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निर्यात के मोर्चे पर उठते सवालों के चाहिए जवाब

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Last Updated- December 11, 2022 | 3:20 PM IST

 निर्यात के रुझान की पड़ताल में कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक पहलू सामने आते हैं। समय से कुछ आवश्यक कदम उठाकर निर्यात और आर्थिक वृद्धि को सहारा देने का सुझाव दे रही हैं 
इस दौर का एक महत्त्वपूर्ण सवाल यही सामने आ रहा है कि क्या भारत से होने वाले निर्यात में ठहराव आ गया है। मोबाइल हैंडसेट और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सेवाएं ऐसी वस्तुओं और सेवाओं में शामिल हैं, जिनकी विदेश में बड़े पैमाने पर बिक्री होती है। भारत की वृद्धि में ये अहम कारक रहे हैं। कुछ दिन पहले जारी हुए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के जून के आंकड़ों में भी यह स्पष्ट हुआ। जून 2019 से अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर जहां केवल चार प्रतिशत रही, वहीं इसी अवधि में निर्यात में 20 प्रतिशत से अधिक की उछाल दर्ज हुई। 
निर्यात में बढ़ोतरी वित्त वर्ष 2019 और 2022 के बीच भारत के चालू खाता संतुलन में सुधार की व्याख्या भी करती है। इन वर्षों के दौरान भारत के बाहरी खाते में सुधार बफर (भंडार) बनाने में मददगार साबित हुआ। इसका परिणाम देश के विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति पर पड़ा। इन हालात में मुद्रा मंडार इतना समृद्ध हुआ कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) मौजूदा वैश्विक उथलपुथल के दौर में उस भंडार का इस्तेमाल रुपये की सेहत सुधारने और उसे संभालने में कर रहा है। 
अब यहां से किस प्रकार का घटनाक्रम आकार लेता दिख रहा है, उसे समझने के लिए हमें उत्पाद-दर-उत्पाद उनके निर्यात की मात्रा (वॉल्यूम) की पड़ताल करने की आवश्यकता होगी। परंतु इसमें एक पेच यही है कि वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात की मात्रा का कोई अलग-अलग आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है।
हमारे पास केवल ‘नॉमिनल’ या अनुमानित डेटा है, जो कि बहुत ज्यादा उपयोगी नहीं, क्योंकि बहुत सारे परिवर्तन निर्यात वॉल्यूम पर नहीं, बल्कि कीमतों में बदलाव पर निर्भर करते हैं। इसलिए, हमने अनुमानित निर्यात, प्रासंगिक मूल्य सूचकांकों और विनिमय दरों के आधार पर स्वयं ही ‘वास्तविक’ समग्र निर्यात श्रृंखला तैयार कर ली। हमारा आकलन भिन्न-भिन्न क्षेत्रों (यथा-कपड़ा, सॉफ्टवेयर सेवाओं इत्यादि) को लेकर होता है और हम समग्र वास्तविक (वस्तुओं और सेवाओं की स्वतंत्र रूप से) श्रृंखला के लिए उनको जोड़ते हैं।
हमने भारत के निर्यात को चार उपखंडों-उच्च, मध्यम और निम्न तकनीकी वस्तु निर्यात एवं सेवा निर्यात में विभाजित किया। हमने पाया कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान वास्तविक उच्च-तकनीकी वस्तु निर्यात सबसे तेजी से बढ़े। साथ ही साथ वास्तविक सेवा निर्यात विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी निर्यात में प्रभावशाली उल्लेखनीय वृद्धि हुई। उच्च तकनीकी वस्तुओं में इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग वस्तुओं और औषधीय (फार्मा) उत्पाद शामिल हैं। 
जहां तक मध्यम एवं निम्न-तकनीकी निर्यात की बात है तो उनकी स्थिति कमजोर है और फिलहाल वे महामारी पूर्व के स्तर पर ही टिके हुए हैं। वहीं वास्तविक मध्यम-तकनीक निर्यात के मोर्चे पर स्थिति महामारी के दौरान अधिकांश समय बहुत लचर बनी रही, लेकिन हाल के महीनों में रत्न एवं आभूषणों के निर्यात में खासी बढ़ोतरी देखने को मिली है। इस श्रेणी में रत्न एवं आभूषणों के अतिरिक्त रसायन (फार्मा उत्पादों को छोड़कर) और परिशोधित पेट्रोलियम इत्यादि आते हैं। वर्ष 2021 में वृद्धि का रुझान दर्शाने के बाद वास्तविक निम्न-तकनीक निर्यात में 2022 की शुरुआत से ही गिरावट का रुख दिखने लगा।
