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मुसीबत न बन जाए ‘बिना कोलैटरल’ वाला कर्ज, 2008 जैसा बैंकिंग संकट दोहराने की आशंका

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सूक्ष्म उद्योगों को बिना गारंटी कर्ज देने का आरबीआई का प्रस्ताव नेक है, लेकिन सही जानकारी और सुरक्षा के अभाव में यह बैंकों के लिए बड़ा जोखिम बन सकता है

Last Updated- April 03, 2026 | 9:23 PM IST
MSME sector
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने प्रस्ताव दिया है कि सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के मामले में 20 लाख रुपये तक के ऋण पर बैंकों को गिरवी (कोलैटरल) की शर्त हटा देनी चाहिए। आरबीआई ने यह भी कहा है कि स्वैच्छिक रूप से सोना या चांदी गिरवी रखने की अनुमति दी सकती है। केंद्रीय बैंक की यह मंशा समझ में आती है क्योंकि भारत की छोटी कंपनियां गिरवी आधारित ऋण पर बहुत अधिक निर्भर हैं और नकदी प्रवाह आधारित ऋण की ओर बढ़ना एक दीर्घकालिक लक्ष्य है।

हालांकि, इस तरह के बदलाव अनिवार्य करने से यह जरूरी नहीं कि मूल समस्या का समाधान हो जाए। ऋण बाजार में ग्राहकों से जुड़ी सभी जानकारियां उपलब्ध नहीं होती हैं। इसकी अनदेखी करते हुए गिरवी व्यवस्था समाप्त करना वित्तीय प्रणाली को और अधिक कमजोर बना सकता है और अंततः ऋण की आपूर्ति बढ़ाने के बजाय इसे कम कर सकता है।   

आखिर ऐसा क्यों हैं? यह समझने के लिए ऋण आवंटन की राह में आने वाली बाधाओं के कारणों पर विचार करना जरूरी है। अधिकांश वस्तुओं की बाजारों में कीमतें तब तक समायोजित होती हैं जब तक आपूर्ति मांग के बराबर नहीं हो जाती। अगर मांग बढ़ती है तो कीमतें बढ़ती हैं और उत्पादक अधिक आपूर्ति करते हैं। ऋण बाजार अलग तरह से व्यवहार करता है। स्टिग्लिट्ज़ और वीस (1981) के प्रसिद्ध शोध में इसकी व्याख्या की गई है। जब ऋणदाता ब्याज दरें बढ़ाते हैं तो वे अधिक जोखिम लेने को तैयार ग्राहकों (कर्जधारकों) को आकर्षित करते हैं जबकि सुरक्षित ग्राहक अक्सर पीछे हट जाते हैं क्योंकि बढ़ी हुई दर उनके लिए फायदेमंद नहीं होती।इसका नतीजा यह होता है कि ब्याज दरों में वृद्धि के साथ ग्राहकों का समूह अधिक जोखिम भरा हो जाता है। नैतिक जोखिम की समस्या भी है। एक बार ऋण प्राप्त करने के बाद कर्जधारक ऐसे कदम उठा सकते हैं जिससे विफलता की आशंका बढ़ जाती है क्योंकि अधिकांश लाभ उन्हें ही मिलता है जबकि ऋणदाता को नुकसान उठाना पड़ता है।

ऋण प्राप्त करने के बाद कर्जधारक किसी जोखिम भरी परियोजना में निवेश कर सकता है या प्रयास कम कर सकता है। इन समस्याओं के कारण ऋणदाता हमेशा ब्याज दरें बढ़ाकर ऋण की बढ़ती मांग पर प्रतिक्रिया नहीं देते हैं। इसके बजाय वे ऋण को सीमित कर देते हैं जिससे ऊंची ब्याज दरों का भुगतान करने वाले कुछ कर्जधारकों को ऋण नहीं मिल पाता है।

कोई वस्तु या जायदाद गिरवी रखने की व्यवस्था इन्हीं चिंताओं को दूर करने के लिए की गई है। जब कर्जदाताओं के पास कर्जधारकों की नकदी के स्रोत के बारे में सीमित जानकारी होती है और ऋण आवंटन के बाद अनिश्चितताओं को लेकर वे चिंतित होते हैं तो कुछ वस्तु या जायदाद बतौर गिरवी लेकर वे थोड़े आश्वस्त हो जाते हैं।

संपत्ति गिरवी रखकर कर्जधारक अपनी गंभीरता का संकेत देता है और मानता है कि विफलता का उसे व्यक्तिगत नुकसान उठाना पड़ेगा। इससे ऋण लौटाने की संभावना बढ़ जाती है और उधारदाताओं को ऋण देने का भरोसा मिलता है। गिरवी रखने से कमजोर क्रेडिट इतिहास वाले उधारकर्ताओं को भी ऋण बाजारों तक दोबारा पहुंच प्राप्त करने का अवसर मिलता है। संपत्ति गिरवी रखकर वे उधारदाताओं को आश्वस्त करते हैं कि भले ही पिछले व्यवहार ने संदेह पैदा किया हो फिर भी उन्हें ऋण देने का ठोस आधार मौजूद है।

