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उदारीकरण के 35 साल: अधूरे सुधारों से औद्योगीकरण को नहीं मिला बढ़ावा, रणनीतिक नीति जरूरी

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नैयर वीपी सिंह, चंद्रशेखर और पी वी नरसिंह राव के नेतृत्व वाली सरकारों के दौरान वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार थे

Last Updated- August 30, 2026 | 9:57 PM IST
Deepak Nayyar
1991 के आर्थिक सुधार तत्कालीन सरकारों द्वारा संकट प्रबंधन के प्रयासों का परिणाम थे। यह कहना है दीपक नैयर का।

1991 के आर्थिक सुधार तत्कालीन सरकारों द्वारा संकट प्रबंधन के प्रयासों का परिणाम थे। यह कहना है दीपक नैयर का। नैयर वीपी सिंह, चंद्रशेखर और पी वी नरसिंह राव के नेतृत्व वाली सरकारों के दौरान वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। उनका कहना है कि राव सरकार ने जरूरी राजकोषीय बदलाव कर लिए, उसके बाद किए गए संरचनात्मक सुधारों में उन्हें पूरक बनाने वाली कुछ महत्त्वपूर्ण नीतियों का अभाव रहा। इसके परिणामस्वरूप भारत में लंबे समय में औद्योगिकरण में गिरावट आई। गिरीश चंद्र प्रसाद और असित रंजन मिश्र के साथ साक्षात्कार में नैयर ने भारत की सुधार यात्रा की कमजोरियों, आबादी का भरपूर फायदा उठाने और मध्य आय के जाल से बचने के लिए क्या करने की जरूरत है, इस पर चर्चा की। नैयर दिसंबर 1991 के अंत में तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के साथ मतभेदों के बीच वित्त मंत्रालय से बाहर हो गए और ​शिक्षा क्षेत्र में लौट आए। बातचीत के मुख्य अंश:

1991 के संकट की शुरुआत कैसे हुई?

मेरा मानना ​​है कि समस्या इंदिरा गांधी के दूसरे कार्यकाल के दौरान शुरू हुई लेकिन राजीव गांधी के पांच साल के कार्यकाल में यह ​​स्थिति काफी बिगड़ गई। मूल समस्या देश में और विदेशों से ली गई अत्यधिक उधारी थी। इसके कारण सरकार का राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ रहा था और अर्थव्यवस्था का चालू खाते का घाटा भी तेजी से बढ़ा। 1980 के दशक में राजकोषीय फिजूलखर्ची 1991 के व्यापक आर्थिक संकट के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार थी।

क्या आप बता सकते हैं कि 1991 में सरकार ने संकट से निपटने के लिए क्या-क्या उपाय किए थे?

मैं दो वर्षों तक मुख्य आर्थिक सलाहकार और वित्त मंत्रालय में सचिव रहा। मैं अकेला ऐसा सचिव था (तत्कालीन व्यय सचिव केपी गीताकृष्णन को छोड़कर) जिसने तीन प्रधानमंत्रियों सिंह, चंद्रशेखर और राव तथा तीन वित्त मंत्रियों – मधु दंडवते, यशवंत सिन्हा और मनमोहन सिंह के कार्यकाल में काम किया। यह स्वतंत्र भारत के सबसे गंभीर आर्थिक संकट का दौर था। 1980 के दशक की प्रतिस्पर्धी लोकलुभावन राजनीति और आसान रास्ते अपनाने वाली अवसरवादी राजनीति ने अस्थिर राजकोषीय व्यवस्था को जन्म दिया। न तो अर्थव्यवस्था और न ही सरकार अपनी क्षमता से अधिक खर्च करके चल सकती थी।

1990 में इराक द्वारा कुवैत पर हमले के कारण तेल की कीमतों का मामूली झटका बड़ी वजह बना। देश पर उधारी नहीं चुका पाने का खतरा मंडरा रहा था। राजनीतिक अनिश्चितताओं ने मुश्किलें और बढ़ा दीं। हर दिन संकट से निपटना और हर महीने किसी तरह गुजारना ही हमारी नियति बन गई थी। अल्पकालिक कर्ज 6 अरब डॉलर था, जिसे हर 24 घंटे में आगे बढ़ाना पड़ता था। 10 अरब डॉलर से अधिक की बकाया अनिवासी भारतीय जमा पूंजी पलायन के प्रति संवेदनशील थीं। विदेशी मुद्रा भंडार केवल 1 अरब डॉलर था यानी दो सप्ताह के आयात का खर्च चलाना भी दूभर था। अक्टूबर 1990 के मध्य में वीपी सिंह सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण लेने का फैसला किया। मैंने इस पूरी अवधि के दौरान एक साल तक आईएमएफ और विश्व बैंक के साथ बातचीत का नेतृत्व किया, जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर सी रंगराजन, आईएमएफ और विश्व बैंक में हमारे कार्यकारी निदेशक गोपी अरोड़ा और जगदीश बैजल, और तत्कालीन संयुक्त सचिव एन के सिंह ने सहायता की। यह एक सतत प्रक्रिया थी, जो नवंबर 1990 में शुरू हुई।

इसके बाद के चार महीनों में दो सरकारें गिर गईं और मई-जून 1991 में चुनाव होने तक लंबे समय राजनीतिक गतिरोध बना रहा। जनवरी 1991 में मैंने न्यूनतम शर्तों के साथ 1.8 अरब डॉलर प्राप्त करने के वास्ते पहले क्रेडिट खेप और क्षतिपूर्ति तथा आकस्मिक वित्तपोषण सुविधा (सीसीएफएफ) के तहत उधार लेने के लिए आईएमएफ के साथ बातचीत का नेतृत्व किया। यह सरकार की चूक से बचने की दृढ़ता थी और कठिन समय में भी भारत के कद ने हमें एक कठिन सौदा करने में मदद की।

फरवरी 1991 में पेश किया जाने वाला केंद्रीय बजट तैयार था लेकिन कांग्रेस ने कुछ दिन पहले ही समर्थन वापस ले लिया। अंतरिम बजट पेश किया गया। यशवंत सिन्हा सही कहते हैं कि यदि बजट पेश किया गया होता तो वह जुलाई 1991 में पेश किए गए बजट से बहुत अलग नहीं होता और उन्हें राजकोषीय समायोजन और संरचनात्मक सुधारों का श्रेय मिलता।

नकदी का संकट फिर से उभर आया। अनिवासी जमा भुनाए जाने से पूंजी की निकासी बढ़ गई। आयात पर नकद मार्जिन को 200 फीसदी तक बढ़ा दिया गया। अप्रैल 1991 में तस्करों से जब्त किए गए 20 करोड़ डॉलर का सोना बेचा गया, जिसे कार्यवाहक प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने मंजूरी दी थी। यह सब एक रोमांचक थ्रिलर जैसा था। रंगराजन बख्तरबंद वाहनों के काफिले के साथ यात्रा करते थे। हमने इस पूरी स्थिति को अखबारों की खबर बनने से बचाए रखा, जबकि उस समय मीडिया की कड़ी निगरानी थी।

एक समय स्थिति को लेकर अटकलों को रोकने के लिए कैबिनेट सचिव, वित्त सचिव और मैंने अखबारों के संपादकों को रात्रिभोज पर आमंत्रित किया। हमने उन्हें संकट की गंभीरता समझाई और सहयोग मांगा। हमने बताया कि सनसनीखेज सुर्खियां अंतरराष्ट्रीय विश्वास को नुकसान पहुंचा सकती हैं। मुझे कहना चाहिए कि इसके बाद स्थिति में सुधार हुआ। बहुत से लोग केंद्रीय बजट और आर्थिक सुधारों को जुलाई 1991 की किसी जादुई घटना के रूप में देखते हैं लेकिन यह उससे कहीं लंबी प्रक्रिया का हिस्सा था।

राजकोषीय समायोजन का खाका 1991 की शुरुआत में ही तैयार हो चुका था। यह कैबिनेट सचिव नरेश चंद्र, वित्त सचिव एस पी शुक्ला, आरबीआई गवर्नर एस वेंकटरमणन और मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में मेरे बीच हुई चर्चाओं पर आधारित था। इसके अलावा औद्योगिक और व्यापारिक नीतियों में संरचनात्मक सुधारों को लेकर उद्योग सचिव सुरेश माथुर, वाणिज्य सचिव मोंटेक सिंह आहलुवालिया और पेट्रोलियम सचिव अशोक चंद्र से भी विचार-विमर्श हुआ था।

राव सरकार के शुरुआती दिन कैसे रहे?

20 जून, 1991 को राव के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से एक शाम पहले नरेश चंद्र ने मुझे और एस पी शुक्ला को प्रधानमंत्री पद के लिए नामित राव को संकट के बारे में जानकारी देने के लिए बुलाया। मैंने संकट पर तीन पन्नों का एक नोट तैयार किया और उसके साथ आधे पन्ने का हस्तलिखित परिशिष्ट जोड़ा, जिसमें जरूरी कदमों का उल्लेख था। इनमें विनिमय दर में समायोजन, आरबीआई के स्वर्ण भंडार की 15 फीसदी संपत्ति को बैंक ऑफ इंगलैंड के पास गिरवी रखना, खाद्य और उर्वरक सब्सिडी में कटौती तथा पेट्रोलियम कीमतें बढ़ाकर राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 6.5 फीसदी तक लाने का उपया और औद्योगिक तथा व्यापार नीतियों में संरचनात्मक सुधारों की कुछ रूपरेखाएं शामिल थीं।

प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही राव को इन प्रस्तावित कदमों के बारे में बताया गया था। मैंने उन्हें यह सुझाव भी दिया था कि वे टेलीविजन पर देश को संबोधित करते हुए कठिन परिस्थितियों के बावजूद जनता को भरोसे का संदेश दें। उन्होंने अगले दिन हमारे द्वारा तैयार किए गए पाठ के आधार पर ऐसा किया।

अगले एक महीने में हमने कई महत्त्वपूर्ण कदम लागू किए। इनमें विनिमय दर में समायोजन, सभी निर्यात सब्सिडी समाप्त करना और आरबीआई के 15 फीसदी सोने को रिजर्व संप​त्ति के रूप में बाहर शामिल था। यह सब जुलाई 1991 के पहले दो सप्ताह में किया गया। 24 जुलाई, 1991 की सुबह नई औद्योगिक नीति की घोषणा हुई। राव के पास उस समय उद्योग मंत्रालय भी था। उसी शाम मनमोहन सिंह ने केंद्रीय बजट पेश किया। 1991 के मध्य में जो भी सरकार सत्ता में आती, वह यही कदम उठाती। सभी खाके पहले से तैयार थे। विकल्प बहुत सीमित थे।

जाहिर तौर पर इतने महत्त्वपूर्ण फैसले केवल एक महीने में तैयार या लागू नहीं किए जा सकते थे। इसके लिए पहले से योजना बनाई गई थी। अल्पमत सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में राव असाधारण थे। उन्होंने निर्णय लेने की क्षमता के साथ-साथ ऐसी सरकार का कुशल राजनीतिक प्रबंधन किया, जिसे संसद में अभी अपना बहुमत स्थापित करना बाकी था।

राव का शांत और कम बोलने वाला राजनीतिक प्रबंधन मुझे आश्चर्यचकित करता था। विडंबना यह है कि पीछे मुड़कर देखने पर 1991 के सुधारों का श्रेय राव के बजाय मनमोहन सिंह को दिया जाता है। इस तरह मिथक किंवदंती बन जाता है। लेकिन उस दौर के अभिलेख और रिकॉर्ड शोध के लिए उपलब्ध कराए जाएं तो किंवदंती शायद इतिहास न बन पाए।

सुधारों पर मनमोहन सिंह के साथ आपके क्या मतभेद थे?

मैं दिसंबर 1991 के अंत में सरकार छोड़कर अकादमिक क्षेत्र में लौट गया। मेरे मतभेद राजकोषीय समायोजन को लेकर नहीं थे। इसकी सख्त जरूरत थी। वास्तव में, मैं इसमें और आगे जाना चाहता था। मेरी मुख्य चिंताएं और मतभेद संरचनात्मक सुधारों को लेकर थे। औद्योगिक नीति में सुधार, जिसके तहत नई कंपनियों के प्रवेश की बाधाएं और मौजूदा कंपनियों के आकार पर लगी सीमाएं हटाई गईं, जरूरी और वांछनीय था। लेकिन प्रतिस्पर्धा कानून एक दशक से भी अधिक समय बाद आया। व्यापार नीति में सुधार आवश्यक था लेकिन इसकी गति ने औद्योगिक क्षेत्र को नुकसान पहुंचाया। प्रभावी डंपिंग-रोधी कानूनों के अभाव ने स्थिति को और खराब किया और विनिर्माण को समर्थन देने वाला पारिस्थितिकी तंत्र भी नहीं बनाया गया।

सार्वजनिक क्षेत्र में सुधार महज परिसंपत्तियों की बिक्री तक सीमित रहा। इसका मतलब था कि प्रमुख सार्वजनिक उपक्रमों को बेच दिया गया और कमजोर उपक्रमों को बनाए रखा गया। वित्तीय क्षेत्र के सुधारों ने अति-नियमन को तो खत्म किया लेकिन नियमन और सुशासन की नई संस्थागत संरचनाएं नहीं बनाईं। कुल मिलाकर, मेरी चिंताएं बदलाव की प्रकृति और उसके क्रम को लेकर थीं।  संरचनात्मक सुधार तो किए गए लेकिन बाजार को संचालित करने के लिए जरूरी संस्थाएं और नियम नहीं बनाए गए। और 35 साल बाद मेरे आशंकाओं की पुष्टि नतीजों से होती है। भारत में औद्योगिक क्षरण हुआ है क्योंकि उत्पादन और रोजगार में विनिर्माण की हिस्सेदारी घट गई है। सार्वजनिक क्षेत्र पिछड़ गया है। वित्तीय क्षेत्र में घोटाले सामने आते रहे हैं।

क्या मनमोहन सिंह आपके विचारों के खिलाफ थे?

मैं उनके बारे में अब नहीं बोल सकता क्योंकि वह अब जीवित नहीं हैं लेकिन विचारों का मतभेद था जो अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं के बीच स्वाभाविक है। मैंने उन मतभेदों को व्यक्त किया। राव कभी-कभी मुझे देखते थे और पूछते थे कि क्या मैं सहमत हूं। संक्षेप में, राजकोषीय समायोजन की रूपरेखा पर सहमति थी लेकिन संरचनात्मक सुधारों की प्रकृति पर मतभेद थे।

तो मोटे तौर पर क्या सुधारों के साथ रणनीतिक औद्योगिक नीति भी होनी चाहिए थी?

हां, बिल्कुल। औद्योगिक नीति के अभाव के कारण औद्योगिक क्षरण हुआ है। इतिहास में कोई भी देश औद्योगिक नीति के बिना औद्योगीकृत नहीं हुआ है। इसमें ब्रिटेन और अमेरिका, साथ ही दक्षिण कोरिया, ताइवान, चीन और वियतनाम जैसी अब सफल एशियाई अर्थव्यवस्थाएं भी शामिल हैं। औद्योगीकरण का मतलब विश्व अर्थव्यवस्था में निष्क्रिय तरीके से शामिल होना नहीं है। इसका मतलब रणनीतिक एकीकरण है। 1970 में विश्व के विनिर्माण मूल्यवर्धन में भारत की हिस्सेदारी 1.1 फीसदी थी जबकि चीन की 0.8 फीसदी। 1990 तक दोनों की हिस्सेदारी 1.3 फीसदी हो गई थी। 2025 में भारत की हिस्सेदारी 3 फीसदी थी जबकि चीन की 28 फीसदी। हमारे व्यापार उदारीकरण ने औद्योगीकरण को बढ़ावा नहीं दिया क्योंकि इसे प्रभावी औद्योगिक नीति के साथ नहीं जोड़ा गया।

हम डेवलपमेंट बैंकों के मामले में अग्रणी थे, जिन्हें बाद में चीन और ब्राजील ने अपनाया। लेकिन हमने उन्हें बंद कर दिया। शेयर बाजार आधारित पूंजी व्यवस्था नए उद्यमियों के लिए वित्तीय बाजारों में प्रवेश की बाधाएं पैदा करती है। ब्राजील और चीन जैसे कुछ देशों में विनिर्माण क्षेत्र में निजी निवेश का लगभग आधा हिस्से के लिए धन का प्रबंध डेवलपमेंट बैंकों के माध्यम से होता है।

हम इस स्थिति में क्यों पहुंचे?

मूल रूप से इसलिए क्योंकि हमने विनिर्माण के लिए अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र नहीं बनाया। मेरे विचार से भारत को 1970 के दशक की शुरुआत में ही अपनी अर्थव्यवस्था को अधिक खुला कर देना चाहिए था, जैसा कि पूर्वी एशियाई देशों ने किया। हम 20 साल देर से खुले और वह भी एक समझदार औद्योगिक नीति के बिना। राज्य और बाजार एक-दूसरे के विकल्प नहीं बल्कि पूरक हैं। राज्य और बाजार के बीच संबंध समय और परिस्थितियों के साथ बदलना चाहिए। कुशल बाजार और प्रभावी राज्य मिलकर विकास की सफलता का आधार बनते हैं। एशिया की सफल अर्थव्यवस्थाओं के अनुभव से यह बात प्रमाणित होती है। 1990 से अब तक जीडीपी में हमारे शोध एवं विकास खर्च की हिस्सेदारी घट गई है जबकि चीन की हिस्सेदारी बढ़ी है।

संरचनात्मक सुधारों में मनमोहन सिंह का वास्तविक योगदान क्या था?

ऐसे महत्त्वपूर्ण कदमों की पहचान करना काफी मुश्किल है, जो पहले से तैयार किए गए व्यापक सुधार कार्यक्रम का हिस्सा न रहे हों। और महत्त्वपूर्ण, कठिन फैसले राव ने लिए थे। मैंने 31 दिसंबर, 1991 को वित्त मंत्रालय से इस्तीफा देकर सरकार छोड़ दी। इसलिए मैं केवल जून से दिसंबर 1991 तक की अवधि के बारे में बोल सकता हूं, जब मैं लगभग हर महत्त्वपूर्ण बैठक में मौजूद था और फैसले लेने की प्रक्रिया का हिस्सा था। इनमें आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति और राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति की बैठकें भी शामिल थीं।

उन फैसलों का श्रेय राव को मिलना चाहिए। मनमोहन सिंह के योगदान का आकलन करना मेरे लिए न तो उचित है और न ही संभव। सुधार प्रक्रिया खत्म नहीं हुई थी लेकिन 1991 के मध्य में घोषित नाटकीय बदलावों के बाद इसकी गति धीमी पड़ गई थी।

भारत अब क्या कर सकता है?

रणनीतिक औद्योगिक नीति की जरूरत है। इसके लिए विनिमय दर नीति, मौद्रिक नीति, प्रौद्योगिकी नीति, औद्योगिक वित्त और अनुसंधान एवं विकास के बीच समन्वय आवश्यक है।

भारत को अपनी शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का प्रयास करना चाहिए जो फिलहाल गिर रही है। 1990 में भारत का शोध एवं विकास खर्च जीडीपी का 0.66 फीसदी था जबकि चीन का 0.60 फीसदी। 2024 तक भारत का यह आंकड़ा घटकर 0.60 फीसदी रह गया और चीन का हिस्सा बढ़कर 2.4 फीसदी हो गया। अगर शिक्षा व्यवस्था गिर रही हो, सीखने के परिणाम खराब हों और प्रवेश प्रक्रियाओं का अत्यधिक केंद्रीकरण हो, तो ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य हासिल करना संभव नहीं होगा।

क्या हमने बड़ी आबादी का पूरा फायदा उठाया है?

हमने एक बहुत बड़ा अवसर गंवा दिया है। बड़ी आबादी का लाभ तभी हासिल होता है, जब हम शिक्षा के माध्यम से अपने लोगों में क्षमताएं विकसित करें। अगर स्कूलों में सीखने के परिणाम खराब हैं, विश्वविद्यालयों का राजनीतिकरण हो गया है और पाठ्यपुस्तकों में इतिहास को विकृत किया जाता है तो मुझे भविष्य को लेकर चिंता होती है। हम फिलिपींस जैसे देश बन सकते हैं या लैटिन अमेरिका की तरह मध्य-आय जाल में फंस सकते हैं।

रोजगार हमारी सबसे बड़ी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चुनौती है। विनिर्माण रोजगार का हमारा संभावित सबसे बड़ा स्रोत है। भारत में अनौपचारिक सेवा क्षेत्र और निर्माण क्षेत्र रोजगार के मुख्य स्रोत हैं, जहां मजदूरी कम है और रोजगार की गुणवत्ता खराब है। गिग अर्थव्यवस्था की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है।

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First Published - August 30, 2026 | 9:57 PM IST

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