दिवाला और ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) में संशोधन के बाद लेनदारों की समिति (सीओसी) के गठन के बाद ही आवेदन वापस लेने की अनुमति होने से अतिरिक्त लागत आ सकती हैं, लेकिन इससे दिवाला प्रक्रिया में अनुशासन आएगा व पहले से अनुमान लगा पाना आसान हो सकेगा।
संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुके विधेयक के मुताबिक, ‘सीओसी के गठन के बाद और समाधान योजना दाखिल करने के लिए पहले आमंत्रण जारी होने के पहले ही आवेदन वापस लेने की अनुमति होगी। धारा 12ए के तहत वापसी के लिए सीओसी के 90 प्रतिशत वोटिंग शेयर की मंजूरी की आवश्यकता होगी और आवेदन पर आदेश 30 दिनों के भीतर निर्णय लेने वाले प्राधिकरण द्वारा पारित किया जाना चाहिए।
किंग स्टब ऐंड काशिवा, एडवोकेट्स ऐंड अटॉर्नीज में पार्टनर नवोद प्रसन्नम ने कहा, ‘यह संशोधन सीओसी के व्यावसायिक विवेक की प्रधानता को रेखांकित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि निपटान या वापसी के प्रयास सामूहिक दिवाला प्रक्रिया में भाग लेने वाले अन्य लेनदारों के हितों को कमजोर न करें। साथ ही जब एक बार जब कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) प्रारंभिक चरण से आगे बढ़ गई हो, यह सीओसी की मंजूरी को अनिवार्य सुरक्षा उपाय बनाकर प्रक्रियात्मक अखंडता को भी मजबूत करता है।’
इसके पहले सीओसी के गठन से पहले भी वापसी के लिए आवेदन दायर किया जा सकता था। अब आवेदन को समाधान पेशेवर के माध्यम से भेजना होगा। केएस लीगल ऐंड एसोसिएट्स में मैनेजिंग पार्टनर सोनम चंदवानी ने कहा, ‘यह संशोधन बहुप्रतीक्षित सुधार है, जिससे दिवाला प्रक्रिया की एक रणनीतिक खामी दूर हुई है। पिछला ढांचा लचीला था, लेकिन किसी भी चरण में कंपनियों को आवेदन वापस लेने की अनुमति थी। इससे बोली लगाने वालों का भरोसा कमजोर होता था।’