देश में काफी मात्रा में मौजूद कृषि अवशिष्टों से दूसरी पीढ़ी के गैसोलिन बना कर भारत इसकी लगभग आधी मांग पूरी कर सकता है।
डेनमार्क आधारित बायोटेक संगठन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी स्टीन रिसगार्ड ने बताया, दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन भारत की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है। इससे ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन में कमी आएगी। देश में घरेलू स्तर पर जैव ईंधन के उत्पादन से अर्थव्यवस्था और रोजगार में बढ़ोतरी होगी।
उन्होंने बताया कि 2020 में भारत की गैसोलिन जरूरतों की 59 प्रतिशत मांग दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन से पूरी करने की क्षमता है। इससे विदेश से आयात होने वाले तेल पर अत्यधिक निर्भरता में कमी आएगी और वाहनों में इस्तेमाल किए जाने वाले ईंधन में आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ेगा।
रिसगार्ड ने दावा किया कि उनकी कंपनी दुनिया में जैव ईंधन के 60 प्रतिशत कारोबार पर नियंत्रण रखती है यह अमेरिका, लातिन अमेरिका, यूरोप, चीन और भारत में दूसरी पीढ़ी के एथनॉल में अपनी साझेदारी के साथ काम कर रही है। यह जैव ईंधन आधारित समाज बनाने की दिशा में कदम है।
जारी भाषा