नीरज पांडे की ‘तस्करी: द स्मगलर्स वेब’ (नेटफ्लिक्स पर) हवाई अड्डे के सेट पर फिल्माई गई रोमांचक सीरीज है। इसकी कहानी बिल्कुल सीधी-सादी है। ईमानदार सीमा शुल्क अधिकारी व्यवस्था के अंदर और बाहर दोनों जगह सोना, हैंडबैग, घड़ियां और नशीली दवाओं (ड्रग्स) जैसी चीजों की तस्करी रोकने के लिए जूझते दिखते हैं। मगर इस फिल्म की पटकथा पेश करने का जो तरीका अपनाया गया है वह अनोखा है।
कहानी की गति रुक-रुक कर चलती है, दृश्य बहुत चमकीले लगते हैं, चेहरे फोटोशॉप किए हुए से लगते हैं मानो आप कई छोटे वीडियो देख रहे हों। कुछ फ्लैशबैक एनीमे शैली के हैं। इस साल जनवरी में रिलीज होने के तुरंत बाद ‘तस्करी’ नेटफ्लिक्स पर वैश्विक तालिका में सबसे ऊंचे पायदान पर पहुंच गई और तीन सप्ताह तक वहीं बनी रही।
आदित्य धर की ‘धुरंधर’(हाल के समय की सबसे हिट फिल्मों में से एक) जासूसों की कहानी बताने के लिए एक अनोखे, आठ-चैप्टर वाले कथानक का उपयोग करती है। ध्यान दें कि ये ‘सेवरेंस’ या ‘प्लुरिबस’ जैसी अनोखी कहानियां नहीं हैं, जो ऐपल टीवी पर उपलब्ध हैं। ये बस ऐसी कहानियां हैं जो सौंदर्य और अन्य दृष्टि से एक नए तरीके से तैयार की गई हैं। पिछले एक दशक में सामग्री की बाढ़ से प्रभावित नए दर्शकों को समझने की कोशिश कर रहे कहानीकारों के लिए ये फिल्में उम्मीद की एक किरण लेकर आई हैं।
भारत में अब 900 से अधिक टीवी चैनल, हजारों समाचार पत्र और 860 से अधिक रेडियो चैनल हैं। हम एक सामान्य वर्ष में 1,600 से अधिक फिल्में बनाते हैं। स्ट्रीमिंग को लोकप्रिय हुए एक दशक से अधिक समय हो गया है और शॉर्ट वीडियो को आए छह साल हो गए हैं। पिछले दो वर्षों में इस सूची में अति संक्षिप्त नाटक (माइक्रो ड्रामा) भी जुड़ गए हैं। 60 से अधिक वीडियो स्ट्रीमिंग ऐप और एक दर्जन संगीत स्ट्रीमिंग ऐप के साथ अब सामग्री का एक विशाल भंडार उपलब्ध है। इसकी व्यापकता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि यूट्यूब हर मिनट 500 घंटे का वीडियो अपलोड करता है। यह लेख केवल उन 52.3 करोड़ भारतीयों की बात कर रहा है जो ब्रॉडबैंड इंटरनेट से जुड़े लैपटॉप, टीवी या फोन का उपयोग करते हैं।
अब अधिक सामग्री देखने के पहलू पर विचार करते हैं। हम बिल्ली और कुत्ते के वीडियो से लेकर वेब सीरीज, दोस्त की शादी के डांस वीडियो, उडोन नूडल्स बनाने के वीडियो और पूरी फिल्म तक न जाने कितनी चीजें देखते रहते हैं। अलग-अलग शैलियों, भाषाओं, देशों और संस्कृतियों के बीच लगातार विचरते रहने से हमारे दिमाग में एक तरह का बदलाव आया है जिसका अध्ययन दुनिया भर के शोधकर्ता कर रहे हैं। एक अध्ययन में पाया गया है कि ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल करने वालों का ध्यान सिर्फ 8 सेकंड तक ही टिक पाता है, जो एक गोल्डफिश के 9 सेकंड से भी कम है।
अब सवाल है कि इस दर्शक वर्ग को कहानी कैसे सुनाई जाए? अगर कहानियां दिमाग को तरोताजा कराने और जागरूक बनाने का जरिया हैं तो उन्हें देखने का हमारा तरीका बदल गया है। अगर वे कला का एक नमूना हैं तो हमारा नजरिया बदल गया है। इसके लिए कहानियों में नहीं बल्कि कहानी कहने के तरीके या इसकी शैली में बदलाव की जरूरत है ताकि यह कहानियों की भरमार और अतिशयता में अलग दिखे और लोगों को समझने, सराहना करने और बार-बार देखने के लिए खींच सके। ‘तस्करी’ या ‘धुरंधर’ के निर्माता यही कोशिश कर रहे हैं। इस व्यवसाय की अर्थव्यवस्था उनकी इस क्षमता पर निर्भर करती है।
