भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकांत दास जब महात्मा गांधी के उद्धरणों और लता मंगेशकर के गीत ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ के उल्लेख के साथ मौद्रिक नीति वक्तव्य का पाठ कर रहे थे तो मुझ समेत अधिकांश विश्लेषकों ने मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की तीन दिवसीय बैठक के नतीजों के लिए बहुत आसानी से ‘ज्यादा शांत’, ‘अत्यधिक शिथिल’, ‘पूर्वानुमेय’ तथा ‘एकदम साधारण’ जैसे विशेषणों का प्रयोग किया था।
उसने रीपो दर (वह दर जिस पर रिजर्व बैंक व्यवस्था में नकदी डालता है) और रिवर्स रीपो दर (वह दर जिस दर पर नकदी निकाली जाती है) को क्रमश: 4 फीसदी और 3.35 फीसदी पर अपरिवर्तित छोड़ दिया। बहरहाल, केंद्रीय बैंक की नकदी प्रबंधन नीति में परिवर्तन के चलते प्रभावी रिवर्स रीपो दर अगस्त 2021 के 3.4 फीसदी से बढ़कर फरवरी 2022 तक 3.9 फीसदी हो गई थी। इसके अलावा मौद्रिक नीति समिति तब तक समायोजन का रुख कायम रखेगी जब तक कि टिकाऊ आधार पर सतत वृद्धि पर बल देने के लिए करना आवश्यक होगा। गवर्नर के वक्तव्य को दोबारा पढऩे और नीतिगत दस्तावेज की बारीक पड़ताल के बाद मैंने अपनी राय बदल दी है।
यह दास की अब तक की सबसे साहसी नीति है। उन्होंने देश की मौद्रिक नीति को विकसित देशों से अलग कर दिया है। यह एक स्वतंत्र नीति है तथा यह अमेरिकी फेडरल रिजर्व तथा बैंक ऑफ इंगलैंड द्वारा वृद्धि और मुद्रास्फीति को लेकर उठाए जा रहे के कदमों के साथ तालमेल में नहीं है। पारंपरिक रूप से अधिकांश उभरते बाजार मौद्रिक नीति के मामले में फेड का अनुकरण करते हैं। सवाल उठता है कि इस साहसी कदम का आधार क्या है?
इसके लिए मुद्रास्फीति पर रिजर्व बैंक के पूर्वानुमान पर ध्यान देना होगा। दिसंबर की मौद्रिक नीति बैठक के बाद से खुदरा मुद्रास्फीति अनुमानित दायरे में बढ़ी है। निश्चित तौर पर कच्चे तेल की कीमतों का पूर्वानुमान अनिश्चित है लेकिन रिजर्व बैंक को लगता है कि खाद्य मुद्रास्फीति में गिरावट आएगी और आपूर्ति क्षेत्र के गतिरोध दूर होने पर मुद्रास्फीति के भी सहज होने का पूर्वानुमान है।
वित्त वर्ष 2022 का मुद्रास्फीति संबंधी पूर्वानुमान 5.3 फीसदी पर सीमित है और मार्च तिमाही के लिए 5.7 फीसदी का अनुमान है। ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सामान्य मॉनसून की प्रत्याशा में वित्त वर्ष 2023 में खुदरा मुद्रास्फीति के 4.5 फीसदी रहने का अनुमान है। इसे टुकड़ों में देखा जाए तो पहली तिमाही में 4.9 फीसदी, दूसरी तिमाही में 5 फीसदी, तीसरी तिमाही में चार फीसदी और चौथी तिमाही में 4.2 फीसदी मुद्रास्फीति का अनुमान है और जोखिम व्यापक तौर पर संतुलित रहेगा।
खासतौर पर वित्त वर्ष 2023 की दूसरी छमाही में अनुमान मध्यम अवधि में 4 फीसदी की खुदरा मुद्रास्फीति (2 फीसदी ऊपर या नीचे) हासिल करने के लक्ष्य के साथ तालमेल वाला है जबकि इस दौरान वह वृद्धि की भी मदद करेगा।
