सरकार की ओर से ऐसे संकेत हैं कि सन 2025 तक शायद भारत को यूरिया आयात करने की आवश्यकता न पड़े। यह बात इससे अच्छे समय पर सामने नहीं आ सकती थी क्योंकि विश्व स्तर पर सर्वाधिक खपत वाले इस उर्वरक की कीमतें नई ऊंचाइयों पर पहुंच गई हैं और रूस-यूक्रेन युद्ध तथा चीन एवं अन्य देशों द्वारा निर्यात में कटौती के कारण इसकी उपलब्धता प्रभावित हुई है। इस समय विश्व स्तर पर यूरिया की कीमतें 2008 के खाद्य एवं वित्तीय संकट के बाद के उच्चतम स्तर पर हैं। फॉस्फेट और पोटैशियम आधारित उर्वरकों की कीमतों पर भी ऐसा ही प्रभाव पड़ा है। इन उर्वरकों के मामले में भारत की आयात निर्भरता यूरिया से भी अधिक है। इसके परिणामस्वरूप चालू वित्त वर्ष में उर्वरक सब्सिडी के 2.5 लाख करोड़ रुपये का स्तर पार कर जाने का अनुमान है जो गत वित्त वर्ष के 1.62 लाख करोड़ रुपये की तुलना में काफी अधिक है। देश में अधिक उत्पादन, उर्वरकों का ज्यादा किफायती इस्तेमाल और पौधों के पोषण के जैविक स्रोतों को बढ़ावा देने से सब्सिडी का बोझ कम करने में मदद मिलेगी।
एक तथ्य यह भी है कि यूरिया के मामले में आत्मनिर्भरता की चर्चा 2015 से ही चल रही है जब नई यूरिया नीति पेश की गई थी। वह नीति घरेलू उत्पादन बढ़ाने, यूरिया उत्पादन में ऊर्जा किफायत को बढ़ावा देने और निष्क्रिय उर्वरक संयंत्रों को नए सिरे से शुरू करने पर केंद्रित थी। इस लिहाज से ‘नैनो यूरिया’ अतिरिक्त लाभदायक है क्योंकि वह पारंपरिक यूरिया की तुलना में अधिक प्रभावी है। नई पीढ़ी का यह यूरिया एक बैग के बराबर यूरिया को 500 मिलीलीटर के तरल पदार्थ में तब्दील कर सकता है। ऐसा करने से कृषि से जुड़े इस अहम कच्चे माल के आयात के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने में मदद मिलेगी। सहकारी क्षेत्र की बड़ी उर्वरक कंपनी इफको को नैनो यूरिया तकनीक की दिशा में प्रगति करने और इसे बढ़ावा देने के लिए समुचित श्रेय दिया जाना चाहिए। यह पहले ही अपनी क्षमता साबित कर चुकी है।
नैनो यूरिया के उत्पादन के नए संयंत्रों के शुरू होने के बाद इसकी उत्पादन क्षमता मौजूदा 5 करोड़ बॉटल (500 मिली प्रत्येक) से बढ़कर 44 करोड़ बॉटल हो जाएगी।
रामागुंडम, तलचर, गोरखपुर, सिंदरी और बरौनी के उर्वरक संयंत्रों के अलावा अन्य स्थानों पर कुछ नए संयंत्र भी पूरी क्षमता से उत्पादन शुरू कर देंगे। कई विश्लेषकों का मानना है कि नई नैनो यूरिया क्षमता के बाद भारत को अब यूरिया आयात के बजाय उसके निर्यात पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। नैनो तकनीक ने नैनो डी अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) के उत्पादन के भी अवसर तैयार किए हैं। डीएपी दूसरा सबसे अधिक आयात किया जाने वाला कृषि उर्वरक है। इस समय इसका विकास अग्रिम अवस्था में है और इसके विकास के बाद डीएपी की कीमत आधी रह जाएगी।
इन नवाचारों का महत्त्व केवल उर्वरक आयात पर निर्भरता समाप्त करने से कहीं अधिक है। इसके कई लाभ हैं जिनमें कीमत में कमी से लेकर आपूर्ति में इजाफा, उर्वरक के इस्तेमाल में किफायत और किसानों की आय बढ़ाने तक कई बातें शामिल हैं।
अध्ययन बताते हैं कि एक ओर जहां पारंपरिक उर्वरकों के मामले में पौधों की पोषण खपत केवल 25-30 प्रतिशत होती है जबकि नैनो उत्पादों में यह बढ़कर 90 प्रतिशत तक हो जाती है। ऐसे में फसल उत्पादन में भी सुधार होता है। इसके अलावा नैनो यूरिया और डीएपी का इस्तेमाल मिट्टी, हवा और पानी में रासायनिक उर्वरकों से होने वाले प्रदूषण को कम करने में मदद करेगा। इस नई प्रगति के साथ भारत यूरिया तथा अन्य उर्वरकों के थोक आयातक से थोक निर्यातक बनने की ओर बढ़ रहा है।