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टाटा संस में नियंत्रण का संकट: क्या सुलझ पाएगा नेतृत्व और स्वामित्व का उलझा हुआ समीकरण?

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फिलहाल यह नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक का कारोबार करने वाले इस विशाल समूह में नेतृत्व संबंधी अनिश्चितताएं दूर करने में जुटा हुआ है

Last Updated- April 08, 2026 | 10:33 PM IST
Tata Sons

टाटा समूह का वर्ष 1924 में तैयार मुख्यालय बॉम्बे हाउस कंपनी एवं उद्योग जगत के लिए एक ऐतिहासिक पहचान बना हुआ है। मगर दक्षिण मुंबई के फोर्ट में स्थित टाटा समूह का यह केंद्र पिछले कई दशकों से हजारों अहम बैठकों का साक्षी रहा है। फिलहाल यह नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक का कारोबार करने वाले इस विशाल समूह में नेतृत्व संबंधी अनिश्चितताएं दूर करने में जुटा हुआ है।

यहां संदर्भ 24 फरवरी को हुई टाटा संस की बोर्ड बैठक से हैं जिसमें टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा ने कुछ टाटा इकाइयों (मुख्य रूप से सेमीकंडक्टर, विमानन और ई-कॉमर्स कारोबार) में हुए घाटे से संबंधित सवाल उठाए। वर्ष 2024 में टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष बने नोएल टाटा ने टाटा संस के अध्यक्ष के रूप में एन चंद्रशेखरन का कार्यकाल बढ़ाने के किसी भी निर्णय को टाटा समूह की वित्तीय स्थिति से जोड़ने का प्रयास किया। फरवरी 2026 की बैठक में चंद्रशेखरन के कार्यकाल विस्तार के विषय पर नोएल टाटा का हस्तक्षेप जुलाई 2025 में टाटा ट्रस्ट्स द्वारा इस मामले पर लिए गए सर्वसम्मत रुख के उलट था।

पिछले साल जुलाई में नोएल टाटा सहित टाटा ट्रस्ट्स ने समूह के बड़े परिवर्तनकारी व्यवसायों में प्रवेश करने के समय नेतृत्व में निरंतरता बनाए रखने के लिए चंद्रशेखरन को टाटा संस के अध्यक्ष के रूप में तीसरा पांच वर्षीय कार्यकाल देने की सिफारिश की थी।

अप्रत्याशित घटनाक्रम के बाद इस पर करीब से नजर डालना ठीक रहेगा कि टाटा ट्रस्ट्स, उसके न्यासी, उसके अध्यक्ष और नामित निदेशक टाटा संस के संबंध में क्या रुख रखते हैं। टाटा ट्रस्ट्स (जो समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस में 66फीसदी की बहुल हिस्सेदारी रखता है) समूह का प्रवर्तक है। हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स जैसे सार्वजनिक धर्मार्थ न्यासों के न्यासियों को संरक्षक के रूप में वर्णित किया जाता है न कि मालिक के रूप में चाहे उनका पारिवारिक नाम कुछ भी हो। यही कारण है कि टाटा ट्रस्ट्स में कोई भी व्यक्ति मालिक या प्रवर्तक नहीं है।

टाटा ट्रस्ट्स सार्वजनिक धर्मार्थ न्यासों का एक समूह है जो वैश्विक परोपकार के मामले में पारिवारिक न्यासों से भिन्न है। नियमों के अनुसार टाटा ट्रस्ट्स महाराष्ट्र सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम द्वारा शासित है जो टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष को कोई विशिष्ट अधिकार प्रदान नहीं करता है। यहां कुछ सवाल उठते हैं। पहला, टाटा संस के अध्यक्ष किसके प्रति उत्तरदायी हैं? दूसरा, टाटा संस के अध्यक्ष की नियुक्ति, कार्यकाल या बर्खास्तगी के संबंध में टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष के पास क्या अधिकार हैं? टाटा संस के अध्यक्ष कंपनी के निदेशक मंडल के प्रति उत्तरदायी हैं और साथ ही प्रमुख शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स के प्रति भी जवाबदेह हैं।

टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (एओए) के अनुच्छेद 121ए के अनुसार टाटा संस के प्रमुख बोर्ड निर्णयों के लिए टाटा ट्रस्ट्स द्वारा मनोनीत निदेशकों के सकारात्मक मत की जरूरत होती है। यह टाटा ट्रस्ट्स को रणनीतिक योजनाओं, निवेश और शीर्ष नेतृत्व में बदलाव जैसे टाटा संस के अध्यक्ष की नियुक्ति और बर्खास्तगी सहित प्रमुख मामलों पर वीटो अधिकार प्रदान करता है।