परंतु आंकड़ों ने कई लोगों को चौंका दिया। खासतौर पर अंतिम दो तिमाहियों की मुद्रास्फीति संबंधी अनुमान। आमतौर पर विश्लेषक एक वर्ष के मुद्रास्फीति के अनुमानों पर नजर रखते हैं। यदि रिजर्व बैंक का अनुमान सही साबित होता है तो नीतिगत दर तथा मुद्रास्फीति के बीच का अंतर और कम हो जाएगा तथा वर्ष के दौरान रीपो दर बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं रहेगी। ध्यान रहे कि अधिकांश विश्लेषक कम से कम तीन बार रीपो दर में इजाफे की बात कह रहे थे। दास ने कहा कि मुद्रास्फीति की दर के अनुमान विस्तृत विश्लेषण तथा सभी जोखिमों के आधार पर किए गए आकलन पर आधारित हैं।
रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2023 के लिए 7.8 फीसदी का वृद्धि अनुमान जताया है। यह अनुमान हकीकत के करीब है लेकिन कई लोगों को दूसरी छमाही में मुद्रास्फीति के अनुमान को लेकर शंकाएं हैं। कई लोगों का कहना है कि यह वास्तविक से प्राय: एक फीसदी कम है। यदि उनका कहना सही है तो रिजर्व बैंक ने इस नीति में बड़ा जुआ खेला है।
अब जबकि दरों में इजाफे की संभावना कम होती जा रही है, बॉन्ड और इक्विटी बाजारों ने नीति की तारीफ की है। यह फिलहाल बॉन्ड प्रबंधन का चतुराई भरा और बेहतर तरीका है। यह खुले बाजार से बॉन्ड खरीदने की तुलना में तो निश्चित तौर पर बेहतर है क्योंकि उस प्रक्रिया में दीर्घावधि का ऋण खरीदा जाता है तथा अल्पावधि के बॉन्ड की बिक्री की जाती है ताकि उधारी दरों को कम रखा जा सके।
यदि वित्त वर्ष 2023 में दरों में इजाफा नहीं होता है तो बॉन्ड और इक्विटी बाजारों में उत्साह जारी रहेगा लेकिन भारत और विकसित बाजारों के बीच ब्याज दरों का अंतर रुपये पर दबाव बढ़ाता रहेगा। हालांकि चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारे पास 632 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है। व्यवस्था में रुपये के रूप में भी पर्याप्त नकदी मौजूद है। वित्त वर्ष 2023 में सरकार की रिकॉर्ड14.3 लाख करोड़ रुपये की उधारी को लेकर नीति खामोश है। राज्य सरकारों की उधारी के साथ करीब 22.5 लाख करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी। (दास ने कहा है कि सरकारी उधारी कार्यक्रम शायद उतना बड़ा न हो जितना कि बजट में कहा गया है।)
हमारा मानना है कि रिजर्व बैंक अप्रैल में अगली नीति में इससे निपटेगा। उस समय तक वित्त वर्ष 2023 की पहली छमाही का उधारी कैलेंडर भी सामने आ चुका होगा। दूसरे शब्दों में दास ने फिलहाल समय मांगा है और वादा किया है कि बेहतर आकलन के साथ बेहतर संचार वाले कदम उठाए जाएंगे। फिलहाल वह मुद्रास्फीति के अनुमान पर दांव लगा रहे हैं। या फिर कह सकते हैं कि गवर्नर ने विचारों, व्यवहार और बाजार के कदमों को प्रभावित करने तथा नियंत्रित करने के लिए दिमागी तरीके अपनाए हैं ताकि रिजर्व बैंक लाभान्वित हो सके। केंद्रीय बैंकर ऐसा करते हैं। यदि कच्चे तेल की कीमतों से हालात बिगड़ते हैं तो चीजें बदल जाएंगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो मुझे नहीं लगता कि वित्त वर्ष 2023 में दरों में कोई इजाफा होगा।