NITI Aayog Vice-Chairman Suman Bery at BS Manthan
BS Manthan 2026: भारत सरकार के नीति आयोग के उपाध्यक्ष Suman Bery ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा कि देश के प्रमुख नीति थिंक टैंक नीति आयोग को भविष्य में “प्रोडक्टिविटी कमीशन” के रूप में नए स्वरूप में देखा जा सकता है। उनका मानना है कि भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश का पूरा फायदा तभी मिल सकेगा जब उत्पादकता में निरंतर और ठोस सुधार किया जाए।
नई दिल्ली स्थित Bharat Mandapam में आयोजित बिजनेस स्टैंडर्ड के प्रमुख कार्यक्रम ‘बीएस मंथन’ के दौरान ‘ए पाथ टुवर्ड्स अ मॉडर्न इंडिया’ विषय पर बातचीत करते हुए बेरी ने कहा कि आने वाले 25 वर्षों में भारत की कामकाजी आयु वर्ग की आबादी में सबसे अधिक वृद्धि देखने को मिलेगी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अवसर जितना बड़ा है, उतनी ही बड़ी चुनौती भी है। यदि इस बढ़ती कार्यबल को बेहतर कौशल और उच्च उत्पादकता से नहीं जोड़ा गया, तो देश अपेक्षित आर्थिक परिणाम हासिल नहीं कर पाएगा।
बेरी ने अंतरराष्ट्रीय अनुभवों का उल्लेख करते हुए बताया कि ऑस्ट्रेलिया में एक स्वतंत्र ‘प्रोडक्टिविटी कमीशन’ कार्यरत है, जो नीतियों के प्रभाव और उत्पादकता सुधार पर ध्यान देता है। उन्होंने कहा कि कभी कभी यह विचार उनके मन में आता है कि नीति आयोग को भी इसी तरह उत्पादकता केंद्रित संस्था के रूप में पुनः परिभाषित किया जा सकता है।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं है, बल्कि एक विचार है जिस पर विमर्श किया जा सकता है।
बेरी ने कहा कि भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश और वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनने का लक्ष्य एक दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि श्रम उत्पादकता में पर्याप्त सुधार नहीं हुआ, तो युवा आबादी का लाभ पूरी तरह प्राप्त नहीं किया जा सकेगा।
उनका कहना था कि भारत की श्रम उत्पादकता कमजोर नहीं है, लेकिन यह अभी भी चीन जैसे देशों की तुलना में काफी पीछे है। ऐसे में भारत को दो मोर्चों पर काम करना होगा। पहला, श्रम बल भागीदारी दर को बढ़ाना और दूसरा, यह सुनिश्चित करना कि श्रम बाजार में शामिल होने वाले नए लोगों की वजह से प्रति व्यक्ति उत्पादन में गिरावट न आए।
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बेरी ने संकेत दिया कि उत्पादकता केवल उद्योग या विनिर्माण क्षेत्र तक सीमित मुद्दा नहीं है। इसमें शिक्षा, कौशल विकास, तकनीकी नवाचार और बेहतर प्रबंधन प्रणाली जैसी कई बातें शामिल हैं। यदि इन क्षेत्रों में समन्वित प्रयास किए जाएं तो भारत अपनी आर्थिक क्षमता को नई ऊंचाई दे सकता है।
महिला श्रम भागीदारी बढ़ाना भारत के विकास की बड़ी कुंजी
देश की आर्थिक प्रगति को नई रफ्तार देने के लिए महिला श्रम भागीदारी को बढ़ाना बेहद अहम माना जा रहा है। नीति विशेषज्ञ का मानना है कि भारत के पास बड़ी संख्या में ऐसी महिलाएं हैं, जो कामकाजी उम्र में होने के बावजूद अभी श्रमबल का हिस्सा नहीं हैं। यदि इस वर्ग को संगठित और उत्पादक रूप से रोजगार से जोड़ा जाए तो अर्थव्यवस्था को उल्लेखनीय गति मिल सकती है।
वर्तमान आंकड़ों के अनुसार लगभग 183 मिलियन महिलाएं देश की कार्यशक्ति का हिस्सा हैं, जबकि करीब 264 मिलियन कामकाजी उम्र की महिलाएं अभी कार्यबल से बाहर हैं। यह अंतर अपने आप में एक बड़ा अवसर प्रस्तुत करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस संभावित श्रमशक्ति को सही नीतियों और सहयोगी वातावरण के माध्यम से सक्रिय किया जाए तो यह भारत की विकास दर को स्थायी रूप से ऊंचा उठा सकता है।
हालांकि, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना केवल रोजगार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। इसके लिए सामाजिक सोच में बदलाव, सुरक्षित कार्यस्थल, लचीले कामकाजी घंटे, मातृत्व सहयोग और गुणवत्तापूर्ण बाल देखभाल सुविधाओं जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना जरूरी होगा। कई महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों और सामाजिक अपेक्षाओं के कारण नौकरी से दूर रहती हैं। ऐसे में नीति निर्माण के दौरान इन बाधाओं को दूर करने पर विशेष ध्यान देना होगा।
साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कार्यबल में महिलाओं की संख्या बढ़ने से उत्पादकता पर प्रतिकूल असर न पड़े। नीति आयोग के उपाध्यक्ष बताते हैं कि श्रम उत्पादकता और प्रति व्यक्ति वास्तविक आय के बीच लगभग सीधा संबंध होता है। यदि भारत वर्ष 2047 तक प्रति व्यक्ति आय को 18,000 डॉलर तक ले जाना चाहता है, तो श्रम उत्पादकता को मौजूदा लगभग 3,000 डॉलर के स्तर से कई गुना बढ़ाना होगा। इसका अर्थ है कि केवल अधिक लोगों को रोजगार देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी कार्यकुशलता और कौशल स्तर में भी उल्लेखनीय सुधार करना होगा।