प्रस्तावित नियम-कायदों से अप्रत्यक्ष रूप से यह मान लिया गया है कि बैंक गिरवी इसलिए मांगते हैं क्योंकि वे व्यावसायिक नकदी प्रवाह का आकलन करने में दिलचस्पी नहीं रखते हैं या क्योंकि वे बाजार शक्ति का प्रयोग करते हैं। इन प्रस्तावित नियमों के अनुसार गिरवी की शर्त हटा दिए जाने पर ऋण से जुड़े जोखिम में कोई खास बदलाव नहीं आएगा। लेकिन कई देशों के साक्ष्य इसके विपरीत संकेत देते हैं।

उभरती और विकसित दोनों अर्थव्यवस्थाओं में असुरक्षित ऋणों की तुलना में सुरक्षित ऋणों में भुगतान चूक (डिफॉल्ट) होने की आशंका अधिक होती है। इसका मतलब यह नहीं है कि गिरवी भुगतान में चूक का कारण बनती है। कर्जदाता गिरवी की शर्त उन्हीं कर्जधारकों के समक्ष रखते हैं जिन्हें वे अधिक जोखिम भरा मानते हैं। बिना गिरवी आधारित सुरक्षा के ऐसे कर्जधारकों को ऋण देते समय बैंकों को अधिक नुकसान उठाना पड़ेगा।

अगर ऋण के एवज में कोई कीमती वस्तु या जायदाद गिरवी रखने पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो इसके कई नतीजे संभव हैं। बैंक उन उधारकर्ताओं को ऋण देने से इनकार कर सकते हैं जिन्हें गिरवी आधारित ऋण आसानी से प्राप्त हो जाता। या फिर बैंक सोने या चांदी को गिरवी रखने की व्यवस्था पर अधिक जोर दे सकते हैं जिसकी अनुमति नियमों में स्पष्ट रूप से दी गई है। इससे अनपेक्षित परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं। छोटे व्यवसायों द्वारा गिरवी रखी गई अधिकांश वस्तुओं में मशीनरी, वाहन या उपकरण जैसी व्यावसायिक संपत्तियां शामिल होती हैं जो सीधे व्यवसाय से जुड़ी होती हैं।

कर्जधारकों को इसके बजाय घरेलू सोना या चांदी गिरवी रखने के लिए बाध्य करने का अर्थ प्रभावी रूप से उनसे अधिक व्यक्तिगत संपत्ति दिखाने के लिए कहना है। कई लघु व्यवसायों के पास उत्पादक संपत्तियां हो सकती हैं मगर उनके पास घरेलू सोना नहीं हो सकता है। इस तरह गिरवी के रूप में स्वीकार्य वस्तुओं को प्रतिबंधित करने से ठीक वही उधारकर्ता वंचित हो सकते हैं जिनकी मदद के लिए यह नीति बनाई गई है।

एक दूसरा बड़ा जोखिम भी है। अगर बैंकों को पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना ऋण देने के लिए मजबूर किया जाता है तो ऋण चूक बढ़ सकती है। भारत पहले ही ऋण देने संबंधी नीतिगत प्रोत्साहनों के परिणाम भुगत चुका है। वर्ष 2008 से 2018 के बीच नीतिगत संकेतों और नियामकीय छूट के कारण बुनियादी ढांचे और संबंधित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा ऋण देने में भारी वृद्धि हुई। इसका परिणाम एक बड़ा बैंकिंग संकट था जिसमें गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों में वृद्धि हुई और बैंकों के बहीखाते दबाव में आ गए।

अगर लक्ष्य ऋण तक पहुंच आसान बनाना है तो बेहतर तरीका यह है कि ऋणदाताओं को जोखिम का आकलन करने और ऋण वसूलने में बाधा डालने वाली रुकावटें कम किया जाएं। ऋणदाताओं के अधिकारों को मजबूत करना एक कदम है। सरफेसी ढांचे के तहत भी वित्तीय संस्थानों को चूक के बाद गिरवी रखी जायदाद प्रभावी ढंग से हस्तांतरित या परिसमापन करने में अक्सर महीनों या वर्षों का इंतजार करना पड़ता है। क्रियान्वयन में तेजी लाकर लागत कम करनी होगी और ऋण आवंटन को प्रोत्साहन देना होगा।

सूचना अवसंरचना में सुधार भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। एकीकृत ऋण प्रणाली (यूनिफाइड लोन इंटरफेस) का विकास और क्रेडिट स्कोर को नियमित रूप से अपडेट करने की आवश्यकता सकारात्मक कदम हैं। इन पहलों का विस्तार किया जाना चाहिए। क्रेडिट स्कोर के मामले में प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देना, डेटा तक पहुंच बढ़ाना और सरकारी प्रशासनिक डेटा का उपयोग कर वैकल्पिक क्रेडिट स्कोर विकसित करने से जानकारियों की कमी काफी हद तक दूर की जा सकती है।

संक्षेप में, आरबीआई के प्रस्ताव के पीछे का इरादा सराहनीय है। मगर बाजार की विफलताओं का सबसे अच्छा समाधान उन बाधाओं को दूर कर किया जा सकता है जो बाजारों के कामकाज में रुकावट डालती हैं न कि उन तंत्रों पर प्रतिबंध लगाकर जो इन बाधाओं के बावजूद उन्हें कार्य करने में मदद करते हैं। बिना किसी गारंटी के ऋण देने को अनिवार्य बनाने से, मूल समस्या को हल करने के बजाय, जोखिम के केवल स्थानांतरित या टालने का खतरा रहता है।

(लेखक इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस में अध्यापन करते हैं)

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First Published - April 3, 2026 | 9:23 PM IST

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