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‘वोकल फॉर लोकल’ ने दिया देसी कारोबारियों को बल

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Last Updated- December 14, 2022 | 9:12 PM IST

गोरखपुर के टेराकोटा शिल्पी दयाराम प्रजापति के लिए हर साल दीवाली का मतलब आम दिनों से कुछ बेहतर कमाई होता था। मगर इस बार राजधानी लखनऊ में सामान बेचने पहुंचे दयाराम की दीवाली वाकई रोशना हो गई। शिल्पियों के दीवाली मेले में तीन दिन के भीतर उनका सारा माल बिक गया और दो बार कारखाने से माल मंगवाना भी पड़ा। दयाराम ने बताया कि यह दीवाली चार गुना ज्यादा कमाई वाली रही।
कन्नौज के इत्र कारोबारियों और मुरादाबाद के पीतल कारीगरों के लिए भी यह दीवाली खास रही। आम तौर पर निर्यात किए जाने वाले इत्र और पीतल के सामान की दीवाली पर देसी बाजार में जमकर बिक्री हुई। लखनऊ में चिकन कारोबारी अजय खन्ना को तो दीवाली से पहले पूरे हफ्ते हल्के सर्द मौसम के बावजूद आधी रात तक दुकान खोलनी पड़ी। खन्ना ने बताया कि  इस दीवाली लखनवी चिकन की ऐसी बिक्री हुई है कि मंदी या कोरोना के डर का अहसास ही नहीं हुआ।
उत्तर प्रदेश में इस बार असली दीवाली मिट्टी के दीये, बर्तन और खिलौने बनाने वाले कुम्हारों, हस्तशिल्पियों, बुनकरों तथा छोटे उद्यमियों की हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘वोकल फॉर लोकल’ का जो नारा दिया, उसका जनता पर खासा असर पड़ा और इन शिल्पियों तथा कारोबारियों के उत्पाद खूब बिके। इस बार कंपनियों ने भी दीवाली पर तोहफों के लिए देसी उत्पाद बड़ी मात्रा में खरीदे। कन्नौज के इत्र, मुरादाबाद के पीतन के सामान, फिरोजाबाद के कांच के उत्पाद और चिकनकारी उत्पादों की मांग कुछ ज्यादा ही रही। प्रदेश सरकार ने केंद्र और दूसरे राज्यों की महत्त्वपूर्ण हस्तियों के लिए खुद भी उपहार में स्थानीय विशिष्ट उत्पाद ही भेजे।
प्रदेश सरकार की एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना के तहत शामिल खास शिल्प उत्पादों की ऑनलाइन प्लेटफॉर्म एमेजॉन पर 24 करोड़ रुपये से ज्यादा की बिक्री हुई है। इनमें रेशमी कपड़े, कालीन, जरी-जरदोजी, पीतल, टेराकोटा, पॉटरी, गुड़ समेत तमाम उत्पाद शामिल हैं। मिट्टी के सामान में दीयों के साथ ही बर्तनों की बिक्री भी खूब रही। प्रदेश सरकार के माटी कला बोर्ड की सहायता से खुर्जा के कारीगरों के मिट्टी के प्रेशर कुकर, पानी की बोतल, कड़ाही और तवे हरेक जिले में पहुंचे और लोगों में उनकी खासी मांग भी रही। गोरखपुर की टेराकोटा से बनी लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों की मांग देश में सबसे ज्यादा रही। महिला स्वयं सहायता समूहों, और स्वयंसेवी संस्थाओं ने गोसेवा आयोग की मदद से गोबर और मिट्टी के दीये बनाए, जिनकी प्रदेश में ही नहीं बल्कि गुजरात, महाराष्ट्र और पंजाब तक में खूब बिक्री हुई। माटी कला बोर्ड ने लखनऊ में दीवाली मेला लगाया, जिसमें खरीदारों ने दस्तकारों का बनाया सामान पूरे जोश के साथ खरीदा।
कारोबारियों के मुताबिक चीनी उत्पादों के बहिष्कार की भावना भी मिट्टी के सामान की बिक्री बढऩे के पीछे अहम कारण रही। इसी के कारण इस दीवाली पर मिट्टी के दीयों की रिकॉर्ड बिक्री हुई। चीन विरोधी भावना का फायदा गाजियाबाद और कानपुर के उन कारोबारियों को भी हुआ, जो बिजली की झालर और सजावटी सामान बनाते हैं। इन कारोबारियों को जमकर ऑर्डर मिले। कानपुर की मानीराम बगिया में देसी झालर निर्माण का अड्डा है। वहां के कारोबारियों ने बताया कि हर साल दीवाली पर मुश्किल से 20-30 करोड़ रुपये का कारोबार होता था मगर इस बार 140 करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार हो गया।
कानपुर में बिजली का सामान बनाने वालों को त्योहारी सीजन से काफी पहले ऑर्डर मिलने लगे थे और मंदी के बीच भी पिछले साल से कई गुना ज्यादा मांग बाजार में रही। हाथ की झालरों की मांग तो इतनी बढ़ गई कि कानपुर के कारोबारियों को दूसरे जिलों के कारीगरों से माल बनवाना पड़ा। झालरों का कारोबार करने वाले अजय त्रिवेदी ने बताया कि चीनी झालरों से मुंह मोड़कर लोगों ने देसी झालरों को इतना अपनाया कि पहले के मुकाबले तीन गुना ज्यादा लोगों को काम मिल गया।
गाजियाबाद और कानपुर के कारोबारियों ने चीनी माल का मुकाबला करने के लिए इस बार सस्ती झालरें भी बनवाई थीं, जिनकी जमकर बिक्री हुई। लखनऊ में बिजली का सामान बेचने वाले कुलदीप सिंह ने कहा कि देसी माल को लेकर लोगों में ऐसा ही प्यार बना रहा तो चीन के उत्पादों का बोरिया-बिस्तर बंध जाएगा। उन्होंने बताया कि देसी झालर में तांबे के तार का इस्तेमाल होता है, जिससे रोशनी भी ज्यादा होती है। एक बार इनका इस्तेमाल करने वाले आगे भी इन्हें ही खरीदेंगे। उन्होंने कहा कि स्वदेशी झालरों में मुनाफा ज्यादा होता है, जिसक कारण इस बार सस्ती झालर भी बनाई गईं। उन्होंने बताया कि 10 मीटर की देसी झालर बनाने में 20 रुपये का खर्च आता है और थोक बाजार में यह 55 रुपये की बिक जाती है। इस तरह बनाने वाले को ही एक झालर पर 20-25 रुपये बच जाते हैं। चीनी झालर में मुश्किल से 5-10 रुपये हाथ आते हैं।

