शहरी विकास मंत्रालय द्वारा चलाए जा रहे जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) के दूसरे चरण में 63 शहरों के लिए 15,000 बस अब सड़क पर दौड़ने के लिए तैयार है।
लेकिन वाणिज्यिक वाहन निर्माता कंपनियों ने कहा है कि 2008 की शुरुआत में अधिक लागत की वजह से उद्योगों का खासा नुकसान का सामना करना पड़ा है। इस तरह की बसों का निर्माण टाटा मोटर्स, अशोक लीलैंड और आयशर मोटर्स जैसी दिग्गज कंपनियां कर रही हैं।
मध्यम और भारी वाणिज्यिक वाहन निर्माण क्षमता सालाना 2.30 लाख बस बनाने की है। ट्रक और यात्री बस की लगभग बराबर संख्या में निर्माण होता है। सरकार द्वारा खरीदे जाने वाले 15000 बस, कुल उत्पादन का महज 9 फीसदी है।
अप्रैल 2008 से जनवरी 2009 के बीच उत्पादन क्षमता और घरेलू बिक्री में लगभग 30 फीसदी की गिरावट आई है। हालांकि इस तरह के ऑर्डर बढ़ने से बिक्री की दर में कोई इजाफा नहीं हो रहा है। उद्योग जानकारों का मानना है कि इन बस बनाने वाली कंपनियों को बस निर्माण का काम मार्च के अंत तक पूरा करना है, क्योंकि इन बसों की आपूर्ति 30 जून से पहले होनी है।
अशोक लीलैंड के कार्यकारी निदेशक (मार्केटिंग) राजीव सहरिया ने कहा, ‘बसों के ऑर्डर मिलने से हमारे काम को गति मिलेगी और हम अप्रैल तक उत्पादन की रूपरेखा तय कर देंगे।’ दिल्ली की एक बस बनाने वाली कंपनी के वरिष्ठ कार्यकारी ने कहा, ‘वैसे यह ऑर्डर काफी कम है और इससे हमारे उत्पादन को किसी तरह की गति नहीं मिलेगी। हमने 2008 के शुरूआत में अच्छा उत्पादन किया था। उसे फिर से कायम रखना मुश्किल है।’
जेएनएनयूआरएम के तहत जो 15,000 बसों का ऑर्डर दिया गया है, उस पर लगभग 4800 करोड़ रुपये खर्च आएगा। इसके तहत लो फ्लोर बसों की कीमत 50 से 60 लाख रुपये प्रति बस है, जबकि सेमी लो फ्लोर बसों की कीमत प्रति बस 25 लाख रुपये के करीब बैठती है। अभी तक 43 शहरों के लिए बस आवंटन को मंजूरी मिल गई है।