कंपनी मामलों के मंत्रालय (एमसीए) ने प्राधिकारियों के लिए यह निगरानी करना आसान कर दिया है कि कोई कंपनी अपने वेंडरों, खासकर सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) का भुगतान रोक रही है या नहीं और अगर रोक रही हैं तो कितने साल तक।
अगले महीने से कंपनियों को अपने फाइनैंशियल स्टेटमेंट में कारोबार के भुगतान का ब्योरा समय के मुताबिक , एक साल से कम, एक से दो साल, दो से तीन साल और तीन साल से ज्यादा, करना होगा। यह एमएसएमई और अन्य में विभाजित होगा। प्रत्येक श्रेणी में उपश्रेणी होगी, जिसमें विवादित और गैर विवादित का ब्योरा होगा।
इसी तर्ज पर कारोबार संबंधी प्राप्तियों के वक्त के बारे में भी खुलासा होगा। इस समय कंपनियों को सिर्फ दो भाग में कारोबार संबंधी भुगतान का खुलासा करना होता है, एमएसएमई को भुगतान और गैर एमएसएमई को भुगतान। इसमें भुगतान के वक्त का ब्योरा देने की जरूरत नहीं होती है।
प्राप्तियों के मामले में सिर्फ इसे दो भागों में विभाजित करना होता है, 6 महीने तक और 6 महीने से ज्यादा।
नांगिया एंडरसन में पार्टनर रेगुलेटरी निश्चल एस अरोड़ा ने कहा, ‘इससे सरकार गंभी कॉर्पोरेट चूककर्ताओं की निगरानी कर सकेेगी और एमएसएमई वेंडरों की रक्षा के लिए चूक करने वाली कंपनियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर सकेगी।’ एकेएम ग्लोबल में टैक्स पार्टनर अमित माहेश्वरी ने कहा कि एमसीए के इस कदम से हिस्सेदारों को यह समझने में मदद मिलेगी कि कंपनी अपने देनदारों को नकदी या नकदी के बराबर भुगतान किस तरीके से कर रही है।
उन्होंने कहा, ‘इससे हिस्सेदारों को इस पर नजर रखने में मदद मिलेगी कि क्या कंपनी अपने वेंडरों का नियमित भुगतान कर रही है।’ माहेश्वरी ने कहा कि इसके अलावा हिस्सेदार देनदारों की पहचान कर सकेंगे।
एमएसएमई डेवलपमेंट ऐक्ट, 2006 के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति एमएसएमई आपूर्तिकर्ता से से वस्तुओं की खरीदारी करता है या सेवाएं लेता है, उसे अधिकतम 45 दिन में भुगतान कर देना चाहिए। अगर इससे इतर कोई देरी होती है तो खरीदार को रिजर्व बैंक द्वारा अधिसूचित दरों की तुलना में तीन गुना ज्यादा ब्याज का भुगतान करना होगा।