एक हालिया मामले (प्रदीप सोनावणे एवं अन्य बनाम डीएसएसडी इन्फ्रास्ट्रक्चर) में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निपटान आयोग ने एक डेवलपर के खिलाफ उपभोक्ता शिकायत को कालातीत बताकर खारिज कर दिया। प्रदीप सोनावणे और उनकी पत्नी ने डीएसएसडी इन्फ्रास्ट्रक्चर और श्री नंददीप भवन कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी पर एक पुनर्विकास परियोजना में सेवाओं में कमी का आरोप लगाते हुए उपभोक्ता शिकायत दर्ज की थी।
शिकायतकर्ताओं ने 20 दिसंबर, 2013 को एक फ्लैट खरीदने के लिए करार पर दस्तखत किए और 31 अगस्त, 2016 को उन्हें फ्लैट की चाबियां मिल गईं। मगर उन्होंने वहां रहना 2024 के बाद शुरू किया। सोनावणे दंपती ने आरोप लगाया कि उन्हें पार्किंग के लिए खराब जगह दी गई, जहां खुला हुआ मैनहोल था और कार रखने या निकालने के लिए बहुत कम जगह थी। उन्होंने एक निजी आर्किटेक्ट की 28 अगस्त, 2025 की रिपोर्ट पर भी भरोसा किया और कारपेट एरिया में गड़बड़ तथा निर्माण में गलतियों का आरोप लगाया। राष्ट्रीय आयोग ने देखा कि कब्जा 2016 में ही ले लिया गया था। उसने यह भी देखा कि शिकायतकर्ताओं ने कब्जा लेते समय पार्किंग की जगह या कारपेट एरिया के बारे में कोई शिकायत नहीं की थी। आयोग ने शिकायतकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि आर्किटेक्ट की रिपोर्ट देखकर ही 2025 में शिकायत की गई। आयोग ने कहा कि 2016 में जब उन्होंने कब्जा लिया था तभी कार्रवाई करनी चाहिए थी।
आयोग ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 69 में अनिवार्य किया गया है कि शिकायत का कारण (कॉज ऑफ एक्शन) सामने आने की तारीख से दो साल के भीतर ही शिकायत दर्ज करानी चाहिए। बाद में शिकायत तभी दर्ज कराई जा सकती है, जब देर का वाजिब कारण बताया जाए, जो इस मामले में नहीं बताया गया।
यह मियाद उसी तारीख से शुरू हो जाती है, जिस तारीख को कॉज ऑफ एक्शन (ठोस तथ्य जो किसी व्यक्ति को मुकदमा करने का अधिकार देता है) आखिरी बार सामने आया। उस तारीख से दो साल के भीतर मामले दर्ज कर दिए जाने चाहिए। करंजावाला ऐंड कंपनी की पार्टनर मनमीत कौर कहती हैं, ‘देर को केवल उसी हालत में स्वीकार किया जा सकता है, जब तय मियाद के भीतर उपभोक्ता आयोग के पास नहीं जाने की पर्याप्त वजह बता दी जाए।’
वित्तीय क्षेत्राधिकार इस बात पर निर्भर करता है कि कितना भुगतान किया गया था। कौर बताती हैं, ‘जिला आयोग उन शिकायतों पर विचार कर सकता है, जहां रकम 50 लाख रुपये से अधिक नहीं है। राज्य आयोग 50 लाख रुपये से अधिक लेकिन 2 करोड़ रुपये से कम रकम के मामले ले सकता है और राष्ट्रीय आयोग केवल 2 करोड़ रुपये से अधिक के मामले ही देखता-सुनता है।’
कई उपभोक्ता शिकायतें इसलिए खारिज हो जाती हैं क्योंकि शिकायकर्ता कानूनी दलील के बजाय अपनी व्यथा लिख देते हैं। वे स्पष्ट नहीं बता पाते कि खामी किसी वस्तु में है या सेवा में अथवा अनुचित व्यापार व्यवहार की शिकायत है। अस्पष्ट आरोपों से निर्णय मुश्किल हो जाता है। किंग स्टब ऐंड कासिवा एडवोकेट्स ऐंड अटॉर्नीज के पार्टनर सुकृत कपूर बताते हैं, ‘कई शिकायतों में रिफंड, रीप्लेसमेंट, मुआवजे, ब्याज अथवा खर्च जैसे खास अनुरोध ही नहीं होते।’
सही शिकायत में क्रम से तथ्य हों, कानूनी आधार स्थापित किया गया हो, दमदार शिकायत में तथ्यों को काल क्रमानुसार प्रस्तुत करना चाहिए, बताया गया हो कि मामले दो साल की मियाद के भीतर का है (या देर की वाजिब वजह हो) और सही दस्तावेजों के साथ सटीक राहत मांगी गई हो।
अक्सर कागज गायब होने पर मुकदमा खारिज हो जाता है। बिल, रसीद, करार, वारंटी या पॉलिसी के कागज तथा पहले की गई लिखित शिकायतें जरूरी हैं।
कपूर कहते हैं, ‘रियल एस्टेट के मामलों में बिल्डर-खरीदार समझौता, पेमेंट की तारीखें, पजेशन लेटर और देर होने पर लिखित बातचीत की ब्योरा जरूरी है। बीमा विवादों में पॉलिसी, दावों के कागज, सर्वेयर की रिपोर्ट और खारिज करने वाला पत्र जरूरी है। खराब उत्पादों में मरम्मत के रिकॉर्ड खराबी साबित कर देते हैं। लिखित शिकायत, पावती और भुगतान के रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज रखने पर सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है।’