इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि ने कहा है कि महामारी के बाद के परिदृश्य में दुनिया भर की सरकारें डिजिटल ढांचे को लेकर भारत के अनुभवों से सीखने को लेकर खासी रुचि दिखा रही हैं। नीलेकणि ने सॉफ्टवेयर कंपनियों के संगठन नैसकॉम के पहले क्लाउड सम्मेलन को संबोधित करते हुए मंगलवार को कहा कि तमाम देशों की सरकारें भारत से सीखने की कोशिश कर रही हैं। नीलेकणि ने कहा, ‘मुझे लगता है कि कोविड-19 महामारी के बाद डिजिटल ढांचे को लेकर खासा रुझान देखा जा रहा है। सरकारें यह जानने के लिए भारत से संपर्क साध रही हैं कि वे क्या सीख सकती हैं? बड़ी जनसंख्या से जुड़े किसी भी मामले में यह कारगर होने के साथ कम लागत वाला एवं अधिक संख्या वाला होना चाहिए। छोटे लेनदेन भी मुमकिन होने चाहिए और सबसे बड़ी बात कि इसे समावेशी भी होना चाहिए। यह सुविधा समाज के संभ्रांत तबके के लिए ही नहीं होनी चाहिए, यह हर किसी के लिए अच्छी होनी चाहिए।’
मुक्त डिजिटल पारिस्थितिकी वर्ष 2030 तक भारत के लिए 700 अरब डॉलर मूल्य के अवसर मुहैया कराएगी। स्वास्थ्य देखभाल, प्रतिभा, कृषि, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई), शिक्षा, शहरी शासन, कानून एवं न्याय, लॉजिस्टिक, सरकारी सेवाओं की आपूर्ति और जमीनों का ई-रिकॉर्ड रखना भी इसका एक हिस्सा होगा। इस सम्मेलन में नैसकॉम ने ‘डिजिटल इंडिया: द प्लेटफॉर्माइजेशन प्ले’ शीर्षक वाली एक रिपोर्ट भी जारी की। इस मौके पर इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव अजय साहनी ने कहा कि उत्पादों से प्लेटफॉर्म की तरफ कदम बढ़ाने के साथ ही इन प्लेटफॉर्म को दुनिया पर दबदबा बनाते हुए देखना प्रशंसनीय है। साहनी ने कहा, ‘हम सरकारी सेवाओं को लोगों तक अधिक असरदार एवं सुविधाजनक तरीके से मुहैया कराने की सोच रखते हैं। इसमें केंद्र एवं राज्यों की सरकारें एक साथ आकर उनके विकास के लिए काम करें। ऐसे प्लेटफॉर्म न केवल हमारे जमीनी ढांचे को मजबूत कर सकते हैं बल्कि अपने डेटा एवं प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करने में भी मदद पहुंचा सकते हैं।’ दुनिया के बड़े सार्वजनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म में शामिल आधार, यूपीआई एवं कोविन भारत की ही देन हैं। इनकी मदद से भारत को डिजिटलीकरण के प्रयासों में काफी तेजी मिली है।