facebookmetapixel
Advertisement
भारत-अमेरिका को मतभेद दूर कर भरोसेमंद कर व्यवस्था बनाने पर काम करना चाहिए: सर्जियो गोरभारतीय चुनाव व्यवस्था की तारीफ कर बोले ट्रंप, कांग्रेस ने कहा- ईवीएम भी अमेरिका भेज देंगेब्रिक्स देशों ने पर्यावरण संरक्षण पर चार ज्ञान संकलन जारी किए, टिकाऊ विकास पर जोरदुबई का कमर्शियल रियल एस्टेट बाजार मजबूत, पहली छमाही में लेनदेन 8.5% बढ़ाबाल यौन शोषण सामग्री पर सरकार सख्त, सोशल मीडिया के ‘सेफ हार्बर’ प्रावधान पर साफ संदेश17 सितंबर से सेमीकॉन इंडिया 2026, वैश्विक सीईओ और 500 से ज्यादा प्रदर्शक करेंगे ​शिरकत 13-17 साल के किशोरों के लिए नया चैटजीपीटी, मजबूत सुरक्षा और पैरेंटल कंट्रोल की सुविधालाठीचार्ज और पुलिस हिंसा की जांच करेगी 3 सदस्यीय समिति, सुप्रीम कोर्ट ने दिए निर्देशपायलटों की आकस्मिक ड्रग जांच 25% करने की मांग, डीजीसीए से एफआईपी की अपीलभारत के समुद्री व्यापार का नया गेटवे बना विझिंजम, 57 लाख टीईयू क्षमता की ओर बढ़ा बंदरगाह