इस श्रेणी में खाद्य उत्पाद, कपड़ा और चमड़ा उत्पाद इत्यादि आते हैं। तेजी से बढ़ते उच्च-तकनीक निर्यात और कमजोर निम्न-तकनीकी निर्यात के बीच यह छितराव भारत की के-शेप रिकवरी (अंग्रेजी के ‘के’ शब्द की आकृति जैसे सुधार) के गणित को बिगाड़ रहा है, जहां कुछ पहलू तो समृद्ध हुए हैं और अन्य ठहराव के शिकार दिखते हैं। इसका ही नतीजा है कि उच्च-तकनीक निर्यात से जुड़ी कंपनियां और उनमें काम करने वाले मध्यम एवं निम्न-तकनीक निर्यात से जुड़ाव रखने वालों की तुलना में कहीं बेहतर लाभ और वेतन पा रहे हैं। 
पिछले कुछ वर्षों के दौरान निर्यात की कहानी एकदम स्पष्ट रही है। सवाल यही उठता है कि आखिर बीते कुछ महीनों में क्या घटित हो गया? हालिया आंकड़े दर्शाते हैं कि समग्र वास्तविक वस्तु निर्यात नरम पड़ा है। अप्रैल 2019 से जुलाई 2021 के बीच साल दर साल 8.7 प्रतिशत की औसतन वृद्धि दर्ज करने के बाद अप्रैल से जुलाई, 2022 के बीच की अवधि में उसकी वृद्धि दर घटकर 4.9 प्रतिशत रह गई। इस पर गहराई से दृष्टि डालेंगे तो पाएंगे कि जहां सभी श्रेणियों में कमजोरी के रुझान दिखते हैं, वहीं उच्च-तकनीक निर्यात में निरंतर रूप से सबसे अधिक तेजी बनी हुई, जिसके बाद मध्यम-तकनीक वस्तुओं और उसके बाद निम्न-तकनीक वस्तुओं की बारी आती है। 
अभी तक के हमारे विश्लेषण से कुछ अच्छी और कुछ बुरी खबरें सामने आती हैं। अच्छी खबर यही है कि भारत उन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन बढ़ाने में सक्षम रहा, जिनकी महामारी के दौरान सबसे अधिक मांग रही, जैसे कि सूचना प्रौद्योगिकी सेवाएं, मोबाइल हैंडसेट और फार्मा उत्पाद। भारत 2017 से ही उच्च-तकनीकी निर्यात के वैश्विक बाजार में अपनी बढ़त बना रहा है। इन नए व्यापार अवसरों में से कुछ महामारी के बाद भी बढ़त बनाए रख सकते हैं। 
जो खबर बहुत ज्यादा अच्छी नहीं, वह यही है कि यदि निर्यात में नरमी शेष वर्ष के दौरान इसी प्रकार कायम रहती है तो जीडीपी में निर्यात क्षेत्र का योगदान पिछले वर्ष के मुकाबले एक चौथाई ही रह जाएगा। सीधे शब्दों में कहें तो निर्यात में नरमी का भारत की जीडीपी वृद्धि पर असर आसन्न दिखता है। साथ ही यह पहलू भी महत्त्वपूर्ण है कि भले ही उच्च-तकनीक निर्यात अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हों, लेकिन असल में निम्न-तकनीक निर्यात ही बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन करते हैं। ऐसे में भारत को कपड़ा, चमड़ा और खाद्य निर्यात के मोर्चे पर कड़ी मेहनत-मशक्कत करने की आवश्यकता है।  
इस पूरे परिदृश्य के कुछ नीतिगत निहितार्थ भी हैं। प्रतिस्पर्धी रुपया अनिश्चित समय में निर्यात बढ़ाने की एक रणनीति माना जाता है। इस वर्ष के आरंभ से डॉलर सूचकांक करीब 10 प्रतिशत मजबूत हुआ है, जबकि इस दौरान रुपया मात्र करीब छह प्रतिशत ही कमजोर हुआ है। भुगतान संतुलन घाटे की स्थिति में रुपये को अपेक्षाकृत संतुलित बनाए रखने के लिए आरबीआई ने विदेशी विनिमय बाजार में व्यापक हस्तक्षेप किया है। हमारा मानना है कि इस पड़ाव से कुछ क्रमिक अवमूल्यन की स्थिति भारत के निर्यात और उसकी आर्थिक वृद्धि को पोषित करने में सहायक सिद्ध हो सकती है। 
(लेखिका एचएसबीसी सिक्योरिटीज ऐंड कैपिटल मार्केट्स (इंडिया) में चीफ इंडिया इकॉनमिस्ट हैं)

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First Published - September 20, 2022 | 10:29 PM IST

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