दीवाली पर बाजारों में जमकर बरसा धन
उत्तर प्रदेश के बाजारों में दीवाली पर न तो मंदी दिखी और न ही कोरोनावायरस का डर दिखा और जमकर धन बरसा। राजधानी लखनऊ में ही केवल धनतेरस के दिन 1,800 करोड़ रुपये का कारोबार हो गया। वाहनों की बिक्री ने नया रिकॉर्ड बनाया तो इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों की दुकानें भी ग्राहकों से खचाखच भरी रहीं।
लखनऊ में सराफा कारोबारी गद्गद हैं क्योंकि एक ही दिन में 200 करोड़ रुपये का सोना-चांदी बिक गया। दीवाली पूजन के लिए जरूरी कहलाने वाले चांदी के सिक्कों की बिक्री तो इतनी ज्यादा हुई कि ज्यादातर सराफों के यहां स्टॉक ही खत्म हो गया। वाहन कारोबारी भी सराफों से कम खुश नहीं हैं क्योंकि दीवाली पर दो दिन में ही राजधानी में 650 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड बिक्री हुई, जो पिछले साल दीवाली की 500 करोड़ रुपये की बिक्री से बहुत अधिक है।
बाजार ऐसा सजा कि शहर में 20 करोड़ रुपये के बर्तन ही बिक गए। स्टील के साथ ही इस बार तांबे और पीतल के बर्तनों की भी भारी मांग रही। संक्रमण के डर से खाने-पीने की दुकानों से दूरी बरत रहे ग्राहकों ने सारी झिझक किनारे रखकर मिठाइयों की जमकर खरीदारी की। दुकानों पर ऐसी कतारें लगीं कि कारोबारियों के मुताबिक धनतेरस पर ही 40 करोड़ रुपये का कारोबार हो गया। मिठाई और मेवे के गिफ्ट पैक की मांग में पिछले साल के मुकाबले रत्ती भर भी कमी नहीं रही।
ऑनलाइन बिक्री देश भर में बाजारों को परेशान कर रही है मगर लखनऊ में दुकानों से मोबाइल फोन और स्मार्ट टीवी खूब खरीदे गए। कारोबारियों के मुताबिक 10,000 से 15,000 रुपये तक के फोन सबसे ज्यादा मांग में रहे और स्मार्ट टीवी के लिए 70-75 हजार रुपये खर्य करने में ग्राहकों को झिझक नहीं हुई। रसोई के उपकरण भी बड़ी तादाद में बिके।
लखनऊ मर्चेंट एसोसिएशन के संदीप सेठ ने बताया कि कई जगह स्टॉक कम पडऩे के कारण या शादी-ब्याह होने के कारण लोगों ने आगे लिए बुकिंग भी दीवाली के मौके पर ही करा ली। इससे उम्मीद बंधी है कि कारोबार आगे भी चमकता रहेगा।

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First Published - November 16, 2020 | 11:51 PM IST

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