ईरान और अमेरिका के बीच छिड़ी जंग की तपिश अब भारतीय बाजारों और आम आदमी जेब तक पहुंचने लगी है। मंगलवार को भारतीय रुपया इतिहास के सबसे खराब दौर में पहुंच गया और एक डॉलर की कीमत 95.43 रुपये के रिकॉर्ड निचले स्तर को छू गई। यह गिरावट केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चेतावनी है। दुनिया भर के बाजार सहमे हुए हैं और सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आखिर रुपये की यह ढलान कहां जाकर रुकेगी। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर रुपया क्यों टूट रहा है, एक्सपर्ट्स की इस पर क्या राय है और आने वाले दिनों में क्या बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
रुपये की इस ऐतिहासिक कमजोरी के पीछे सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय वजह ‘स्ट्रैट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) पर नियंत्रण को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष है। यह समुद्री रास्ता दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई के लिए सबसे जरूरी माना जाता है। युद्ध के कारण इस रास्ते से होने वाली सप्लाई बाधित हुई है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं।
कोटक सिक्योरिटीज के रिसर्च हेड (कमोडिटी और करेंसी) अनिंद्य बनर्जी कहते हैं, “होर्मुज संकट ही कच्चे तेल की कीमतों को तय करने वाला सबसे बड़ा फैक्टर बना हुआ है। महंगा तेल भारत पर दोहरी मार कर रहा है।”
बनर्जी के मुताबिक, युद्ध से पहले भारत हर महीने तेल आयात पर करीब 10-11 अरब डॉलर खर्च करता था, लेकिन अब यह खर्च 70-80% तक बढ़ गया है। आसान शब्दों में समझें तो तेल की मात्रा लगभग वही है, लेकिन उसे खरीदने के लिए अब पहले से कहीं ज्यादा डॉलर देने पड़ रहे हैं। जब देश से ज्यादा डॉलर बाहर जाते हैं, तो रुपया कमजोर पड़ने लगता है।
रुपये के कमजोर होने की एक और बड़ी वजह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की घबराहट है। जब दुनिया के किसी भी हिस्से में युद्ध या अनिश्चितता का माहौल बनता है, तो ऐसे समय में ये निवेशक जोखिम लेने से बचते हैं और भारत जैसे उभरते बाजारों से अपना पैसा निकालने लगते हैं। इसके बजाय वे अपने निवेश को ज्यादा सुरक्षित जगहों पर ले जाते हैं, जैसे सोना या अमेरिकी डॉलर, जहां उन्हें अनिश्चितता के दौर में कम जोखिम महसूस होता है।
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बनर्जी बताते हैं कि जब से यह संघर्ष शुरू हुआ है, विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब 21 अरब डॉलर यानी लगभग 1.8 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए हैं। सिर्फ मार्च और अप्रैल में ही करीब 19 अरब डॉलर की निकासी हो चुकी है। जब इतनी बड़ी मात्रा में डॉलर देश से बाहर जाता है, तो बाजार में डॉलर की कमी होने लगती है और रुपया लगातार कमजोर पड़ता जाता है। यही वजह है कि डॉलर इंडेक्स 98.26 के स्तर पर पहुंच गया है, जो अमेरिकी करेंसी की मजबूती को दिखाता है।
इस मुश्किल समय में भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को संभालने के लिए पूरी कोशिश कर रहा है। मंगलवार को जब रुपया 95.43 के स्तर तक पहुंच गया, तो RBI के निर्देश पर सरकारी बैंकों ने बाजार में बड़ी मात्रा में डॉलर बेचे। इसका मकसद साफ था, रुपये को 95.50 के अहम स्तर से नीचे फिसलने से रोकना।
हालांकि, रुपये को संभालने की इस कोशिश का असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दिख रहा है, जो तेजी से घट रहा है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 728.5 अरब डॉलर के अपने रिकॉर्ड स्तर से गिरकर करीब 698 अरब डॉलर पर आ गया है।
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, HDFC सिक्योरिटीज के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट दिलीप परमार का कहना है कि डॉलर की लगातार बढ़ती मांग रुपये पर दबाव बनाए रखेगी। उनके मुताबिक आने वाले समय में रुपया 95.70 के स्तर तक जा सकता है। फिलहाल भारतीय रिजर्व बैंक ही वह अहम ताकत है जो रुपये को बड़ी गिरावट से थामे हुए है, वरना हालात और ज्यादा बिगड़ सकते थे
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि रुपये की यह गिरावट कब रुकेगी? जानकारों का मानना है कि रुपये का भविष्य पूरी तरह से पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) के हालातों पर निर्भर है। बनर्जी की चेतावनी इसको लेकर डराने वाली है। वे कहते हैं, “अगर होर्मुज से तेल की सप्लाई ऐसे ही बाधित रही, तो कच्चा तेल 125-130 डॉलर तक जा सकता है। ऐसी स्थिति में एक डॉलर की कीमत 97.00 से 97.50 रुपये तक पहुंच सकती है।”
रुपये में मजबूती की उम्मीद तभी की जा सकती है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तनाव कम हो और हालात सामान्य होने लगें, साथ ही कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर के नीचे आ जाए। खर्च सचिव (Expenditure Secretary) वी. वुआलनाम ने भी संकेत दिए हैं कि आने वाली कुछ तिमाहियां भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आसान नहीं रहने वाली हैं और इसमें उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।
आम आदमी के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि अगर रुपया इसी तरह कमजोर होता रहा, तो इसका असर सीधे उसकी जेब पर पड़ेगा, क्योंकि विदेशों से आयात होने वाले मोबाइल, लैपटॉप और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामान महंगे हो जाएंगे और साथ ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
ऐतिहासिक ट्रेंड: रुपया किस तरह से डॉलर के मुकाबले नीचे पहुंचा-
| साल/समय | $1 = ₹ (लगभग) | क्या हुआ / वजह |
|---|---|---|
| 1947 | ₹3.30 | आजादी के समय रुपया काफी मजबूत था |
| 1966 | ₹7.50 | पहली बड़ी डिवैल्यूएशन, आर्थिक दबाव बढ़ा |
| 1991 | ₹17–22 | बैलेंस ऑफ पेमेंट संकट, IMF में सुधार |
| 2000 | ₹44–45 | अर्थव्यवस्था खुलने से आयात-निर्यात बढ़ा |
| 2013 | ₹55–60 | “Taper Tantrum”, विदेशी निवेश निकासी |
| 2018 | ₹70+ | तेल महंगा हुआ, डॉलर में आई मजबूत |
| 2020 | ₹74–76 | कोविड, वैश्विक अनिश्चितता |
| 2022 | ₹80+ | यूक्रेन युद्ध, तेल की कीमतों में उछाल |
| 2024 | ₹84–85 | लगातार गिरावट का ट्रेंड |
| 2025 | ₹88–90 | ऐतिहासिक कमजोरी के करीब |
| 2026 (हालिया) | ~₹94–95 (मार्केट लेवल) | मजबूत डॉलर, FPI आउटफ्लो, तेल की बढ़ती कीमत |
सोर्स: बैंकबाजार