रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने मंगलवार को एक बड़ा कदम उठाते हुए पूर्वी यूक्रेन के दो अलग हुए हिस्सों को मान्यता दे दी और वहां बतौर ‘शांतिरक्षक’ रूसी सेनाएं भेजने की बात कही। भारत की दृष्टि से यह प्रकरण एकदम गलत समय पर हुआ। इसका सीधा असर तेल कीमतों पर पड़ेगा और उनमें उछाल आएगी। तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक ने हाल ही में उत्पादन बढ़ाने की अनिच्छा दिखाई है, यह बात भी कीमतों को प्रभावित करेगी। इससे भारत में मुद्रास्फीति का दबाव और बढ़ेगा और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा भारत में मुद्रास्फीति को लेकर प्रस्तुत अनुमानों के लिए जोखिम उत्पन्न होगा।
यूरोप के पूर्वी इलाके में तनाव बढऩे की घटना ने सरकारी तेल कंपनियों की उन योजनाओं के लिए भी मुश्किल बढ़ा दी है जो संभवत: विधानसभा चुनाव के बाद तेल की खुदरा कीमतों में इजाफा कर सकती हैं। पेट्रोलियम उत्पादों के खुदरा मूल्य में तेज इजाफे की आशंका को नकारा नहीं जा सकता है। रूस भारत का बड़ा कारोबारी साझेदार नहीं है और बीते दशक में दोनों देशों का आपसी कारोबार 8 अरब डॉलर से 11 अरब डॉलर के बीच रहा है। परंतु आर्थिक रिश्तों की आर्थिक प्रकृति देश को कई तरह से प्रभावित कर सकती है। उदाहरण के लिए देश के रक्षा बलों का 60 फीसदी से अधिक हिस्सा रूसी हथियारों से लैस है और भारत ने हाल ही में रूस से एस-400 मिसाइल बचाव प्रणाली खरीदी है। ऐसे में भारत इनके कलपुर्जों और तकनीकी हस्तांतरण के लिए रूस पर निर्भर है और यूक्रेन में युद्ध जैसे हालात इसे बाधित कर सकते हैं।
उत्तरी और पूर्वोत्तर के मोर्चे पर चीन की बढ़ती आक्रामकता के मद्देनजर भारत के लिए यह घटनाक्रम अच्छा नहीं कहा जा सकता है। भारत की जलवायु परिवर्तन संबंधी प्रतिबद्धताएं भी दबाव में आ सकती हैं। क्योंकि गैस का इस्तेमाल बढ़ाने की योजना कीमतों में इजाफे की वजह से मुश्किल में आ सकती है। जैसा कि शेयर बाजार ने दिखाया भी है, भूराजनीतिक घटनाक्रम कारोबारियों के मुनाफे को भी प्रभावित करेगा।
कीमतों में इजाफा होने पर देश की सबसे बड़ी तेल निर्यातक कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की रिफाइनरी के मार्जिन में सुधार हो सकता है। परंतु अगर अमेरिका की ओर से प्रतिबंध बढ़ाए जाते हैं तो चाय उद्योग के लिए भारी मुश्किल पैदा हो सकती है। भारत के चाय निर्यात का 18 फीसदी हिस्सा रूस को जाता है। अन्य बड़े खरीदारों में ईरान को बिक्री भी कुछ वर्षों से प्रतिबंध के कारण बाधित है। रोजगार तैयार करने वाला देश का चाय उद्योग पहले ही कम उत्पादकता और बढ़ती लागत से जूझ रहा है और ऐसे में नया संकट उसे और मुश्किल में डाल सकता है। व्यापक पैमाने पर देखें तो यदि युद्ध हुआ तो यूरोप और रूस को निर्यात करने वाले अन्य क्षेत्र मसलन इंजीनियरिंग और औषधि क्षेत्र भी दबाव में आ जाएंगे। कूटनीतिक मोर्चे पर भारत ने निरंतर प्रतिबद्धता जताई है। उसने नॉर्मेंडी वार्ता तथा मिंस्क समझौते का समर्थन किया है जो आजादी और अधिमिलन के बीच का रास्ता सुझाता है। परंतु रूस और चीन की करीबी भारत की स्थिति जटिल बनाती है। इतना ही नहीं इस संकट के कारण ऐसे समय में अमेरिका का ध्यान हिंद-प्रशांत क्षेत्र से हट सकता है जब शायद भारत को चीन की विस्तारवादी महत्त्वाकांक्षाओं से बचने के लिए तत्काल गठजोड़ की आवश्यकता हो। जर्मनी ने नॉर्ड 2 गैस परियोजना को रद्द करने का निर्णय किया है जो पुतिन की यूरोप पर दबाव बनाने की रणनीति में अहम है। जर्मनी के कदम को रूस के विरुद्ध प्रतिक्रिया माना जा रहा है। यह स्पष्ट नहीं है कि पुतिन अमेरिकी प्रशासन की इस बात पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं कि अगर तनाव बढ़ा तो और प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। कुल मिलाकर भारत असहज स्थिति में है और वह बस प्रतीक्षा कर सकता है।