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महज विलय नहीं, दूर की है कौड़ी

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Last Updated- December 10, 2022 | 6:40 PM IST

आरआईएल और आरपीएल के विलय के पीछे क्या कारण रहे इस बारे में शेयर बाजार के विशलेषक, ब्रोकर और फंड मैनेजर माथापच्ची कर रहे हैं।
जानकारों का कहना है कि विलय की रणनीति को तेल गैस उत्खनन कंपनी के परिप्रेक्ष्य में गहराई से देखा जाए, तो इसके पीछे कोई सोची-समझी रणनीति काम कर रही है।
विशलेषकों का एक तबका मानता है कि विलय मुकेश अंबानी की ओर से परिसंपत्तियों के पुनर्गठन से संबंध है। दरअसल, इसके जरिए रिफाइनिंग और गैर-रिफाइनिंग परिसंपत्तियों में स्पष्ट विभेद की रणनीति काम करती नजर आ रही है।
हालांकि इसमें यह सवाल भी उठता है कि अगर परिसंपत्तियों का पुनर्गठन करना ही था, तो पहले रिलायंस उन कंपनियों का पुनर्गठन करती जहां उसे ज्यादा फायदा नहीं हो रहा है। रिलायंस के अन्य कारोबार की बात करें, तो इंजीनियरिंग, रिटेल और अन्य छोटे कारोबार से उसे ज्यादा फायदा नहीं हो रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल कारोबार मुख्य रूप से रिफाइनिंग मार्जिन पर निर्भर है, लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव होने से तेल-गैस उत्खनन से होने वाली आय ही राजस्व का मुख्य जरिया है। यही वजह है कि तेल-गैस उत्खनन और रिफाइनिंग कारोबार में स्पष्ट अंतर रिलायंस के लिए जरूरी है।
केआर चोकसी शेयर ऐंड सिक्योरिटीज के प्रबंध निदेशक देवेन चोकसी का कहना है कि आरआईएल को आने वाले कुछ सालों में कई तेल ब्लॉकों का उत्खनन करना है। ऐसे में उसे बड़ी मात्रा में पूंजी की दरकार है।
ऐसे में उसे रिफाइनरी कंपनियों के मुनाफे की जरूरत है। यही वजह है कि कंपनी को आरपीएल का विलय करना पड़ा। जानकारों का कहना है कि विलय प्रक्रिया पूरी होने के बाद रिलायंस रिटेल को भी सूचीबद्ध कराया जा सकता है, जिसे बाद में रिलायंस इंडस्ट्रीज में विलय किया जा सकता है।

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First Published - March 3, 2009 | 12:51 PM IST

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