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Editorial: आसान और कठिन चुनौतियां

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भारत अगर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा जो एक उल्लेखनीय कामयाबी होगी।

Last Updated- July 28, 2023 | 9:31 PM IST

लंबी दूरी की प्रतियोगिताओं में साइकल चालक एक ऐसी आकृति बनाते हैं जो पक्षियों के एक समूह जैसी नजर आती है। इस आकृति में सबसे आगे मौजूद साइकल चालक पीछे आने वाले चालकों के सामने उदाहरण रखता जाता है कि उन्हें किस एंगल पर साइकल चलानी है ताकि उन्हें मुश्किल न हो।

हर थोड़ी-थोड़ी देर में कोई दूसरा साइकल चालक नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल लेता है। लंबी अवधि में आर्थिक वृद्धि भी कुछ इसी तरह व्यवहार करती है। वहां अग्रणी क्षेत्र अर्थव्यवस्था की वृद्धि की गति तय करता है और समय के साथ अलग-अलग क्षेत्र सतत विकास की दर को बरकरार रखते हैं।

भारत के साथ भी बीते तीन या चार दशकों में ऐसा ही कुछ हुआ है। आर्थिक वृद्धि की गति में इजाफा हुआ और 1970 के दशक के 2.5 फीसदी से बढ़कर वह 1980 के दशक में 5.5 फीसदी हो गई। इसी दौरान मध्य वर्ग का उदय हुआ। इससे कई तरह की उपभोक्ता वस्तुओं की मांग शुरू हुई। इसमें दैनिक उपयोग की वस्तुओं से लेकर टिकाऊ वस्तुओं तक सभी शामिल थीं। वाहन उद्योग भी इससे काफी लाभान्वित हुआ और मारुति जैसी छोटी कारों से लेकर समकालीन दोपहिया वाहनों के मॉडलों की बाढ़ आ गई।

अगला चरण सन 1990 के दशक में आरंभ हुआ

अगला चरण सन 1990 के दशक में आरंभ हुआ जब इन्फोटेक बूम आया और तकनीकी बदलाव का दौर शुरू हुआ। भारत की किफायती इंजीनियरिंग श्रम शक्ति विदेश जाकर काम करने लगी। पेटेंट व्यवस्था आदि में भी बदलाव हुए और इन बदलावों ने ही औषधि उद्योग को यह अवसर प्रदान किया कि वह अमेरिका के जेनरिक बाजार का फायदा उठाए और तेजी से विकास करे।

इन क्षेत्रों ने निर्यात की तेजी पैदा की जो वृद्धि का एक और कारक बनी। सन 1990 के सुधारों के बाद निजी क्षेत्र का दखल बढ़ा और बैंकिंग, वित्त तथा नागर विमानन जैसे क्षेत्रों में भी तेजी आई। इससे आवास, कार खरीद और यात्रा आदि क्षेत्रों में मांग बढ़ी।

हाल के वर्षों में अगर वृद्धि में धीमापन आया है तो ऐसा इसलिए हुआ कि कोई ऐसा क्षेत्र उभरकर सामने नहीं आया है जो शीर्ष साइकल चालक की भूमिका निभा सके। इस बीच औषधि क्षेत्र समय से पहले अपनी गति गंवा बैठा क्योंकि इस उद्योग का कार्य व्यवहार सही नहीं रहा और नियामकीय मोर्चे पर भी नाकामियां हाथ लगीं। अब इन्फोटेक की तेजी में धीमापन आ चुका है और यह परिपक्व हो चुकी है।

नोटबंदी, कोविड जैसे एक के बाद एक लगे झटकों के कारण घरेलू उपभोक्ताओं की मांग प्रभावित हुई। उदाहरण के लिए दोपहिया वाहनों की बिक्री में ठहराव आ गया। एक वजह यह भी हो सकती है कि उपभोक्ताओं का ऋण का बोझ अब भारत के आय के स्तर के हिसाब से काफी अधिक है।

जहां तक नागर विमानन की बात है भारत में केवल एक कंपनी है जो किसी तरह व्यवहार्य बनी हुई है और केवल वही वृद्धि के लिए निवेश कर सकती है। इस बीच वाणिज्यिक निर्यात का प्रदर्शन भी बीते दशक में कमजोर रहा है।अर्थव्यवस्था एक प्रतिस्पर्धी विनिर्माण आधार तैयार करने में भी नाकाम रही और हम वियतनाम तथा बांग्लादेश की तुलना में पीछे रह गए।

कौन सा क्षेत्र भारत की वृद्धि के अगले चरण का नेतृत्व करेगा?

यहां सवाल यह है कि आखिर कौन सा क्षेत्र भारत की वृद्धि के अगले चरण का नेतृत्व करेगा? सरकार ने नाकामी के क्षेत्र को लेकर एक साहसी दांव खेला है और वह क्षेत्र है विनिर्माण। ‘मेक इन इंडिया’ की पहल अपेक्षित परिणाम दे पाने में नाकाम रही।

ऐसे में सवाल यह है कि अब निवेश और उत्पादन के लिए आखिर क्या वित्तीय प्रोत्साहन मौजूद हैं? हम जहां इस आयात प्रतिस्थापन की पहल के परिणामों की प्रतीक्षा करेंगे, वहीं वृद्धि का इंजन भौतिक बुनियादी ढांचे में भारी सरकारी निवेश की मदद से चालू रखा गया है। इसी के चलते धातु और सीमेंट जैसे संबद्ध क्षेत्रों में निजी निवेश जारी है।

अधोसंरचना क्षेत्र में निवेश तथा विनिर्माण क्षेत्र के प्रोत्साहन सरकार की वित्तीय स्थिति पर दबाव डालेंगे। ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अधिकांश नई पहल अपनी प्रकृति में गहन पूंजी की आवश्यकता वाली हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हमें उत्पादन वृद्धि के लिए लगातार नई पूंजी की आवश्यकता होगी। ऐसी वृद्धि से रोजगार भी बहुत सीमित तैयार होंगे। ऐसे में खपत की गति धीमी होगी और वृद्धि में धीमापन आएगा। परंतु एक धीमी पड़ती विश्व अर्थव्यवस्था में भारत को 5.5 से 6 फीसदी की गति से तेज वृद्धि हासिल करनी होगी ताकि विदेशी निवेश की आवक बरकरार रहे।

प्रधानमंत्री की ‘गारंटी’

इस प्रकार अगर प्रधानमंत्री की ‘गारंटी’ की बात करें तो भारत अगले पांच वर्षों के दौरान इतनी वृद्धि की उम्मीद तो कर ही सकती है कि वह स्थिर हो चुकी जापान की अर्थव्यवस्था तथा धीमी गति से बढ़ती जर्मनी की अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ सके।

इस तरह वह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा जो एक उल्लेखनीय कामयाबी होगी। यह काम बिना बहुत अधिक मेहनत के हो सकता है। परंतु वास्तविक अहम प्रश्न यह है कि क्या भारत तब बहुआयामी गरीबी से भी निजात पा सकेगा। गरीबी की यह अवधारणा न्यूनतम आय, शिक्षा और जीवन गुणवत्ता (पेयजल, स्वच्छता और बिजली) से
संबंधित है। अगर हम वास्तविक परिवर्तन चाहते हैं तो हमें इसे हल करना होगा।

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First Published - July 28, 2023 | 9:31 PM IST

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