वित्त वर्ष 21 में पुनर्खरीद की हुई वापसी

Advertisement
Last Updated- December 12, 2022 | 5:53 AM IST

शेयर पुनर्खरीद ने मजबूती के साथ वापसी की है क्योंंकि कर ढांचे में बदलाव ने एक बार फिर भारतीय कंपनी जगत के लिए अपने शेयरधारकों को पुरस्कृत करने का इसे अनुकूल जरिया बना दिया। 2020-21 में भारतीय कंपनी जगत ने 39,295 करोड़ रुपये के शेयरों की पुनर्खरीद की पेशकश की (वास्तविक रकम 34,624 करोड़ रुपये रही), जो पिछले वित्त वर्ष के प्रस्तावित 19,972 करोड़ रुपये (वास्तविक रकम 17,843 करोड़ रुपये) के मुकाबले 97 फीसदी ज्यादा है।
इसके अलावा शेयरधारकों को मिली कुल रकम (लाभांश व पुनर्खरीद) में पुनर्खरीद की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 21 में 21 फीसदी पर पहुंच गई, जो एक साल पहले 8.3 फीसदी रही थी। प्राइम डेटाबेस के आंकड़ों के विश्लेषण से यह जानकारी मिली।
केपीएमजी इंडिया के पार्टनर व प्रमुख (कैपिटल मार्केट्स एडवाइजरी) करण मारवाह ने कहा, बैलेंस शीट मेंं ज्यादा नकदी वाली कंपनियों के लिए अपने शेयरधारकों को पुरस्कृत करने के मामले मेंं पुनर्खरीद लोकप्रिय विकल्प के तौर पर उभरी है। यह उन निवेशकों के लिए होता है जो कंपनी का शेयर बेचना चाहते हैं, साथ ही यह कंपनी को पुनर्पूंजीकरण का मौका देता है और मौजूदा शेयरधारकों के सापेक्षिक रिटर्न में सुधार करता है।
वित्त वर्ष 21 में लाभांश के आंकड़े थोड़े नरम हैं क्योंकि कुछ कंपनियां (खास तौर से बैंक) कोविड-19 महामारी की पृष्ठभूमि में लाभांश भुगतान से दूर रहीं। इसके परिणामस्वरूप वित्त वर्ष 21 में कुल लाभांश का आंकड़ा 30 फीसदी सिकुड़ गया।
तकनीकी दिग्गज इन्फोसिस की तरफ से हाल मेंं घोषित 9,200 करोड़ रुपये की पुनर्खरीद हालांकि बताती है कि भारतीय कंपनी जगत इस जरिये का इस्तेमाल मौजूदा वित्त वर्ष में भी जारी रख सकती हैं।
व्हाइट ऐंड ब्रीफ एडवोकेट्स के पार्टनर विनीत नगला ने कहा, 1 अप्रैल 2020 से लाभांश पर कर शेयरधारकों को देना होता है। इससे पहले शेयरधारकों को मिलने वाला लाभांश कर मुक्त होता था क्योंकि कंपनी को लाभांश वितरण कर देना होता था। दूसरी ओर पुनर्खरीद पर 5 जुलाई, 2020 के बाद से पूंजीगत लाभ पर शेयरधारकों को छूट मिली है। इसलिए निवेशकों को पुरस्कृत करने के लिहाज से पुनर्खरीद काफी बेहतर जरिया है।
वित्त वर्ष 2017 व वित्त वर्ष 2019 के बीच पुनर्खरीद ने जोर पकड़ा था कक्योंकि कंपनियां पुनर्खरीद व लाभांश के बीच कर आर्बिट्रेज तलाश रही थी। इसे देखते हुएसरकार ने वित्त वर्ष 20 से 20 फीसदी पुनर्खरीद कर आरोपित किया। इससे उस साल पुनर्खरीद में 68 फीसदी की गिरावट देखने को मिली।
20 फीसदी पुनर्खरीद कर अभी भी लागू है, लेकिन शेयरधारकोंं को मिलने वाले लाभांश पर चुकाया जाने वाला कर बढ़ गया क्योंकि अब यह वैयक्तिक टैक्स स्लैब पर आधारित होता है, जो कुछ मामलों में 40 फीसदी से भी ज्यादा हो सकता है। इस वजह से पिछले वित्त वर्ष में शेयर पुनर्खरीद कार्यक्रम की ओर झुकाव बढ़ा।
स्पाइस रूट लीगल के पार्टनर प्रवीण राजू ने कहा, लाभांश प्रवर्तकों व बड़े शेयरधारकों पर असर डालता है, जिन्हें पुनर्खरीद के मुकाबले 20-30 फीसदी ज्यादा कर देना होता है। इसी वजह से शेयरधारक यह बोझ क्यों उठाना चाहेंगे, खास तौर से वैसी कंपनियां जहां बड़े प्रवर्तक या निवेशक शेयरधारिता हो।
कराधान के लिहाज से पुनर्खरीद का मतलब बनता है लेकिन नियामकीय लिहाज से उसका क्रियान्वयन मुश्किल हो सकता है।
व्हाइट ऐंड ब्रीफ एडवोकेट्स के पार्टनर प्रशांत राजपूत ने कहा, किसी कंपनी की तरफ से लाभांश की घोषणा या पुनर्खरीद का फैसला लेने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं मसलन मौजूदा बाजार भाव, बाजार पूंजीकरण, मौजूदा कर ढांचा और कानूनी पाबंदी आदि। तकनीक जैसे क्षेत्र की कंपनियों का कर्ज-इक्विटी अनुपात कम होता है, शुद्ध नकदी का स्तर ज्यादा होता है और भुगतान का अनुपात भी ऊंचा होता है, ऐसे में वे शेयर पुनर्खरीद की तरफ ज्यादा झुके होते हैं।
सेबी के नियम के मुताबिक, जिन कंपनियों का कर्ज-इक्विटी अनुपात ज्यादा होता है वे शेयर पुनर्खरीद नहीं कर सकते। साथ ही पुनर्खरीद की रकम चुकता पूंजी व फ्री रिजर्व के एक चौथाई से ज्यादा नहीं हो सकती।

Advertisement
First Published - April 15, 2021 | 12:12 AM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement