गत 24 मार्च को अचानक लगे लॉकडाउन के बीच विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) के लिए आयकर में एक अहम रियायत की व्यवस्था को 31 मार्च से आगे बढ़ाने की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। लॉकडाउन के बाद आर्थिक हालात को लेकर मचे कोलाहल ने इस बात पर से तवज्जो हटा ली कि दिसंबर और जनवरी में ही ऐसी मांग उठी थी कि प्रधानमंत्री के प्रिय कार्यक्रम मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के लिए एसईजेड से होने वाली निर्यात आय पर 100 फीसदी आयकर छूट प्रदान की जाए। एसईजेड के साथ लगाव बरकरार है जबकि सन 1965 में कांडला में एशिया का पहला एसईजेड बनने के बाद से ही यह क्षेत्र हमारी आर्थिक नीति की निरंतर विफलताओं में शामिल है। सन 2005 में नई नीति की घोषणा के बाद भी देश के वस्तु निर्यात में एसईजेड की हिस्सेदारी बमुश्किल एक तिहाई है। यह लगभग सेवा निर्यात के बराबर ही है। इसके बावजूद देश के नीति निर्माण प्रतिष्ठान में यह धारणा चलती रहती है कि देश में ऐसे वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने हैं जिनके दम पर चीन महाशक्ति बनकर उभरा।
एसईजेड को लेकर लगाव का एक हिस्सा इस वादे में निहित है कि विनिर्माताओं और सेवा प्रदाताओं को देश में आमतौर पर व्याप्त कारोबारी दिक्कतों से बचाया जाएगा। चीन ने अपने एसईजेड को आयरलैंड के शैनॉन मुक्तव्यापार क्षेत्र के तर्ज पर डिजाइन किया ताकि वैश्विक विनिर्माताओं को व्यापक पैमाने पर काम करने का लाभ मिल सके। इसके उलट भारतीय एसईजेड दिक्कतदेह नियमन और कर नियमों से रियायत का केंद्र बन कर रह गए। परंतु 2005 में एसईजेड की अवधारणा में नई जान फूंकने की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की कोशिश का बहुत बुरा अंत हुआ। जिन एसईजेड को मंजूरी मिली थी उनमें से बमुश्किल एक तिहाई ही शुरू हुए और कई परिचालक जिन्होंने एसईजेड पर अचल संपत्ति के रूप में दांव लगाया था, उन्हें परियोजनाएं शुरू न होने पर अपनी जमीन का पंजीयन समाप्त करना पड़ा। सन 2005 का एसईजेड अधिनियम कागजों पर व्यवस्थित रुख अपनाता दिखता है। मसलन कच्चे माल का शुल्क मुक्त आयात, आयकर रियायत और घरेलू बिक्री कर तथा उत्पाद शुल्क से छूट (वह जीएसटी से पहले का दौर था)। मंजूरी के लिए एक विशेष बोर्ड जिसकी अध्यक्षता वाणिज्य सचिव के पास थी, वह प्रस्तावों और प्रत्येक क्षेत्र में प्रशासनिक, बुनियादी तथा अन्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए एकल खिड़की व्यवस्था। संक्षेप मेंं भारत को भविष्य की दृष्टि से सुसंगत बुनियादी ढांचे वाला क्षेत्र बनाने का निर्णय किया गया था।
परंतु इसे हासिल करने के लिए जिन एसईजेड संबंधी नीतियों की आवश्यकता थी उनका अन्य नीतियों से कोई तालमेल नहीं था। बुनियादी रूप से वे नीतियां जो जमीन और श्रम से संबंधित थे। ये दोनों क्षेत्र देश में निवेश के लिए मुश्किल पैदा करते रहे। काफी बहस के बाद एसईजेड को श्रम कानूनों और सरकारी निगरानी से रियायत देने की बात नकार दी गई। यह वह दौर था जब संसद में वाम दलों का प्रभाव बाकी था। इस प्रकार एसईजेड में भी वही श्रम कानून लागू हुए जो देश के अन्य इलाकों में लागू हो रहे थे।
टीमलीज सर्विसेज के मुताबिक केंद्रीय स्तर पर 674 और राज्य स्तर पर 26,484 अनुपालन करने थे। जाहिर है इससे एसईजेड का एक आकर्षण तो खुदबखुद समाप्त हो गया। जमीन का अधिग्रहण करना दूसरी बड़ी दिक्कत थी। जल्दी ही एसईजेड उन औद्योगिक परियोजनाओं में शामिल हो गए जो उस जहरीली राजनीति की शिकार थीं जिसका नमूना हमने उस समय देखा था जब ममता बनर्जी ने सिंगुर में टाटा मोटर्स के कार संयंत्र को एक सफल अभियान के जरिये नेस्तनाबूद कर दिया था।
इसका परिणाम यह हुआ कि भूमि अधिग्रहण के मामलों हर्जाना बढ़ाने का कानून बना। इससे भूमि अधिग्रहण अत्यधिक महंगा हो गया। मोदी सरकार ने अपने आरंभिक दिनों में अध्यादेश के जरिये इसे बदलने की कोशिश की लेकिन उसे नाकामी हाथ लगी।
उसके बाद गंवाए हुए राजस्व के अनुमान की बात आई। मोदी सरकार ने रियायतोंं और खामियों के बिना कर व्यवस्था को सुसंगत बनाने का प्रयास किया। यही कारण है कि तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सन 2016 में एसईजेड कर रियायत के लिए एक सनसेट क्लॉज का प्रावधान किया जिसे हालिया बजट में एक बार फिर दोहराया गया।
राजनेता इस बात से वाकिफ हैं कि देश में निवेश को लेकर क्या चुनौतियां हैं लेकिन एक बेहतर सामाजिक सुरक्षा ढांचे के अभाव में कर्मचारियों को नौकरी पर रखने और निकालने के आसान नियम और जमीन गंवाने वालों को कम हर्जाना देना राजनीतिक दृष्टि से गैर मुनासिब है। किसी भारतीय नेता ने चीन के उस मॉडल पर विचार नहीं किया जिसके तहत उसने जमीन गंवाने के कारण बेरोजगार हुए ग्रामीण श्रमिकों की सहायता के लिए टाउनशिप और ग्रामीण उद्यमिता का विकास किया। बंदरगाह न्यासों तथा अन्य सरकारी उपक्रमों के पास मौजूद जमीन को इस्तेमाल करने की दिशा में भी कोई प्रयास नहीं किया गया।वर्ष 2008 के बाद से मांग में निरंतर कमी, सन 2017 के बाद जीएसटी को लेकर उपजा भ्रम और सन 2019 के बाद से संरक्षणवादी शुल्क दरों में लगातार इजाफे के रूप में निर्यातकों को तीन तरफा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसमें एसईजेड भी शामिल हैं। इसके बावजूद सन 2019 के मध्य में मोदी सरकार ने 2005 के अधिनियम में एक विवादास्पद संशोधन को आगे बढ़ाया। पहले यह एक अध्यादेश के रूप में सामने आया जिसके तहत एसईजेड स्थापित करने वाले कारोबारों में न्यास तथा ऐसे सरकारी संस्थानों को शामिल करने की बात कही गई जिन्हें सरकार समय-समय पर इजाजत दे। कोई मंत्री यह नहीं समझा पाया कि न्यास या किसी अन्य सरकारी संस्था को एसईजेड की स्थापना की आवश्यकता क्यों होगी? परंतु स्पष्ट है कि ऐसी नीति निरंतर राजनीतिक वर्ग का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाब रही है जो बार-बार नाकाम साबित हुई है।