओं, स्टेम सेल इलाज, कॉर्ड ब्लड बैंकिंग और क्लिनिकल रिसर्च के काम में लगी हुई है। बायोफ्यूल भारत में तेजी से बढ़ता एक कारोबार है। वजह है, एथोनॉल का बढ़ता कारोबार।
टाटा समूह की टाटा केमिकल्स ने भी गुजरात के नांदेद में बायोफ्यूल की पायलेट परियोजना शुरुआत कर दी है। वह वहां 30 किलोलीटर बायोफ्यूल का प्रतिदिन उत्पादन करने वाली एक प्लांट लगा रही है, जो इसके लिए ज्वार का इस्तेमाल करेगी।
काकीनाडा में रिलायंस लाइफ साइंसेज के केंद्र के पास ही नैचुरॉल बायोएनर्जी लि. ने भी अपना एकीकृत उत्पादन केंद्र बनाया है। यहां से हर साल एक लाख टन बायोफ्यूल और दूसरे सहयोगी उत्पादों का उत्पादन करेगी। यह दुनिया में सबसे बड़े बायोफ्यूल उत्पादन केंद्रों में से एक है।
सुब्रमण्यम का कहना है कि, ‘हम बेकार पड़ी, लेकिन कृषि योग्य जमीन का इस्तेमाल इन फसलों के लिए करेंगे। इससे कम से कम पांच राज्यों के किसानों को अतिरिक्त आय का साधन मिलेगा। साथ ही, वे इस पर आम फसलों को भी उगा पाएंगे।’ इस परियोजना के तहत रिलायंस लाइफ साइंसेज ने महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश के 50 हजार किसानों को शामिल किया है।
इस पायलट परियोजना के तहत कंपनी ने जेटरोफा और पोंगामिया को रबी और खरीफ फसलों के बीच के वक्त में उत्पादन के लिए आजमाया। सुब्रमण्यम के मुताबिक इसके लिए किसानों को इस वक्त औसतन पांच रुपये प्रति किलो के हिसाब से भुगतान किया जा रहा है।