यहां दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली बात, यह सिर्फ सामग्री देखने में बिताए गए समय की बात नहीं है। कॉमस्कोर के आंकड़ों के अनुसार अक्टूबर 2025 में भारत में ऑनलाइन उपभोग (समाचार, मनोरंजन और सोशल मीडिया) प्रतिदिन 2 घंटे था। टीवी (लगभग 4 घंटे) और अन्य मीडिया को शामिल कर दें तो यह आंकड़ा एक तिहाई से अधिक भारतीयों के लिए प्रतिदिन 7-8 घंटे के करीब पहुंच जाता है। यह औसत पिछले कुछ वर्षों से बना हुआ है।
दूसरी बात, यहां मसला ‘सामग्री की गुणवत्ता’ का नहीं है। ‘कोहरा’ (नेटफ्लिक्स) और ‘द फैमिली मैन’ (एमेजॉन प्राइम वीडियो) से लेकर ‘फ्रीडम ऐट मिडनाइट’ (सोनीलिव) तक भारतीय स्टूडियो विश्व-स्तरीय शो और फिल्में बना रहे हैं। ‘इक्कीस’, ‘मंजुम्मेल बॉयज’, ‘12वीं फेल’ या ‘लापता लेडीज’ जैसी फिल्में उल्लेखनीय हैं।
मसला फिल्म निर्माण या कहानी कहने के नए तरीके की जरूरत के बारे में है। यह सब कुछ दशकों में दिखता है। यश चोपड़ा ने 1965 में फिल्म ‘वक्त’ बनाकर इसे बदल दिया। कई सितारों वाली भारत की पहली इस फिल्म में चार समानांतर कहानियां हैं जो अंत में एक जगह मिल जाती हैं। ऐसे दौर में जब कहानियां ज्यादातर सीधी-सादी होती थीं और दो किरदारों के घिसे-पिटे स्वरूप पर आधारित होती थीं उस समय ‘वक्त’भीड़ से अलग हटकर एक बड़ी हिट बन गई। जल्द ही कई सितारों वाली बिछुड़ने और मिलने के फॉर्मूले पर आधारित फिल्मों का चलन शुरू हो गया।
1980 के दशक में गोविंद निहलानी की ‘अर्ध सत्य’ या कुंदन शाह की ‘जाने भी दो यारो’ जैसी फिल्मों में यथार्थवाद कहानी कहने का तरीका बन गया। उनका लहजा और अंदाज उस दौर की औसत दर्जे की फिल्मों की तुलना में कहीं अधिक यथार्थवादी और वास्तविक था। कहानियां वही थीं- दोस्ती, न्याय, प्यार और परिवार।
अब बात करते हैं 2001 के बाद की फिल्मों की यानी उस साल फरहान अख्तर की आई फिल्म ‘दिल चाहता है’ के बाद के एक दशक की। फिल्मों का रूप-रंग नया हो गया, कहानियां ज्यादा वास्तविक लगने लगीं और निर्माण का स्तर बढ़ गया। ‘कमीने’ और ‘रंग दे बसंती’ से लेकर ‘कल हो ना हो’ और ‘चक दे इंडिया’ तक जैसी फिल्में आकर्षक और खुशनुमा लगने लगीं।
इनमें से प्रत्येक बदलाव आर्थिक और सामाजिक कारकों से प्रेरित था। उदाहरण के लिए नई शताब्दी के आरंभ में मल्टीप्लेक्सों का उदय। संपन्न दर्शक जिन्होंने सिनेमाघरों से दूरी बना ली थी और घर पर वीडियो और सैटेलाइट टेलीविजन देख रहे थे, वे धीरे-धीरे वापस लौटने लगे। मगर उनकी सोच बदल चुकी थी। भारत ने आर्थिक उदारीकरण का एक सुखद दशक देखा था और रंग तथा चमक ने इसे बखूबी प्रतिबिंबित किया। यह ठीक उसी तरह हुआ जैसे 1980 के दशक की बदहाली एवं आर्थिक पिछड़ापन और मीडिया विकल्पों की कमी उस समय की फिल्मों में साफ झलकती थी।
इसी तरह, आज हमारे मीडिया और मनोरंजन जगत में आई सामग्री की बाढ़ फिल्मों और शो की गिरती सफलता दर और बढ़ती लागत में परिलक्षित होती है। उम्मीद तो यही है कि कहानी कहने का एक नया तरीका परेशान और बेचैन दर्शकों के साथ जुड़ पाएगा।