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प्रभावी हुआ एलएलपी कानून

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Last Updated- December 10, 2022 | 11:20 PM IST

कंपनी मामलों के मंत्रालय ने हाल ही में अस्तित्व में आए सीमित उत्तरदायित्व साझेदारी (एलएलपी) अधिनियम के तहत कंपनियों का पंजीकरण करना शुरू कर दिया है।
जानकारों के मुताबिक, यह अधिनियम लागू होने से कंपनी के किसी साझेदार की दूसरे के प्रति सीमित जिम्मेदारी रह जाएगी। हालांकि सूत्रों के अनुसार, अधिकांश कंपनियां कर नियमों में बगैर परिवर्तन के इस कानून के तहत पंजीकृत होना नहीं चाहतीं। क्योंकि आयकर विभाग ने अब तक एलएलपी अधिनियम के तहत पंजीकृत कंपनियों को मान्यता नहीं दी है।
पहचान उजागर न करने की शर्त पर दिल्ली के एक कॉरपारेट अधिवक्ता ने बताया कि एलएलपी कानून के तहत पार्टनरशिप फर्मों को फलने-फूलने में खूब मदद मिलेगी। चूंकि भारत के ज्यादातर पार्टनरशिप फर्म परिवार नियंत्रित होते हैं। इस वजह से अब तक बाहरी फर्म के प्रति अविश्वास की स्थिति होती थी।
लेकिन यह कानून मौजूदा हालात को बदल देगा, क्योंकि इसके चलते साझेदारों की जवाबदेही सीमित हो जाएगी। इस अधिनियम के तहत पंजीकृत होने वाली पहली कंपनी बनने का श्रेय ‘हांडू ऐंड हांडू’ को गया है।
गौरतलब है कि एलएलपी कानून के तहत ‘एक आदमी की कंपनी’ पंजीकृत नहीं की जा सकती। पंजीकरण के लिए कंपनी में कम से कम दो आदमी होने ही चाहिए। एलएलपी मॉडल के अनुसार, चार्टर्ड अकांउंटेंट, कंपनी सचिव या अधिवक्ता कोई भी बहुधंधी कंपनी स्थापित कर सकता है। इस तरह स्थापित कंपनी पेशेवर सेवाएं देने का काम करेगी।
मौजूदा कानून के तहत ऐसी पेशवर गतिविधियां केवल साझेदार संस्थाओं के तहत ही संचालित की जा सकती हैं। अब तक इन पेशों को कंपनियों के जरिए संचालित नहीं किया जा सकता है। सीमित उत्तरदायित्व का सिद्धांत दरअसल किसी साझेदार फर्म और कंपनी के बीच की चीज है। किसी एलएलपी को गठित करने के लिए कम से कम दो साझेदारों की जरूरत होगी।
पार्टनरशिप फर्मों के लिए मौजूदा नियम के तहत साझेदारों की अधिकतम संख्या 20 हो सकती है, लेकिन इस एलएलपी मॉडल में साझेदारों की संख्या कितनी भी संभव है। एलएलपी ढांचे के तहत, साझेदार का उत्तरदायित्व कंपनी में उसकी अपनी हिस्सेदारी तक ही सीमित रहेगा।
कंपनी में शामिल अन्य साझेदारों के प्रति उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। दूसरी ओर परंपरागत पार्टनरशिप फर्म के तहत हर साझेदार संयुक्त रूप से जिम्मेदार होता है। इंस्टीटयूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के केंद्रीय परिषद के सदस्य विनोद जैन के मुताबिक, जब तक कर मामले पर कोई स्पष्टीकरण नहीं मिल जाता तब तक संस्थाएं खुद को एलएलपी में नहीं बदलेंगी।
यही नहीं, आयकर विभाग और आईसएआई ने भी अभी तक एलएलपी को मान्यता नहीं दी है। पिछले बजट में इसके लिए कोई प्रावधान तक नहीं किया गया। कंपनी मामलों के एक अधिकारी ने बताया कि कर नियमों से संबंधित कानून बनाया जा रहा है और यह जल्द ही प्रभावी हो जाएगा।
जैन के मुताबिक, एलएलपी को कर दायरे में लाने के दो तरीके हैं-एक, केवल साझेदारों पर ही कर लगाया जाए फर्म पर नहीं। दूसरा, कॉरपारेट की तरह एलएलपी फर्मों पर कर लगाया जाए।

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First Published - April 6, 2009 | 12:09 PM IST

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