रसोई गैस (एलपीजी) की किल्लत से देश के आतिथ्य क्षेत्र पर पड़ी तगड़ी चोट के बीच सरकार ने गुरुवार को प्रत्येक होटल और रेस्तरां को महीने की औसत जरूरत की 20 प्रतिशत आवंटित करने का निर्णय लिया है।
होटल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के बी काचरू ने कहा,‘हम सरकार के इस निर्णय का स्वागत करते हैं। यह कदम एलपीजी आपूर्ति की मौजूदा चुनौतियों के बीच काफी राहत भरा होगा। हम अतिरिक्त आपूर्ति उपायों के प्रति प्रतिबद्धता और स्थिति पर नजर रखने और चिंताओं को शीघ्रता से दूर करने के लिए पेट्रोलियम और पर्यटन मंत्रालयों तथा इस उद्योग से जुड़े पक्षों के बीच समन्वय की भी सराहना करते हैं।’
हालांकि, इस राहत के बावजूद हालात अब भी गंभीर बने हुए हैं। कई रेस्तरां बंद होने या संचालन जारी रखने के लिए ईंधन की वैकल्पिक व्यवस्था करने के लिए विवश हो गए हैं।
लकड़ी और कोयले से जलने वाले चूल्हों से लेकर इलेक्ट्रिक किचन तक का इंतजाम केवल वही रेस्तरां एवं होटल कर पा रहे हैं जो ऐसा करने में सक्षम हैं।
दिल्ली के मशहूर मुगलई रेस्तरां चेन करीम के मालिक ऐवाज आसिफ कहते हैं, ‘जिस तरह के व्यंजन और करी हम बनाते हैं उनके लिए अब लकड़ी ही ईंधन का एकमात्र विकल्प बच गया है।’ उन्होंने कहा कि उनके पास अब बहुत कम गैस बची है और लगभग 100 किलो लकड़ी का इंतजाम कर लिया गया है। उन्होंने कहा कि मगर लकड़ी की मदद से खाना बनाने में 25-30 मिनट अधिक लगते हैं। छोटी दुकानों के लिए संकट और भी विकराल है। जामा मस्जिद के आसपास की दुकानों में इफ्तार की भीड़ भी नदारद हो गई है। कई ढाबे पहले ही बंद हो चुके हैं और जो चल रहे हैं वे अब पूरी तरह कोयले पर निर्भर हैं।
जामा मस्जिद के निकट एक ढाबा मालिक ने कहा,‘हमें प्रतिदिन 5-6 किलोग्राम कोयले की आवश्यकता होती है और वर्तमान में इसकी कीमत लगभग 70 रुपये प्रति किलोग्राम है।’
बाब और बिरयानी रेस्तरां का संचालन करने वाले एक कारोबारी ने कहा, ‘सिलिंडर की कीमत हमारी पहुंच से बाहर हो गई है। एक सिलिंडर के लिए लगभग 4,500 रुपये तक मांगे जा रहे हैं। कोयले पर खाना पकाने में अधिक समय लगता है मगर तब भी यह हमारे लिए सबसे अच्छा विकल्प है।’मगर उन्होंने यह भी कहा कि कोयला और लकड़ी से खाना पकाना कठिन हो जाता है क्योंकि इसमें लगातार निगरानी की आवश्यकता होती है जबकि एलपीजी के साथ यह समस्या नहीं है।
सरकार ने राहत तो दी है मगर सवाल यह है कि यह घोषणा जमीनी स्तर पर वितरण और उपलब्धता के लिहाज से कितनी कारगर साबित होगी। फेडरेशन ऑफ होटल ऐंड रेस्टोरेंट एसोसिएशंस ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष प्रदीप शेट्टी के अनुसार अकेले महाराष्ट्र में ही लगभग 30 प्रतिशत रेस्तरां बंद हैं। शेट्टी कहते हैं, ‘अगर जल्द ही नई आपूर्ति बाजार में नहीं पहुंची तो आने वाले दिनों में कई दूसरे प्रतिष्ठानों को अस्थायी रूप से संचालन बंद करने के लिए विवश होना पड़ सकता है, खासकर छोटे और मध्यम आकार के भोजनालय के लिए मुश्किल बढ़ सकती है जो सीमित संसाधनों के साथ काम करते हैं।’