इस स्थिति को परिप्रेक्ष्य में रखते हुए देखें तो वर्तमान परिदृश्य में जहां नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन को तीसरा कार्यकाल देने से पहले टाटा संस के अध्यक्ष के रूप में उनके प्रदर्शन पर सवाल उठाए हैं वहीं जुलाई 2025 में टाटा ट्रस्ट्स के न्यासियों द्वारा लिए गए सर्वसम्मत निर्णय की किसी भी समीक्षा के लिए भी न्यासियों की सर्वसम्मति आवश्यक होगी।

टाटा ट्रस्ट्स में केवल एक बार मतदान हुआ था और वह मामला सितंबर 2025 में एक मनोनीत निदेशक को हटाने से जुड़ा था। इसके बाद टाटा संस बोर्ड में केवल दो मनोनीत निदेशक नोएल टाटा और उद्योगपति वेणु श्रीनिवासन (टाटा ट्रस्ट्स के उपाध्यक्ष) हैं। टाटा संस बोर्ड के कुल सदस्यों में से (जो वर्तमान में छह हैं) एक तिहाई ट्रस्ट्स के मनोनीत सदस्य हो सकते हैं।

यह बताना महत्त्वपूर्ण है कि टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष को अन्य न्यासियों से अलग कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं हैं। वैसे तो 2016 में टाटा संस के अध्यक्ष पद से साइरस मिस्त्री को हटाए जाने को व्यापक रूप से तत्कालीन समूह के मानद अध्यक्ष एवं टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष रतन टाटा का निर्णय माना जाता है मगर अंदरूनी सूत्रों के अनुसार यह प्रक्रिया टाटा ट्रस्ट्स का सर्वसम्मत निर्णय था।

रतन टाटा ने न्यासियों की एक बैठक बुलाई और टाटा संस बोर्ड द्वारा उन्हें हटाने के अगले चरण के लिए सर्वसम्मति से स्वीकृति प्राप्त की। ऐसा माना जाता है कि दो दशकों से अधिक समय तक टाटा संस के पूर्व अध्यक्ष के रूप में रतन टाटा की स्थिति ने उन्हें एक ‘अद्वितीय दर्जा’ प्रदान किया था।

अधिकार के संदर्भ में बात करें तो वर्तमान स्थिति में एक और बात विचित्र जान पड़ती है। साइरस मिस्त्री विवाद के बाद एओए के अनुच्छेद 118 में संशोधन किया गया ताकि यह प्रावधान किया जा सके कि एक ही व्यक्ति टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स दोनों का अध्यक्ष नहीं हो सकता। संशोधित अनुच्छेद में यह उल्लेख नहीं किया गया कि टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष को टाटा संस के बोर्ड में शामिल नहीं किया जा सकता। मगर यह असामान्य था जब नोएल टाटा, टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद टाटा संस में एक नामित निदेशक के रूप में शामिल हो गए।

इतिहासकार बताते हैं कि टाटा समूह के अंतिम व्यक्तिगत प्रवर्तक सर रतन टाटा और सर दोराबजी टाटा थे जिनके कोई उत्तराधिकारी नहीं थे और जिनकी नकदीकृत संपत्तियां उन दो ट्रस्टों (उनके नाम पर) का मूल आधार हैं जो अब टाटा संस के मालिक हैं। हाल की बात करें तो, रतन टाटा को शायद लगा होगा कि ‘परिवार’ को ट्रस्टों में जगह मिलनी चाहिए लेकिन व्यवसायों को ट्रस्टों के नियंत्रण से मुक्त रखने का इरादा था।

हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस की आगामी बोर्ड बैठकों​ में नेतृत्व संबंधी मुद्दे सुलझ सकते हैं मगर समूह की होल्डिंग कंपनी का स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होना स्वामित्व और नियंत्रण के बड़े सवाल का संभावित समाधान प्रदान कर सकता है।

अगर टाटा संस सूचीबद्ध हो जाती है तो अनुच्छेद 121ए के तहत टाटा ट्रस्ट्स के विशेष वीटो अधिकार अतीत की बात हो सकते हैं जिससे वर्तमान में मौजूद कई अस्पष्टताएं दूर हो जाएंगी। एक बार ऐसा होने पर बॉम्बे हाउस अपने सामान्य कामकाज पर लौट सकता है और टाटा ट्रस्ट्स परोपकार गतिविधियों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकता है।

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First Published - April 8, 2026 | 10:30 PM IST

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