निवेश और शहरीकरण की भूमिका
तेज आर्थिक विकास के लिए निवेश दर में वृद्धि भी आवश्यक मानी जा रही है। जैसे जैसे कामकाजी उम्र की आबादी बढ़ रही है, वैसे वैसे प्रति श्रमिक पूंजी का स्तर घटने से बचाना जरूरी है। यदि पूंजी निवेश पर्याप्त नहीं हुआ तो उत्पादन क्षमता सीमित हो सकती है।
बेरी का अनुमान है कि भारत को अपनी निवेश दर में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में 2 से 3 प्रतिशत अंकों की बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है। घरेलू निवेश, ऊर्जा परिवर्तन से जुड़े प्रोजेक्ट और तेजी से बढ़ता शहरीकरण पूंजी की मांग को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख कारक होंगे। स्वच्छ ऊर्जा, आधारभूत ढांचा और स्मार्ट शहरों का विकास आने वाले वर्षों में बड़ी भूमिका निभाएगा।
निर्यात बढ़ाना भी जरूरी
तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था में आयात भी बढ़ते हैं। ऐसे में व्यापार संतुलन बनाए रखने के लिए निर्यात में मजबूती आवश्यक होगी। वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए भारतीय उत्पादों और सेवाओं को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना होगा। यदि वैश्विक व्यापार की वृद्धि धीमी रहती है, तो प्रतिस्पर्धा और भी तीखी होगी। इसलिए गुणवत्ता, लागत नियंत्रण और नवाचार पर विशेष जोर देना होगा।
सेवाओं पर जोर, कौशल विकास और भविष्य की रणनीति पर नई सोच की जरूरत
नीति आयोग के उपाध्यक्ष बेरी ने कहा है कि भारत को रोजगार के पारंपरिक मॉडल पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता है। अब तक यह माना जाता रहा है कि असंगठित और कम कुशल श्रमिकों के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार केवल विनिर्माण क्षेत्र से ही पैदा हो सकते हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में सेवा क्षेत्र भी बड़ी संभावनाएं लेकर सामने आया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि सेवा क्षेत्र को सही नीतिगत समर्थन, प्रशिक्षण और संरचनात्मक सुधार दिए जाएं तो यह लाखों युवाओं के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध करा सकता है। पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाएं, डिजिटल सेवाएं, लॉजिस्टिक्स और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में तेजी से विस्तार हो रहा है, जिसका लाभ उठाया जा सकता है।
बेरी ने कहा कि केवल डिग्री आधारित शिक्षा से रोजगार की समस्या का समाधान संभव नहीं है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत मजबूत अप्रेंटिसशिप कार्यक्रमों और आजीवन सीखने की व्यवस्था को प्राथमिकता देने की बात कही। उनके अनुसार युवाओं को पढ़ाई के साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण मिलना चाहिए ताकि वे सीधे कार्यक्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि उच्च शिक्षा को केवल सरकारी नौकरी प्राप्त करने का माध्यम समझना उचित नहीं है। आज के दौर में निजी क्षेत्र और उद्यमिता में भी व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। ऐसे में शिक्षा प्रणाली को इस तरह ढालना होगा कि विद्यार्थी बदलती आर्थिक जरूरतों के अनुरूप कौशल हासिल कर सकें।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के प्रभाव को लेकर बेरी ने संतुलित रुख अपनाने की सलाह दी। उनका कहना है कि एआई से उत्पादकता में कितना सुधार होगा, इस पर अभी स्पष्टता नहीं है। इसलिए सरकार और नीति निर्माताओं को किसी एक तकनीक पर अत्यधिक निर्भर होने के बजाय ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो हर संभावित परिस्थिति में लाभकारी साबित हों।
उन्होंने इसे “नो रिग्रेट” रणनीति बताया, यानी ऐसी योजनाएं जिनसे अर्थव्यवस्था को फायदा हो, चाहे भविष्य में तकनीकी बदलाव किसी भी दिशा में क्यों न जाएं। उदाहरण के तौर पर बुनियादी ढांचे में निवेश, डिजिटल साक्षरता, कौशल प्रशिक्षण और नवाचार को बढ़ावा देना ऐसी पहलें हैं जो हर हाल में उपयोगी रहेंगी।
बेरी का मानना है कि भारत को रोजगार और विकास के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। विनिर्माण और सेवा दोनों क्षेत्रों के बीच संतुलन बनाते हुए कौशल आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में कदम बढ़ाना समय की मांग है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में लचीली और दूरदर्शी नीतियां ही देश को स्थायी विकास की राह पर आगे बढ़ा सकती हैं।