हनुमान, हनुमान रिटर्न और बाल गणेश की तिहरी कामयाबी के साथ ही भारतीय एनिमेशन उद्योग पूरे रंग में आ गया है। उस पर हॉलीवुड की मोहब्बत की वजह से यह और भी तेजी से इजाफा कर रहा है।
दरअसल किसी वक्त भारत में एनिमेशन का कारोबार न के बराबर था, लेकिन आज कम लागत की वजह से दुनिया भर की कंपनियां यहां आ रही हैं।
विश्लेषकों की मानें, तो भारत के मुकाबले हॉलीवुड में एनिमेशन फिल्म बनाने में तकरीबन 15 गुना खर्च आता है। इसी वजह से एक के बाद एक हॉलीवुड एनिमेशन कंपनियां यहां आ रही हैं।
हाल ही में यूटीवी और वॉल्ट डिज्नी के बीच एनिमेशन करार हुआ है। मशहूर अभिनेता विल स्मिथ के प्रोडक्शन हाउस ओवरबुक ने भी यहां साझा उपक्रम शुरू करर दिया है।
यूटीवी की अल्पना मिश्रा के मुताबिक पोर्चलाइट पिक्चर्स के साथ भी कुल 1 करोड़ रुपये का सौदा तय हुआ है।
एरिना मल्टीमीडिया के आशीष कुलकर्णी का कहना है कि नई तकनीकों के विकसित होने के चलते एनिमेटेड सिनेमाओं का एक नया दौर शुरू हो गया है।
भारत में तकरीबन 1,200 करोड़ रुपये का एनिमेशन फिल्म उद्योग है, जिसमें फिलहाल तकरीबन 200 एनिमेशन स्टूडियो, 40 वीएफएक्स और 35 गेम डेवलेपमेंट स्टूडियो हैं, जहां अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल होता है।
क्रेस्ट एनिमेशन स्टूडियो के प्रमुख ए.के.माधवन कहते हैं हम अपने स्टूडियो में अमेरिका एवं कनाडा के ट्रेनरों से प्रशिक्षण का काम अंजाम देते हैं। लिहाजा हम विश्वस्तर के नतीजे दे पाने में सफल साबित हो रहे हैं। यही वजह है कि विदेशी प्रोडक्शन हाउस इधर का रुख कर रहे हैं।
हालांकि एनिमेशन फिल्म के लिहाज से भारत में शुरुआत अच्छी नहीं थी। जब पहली बार एनिमेटेड रामायण बनाने की मंजूरी मांगी गई थी, तो सरकार ने धार्मिक भावनाओं का हवाला देते हुए इनकार कर दिया था।
लेकिन 2000 के बाद से तमाम औद्योगिक घरानों ने इसमें दिलचस्पी ली। पर्सेप्ट पिक्चर कंपनी ने ‘हनुमान’ बनाई, जिसने 7 करोड़ रुपये कमाए। मजे की बात है कि इसे बनाने में महज 1.5 करोड़ रुपये का खर्च आया था।
सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अभी एनिमेशन उद्योग में कुशल कामगारों की कमी है। एनिमेशन एक्सप्रेस.कॉम के मुख्य कार्यकारी आनंद गुरानी और अनुसंधान एवं सलाहकार कंपनी केपीएमजी के निदेशक जयदीप घोष का कहना है कि आईमैक्स, वार्नर ब्रदर्स, वॉल्ट डिज्नी के भारत आने से इस कारोबार में ज्यादा लोगों की दरकार हो गई है।
माया ऐकेडमी ऑफ एडवांस्ड सिनेमैटिक्स (मैक) के एजुकेश विभाग के अध्यक्ष अतुल वोहरा के मुताबिक अगले साल तक इस उद्योग को कुल 25,000 लोगों की जरूरत होगी। यह आंकड़ा 2012 तक बढ़कर तीन लाख हो जाएगा, जबकि इस समय इस उद्योग में महज 10,000 कुशल पेशेवर हैं यानी उनकी काफी कमी है।