सात वर्ष बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अचानक विकास पुरुष के रूप में दोबारा उभरे हैं। उनकी मूल छवि इसी रूप में प्रस्तुत की गई थी। संसद में दो भाषणों में उन्होंने ऐसे शब्द इस्तेमाल किए जो उन लोगों की आंखों में आंसू ला देंगे जो पूंजीवाद और निजीकरण के जादू के अत्यधिक हिमायती हैं। पहले उन्होंने कहा, ‘निजी क्षेत्र को गाली देने की संस्कृति अब स्वीकार्य नहीं है।’ उन्होंने दूसरी बात कही, ‘सब कुछ बाबू ही करेंगे… यह कौन सी बड़ी ताकत बनाकर रख दी हमने? बाबुओं के हाथ में देश देकर के हम क्या करने वाले हैं?’ इस पर वित्त मंत्रालय के प्रमुख आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने ट्वीट किया, ‘एक भारतीय प्रधानमंत्री को देश में निजी क्षेत्र के लिए इतनी स्पष्टवादी बात करते देखना सुखद है।’ इन बातों को लेकर उत्साहवद्र्धक प्रतिक्रियाओं के बारे में मेरा यही कहना है कि हम लोग या तो आसानी से बातें भूल जाते हैं या फिर हम जानबूझकर सच से आंखे मूंद लेते हैं।
हम क्या भूल रहे हैं?
मोदी करीब सात वर्ष पहले सत्ता में आए थे। इसके पीछे अत्यंत ऊर्जावान और कल्पनाशील प्रचार अभियान था जिसने बेहतरीन नारों, वादों और आरोपों के मिश्रण का प्रभावी इस्तेमाल करते हुए लोगों के गुस्से का लाभ उठाया। बेरोजगार युवाओं से लेकर हताश कारोबारियों तक सब इसमें शामिल थे। चुनाव के पहले उनके दो वादों ने खूब सुर्खियां बटोरीं। पहला, ‘सरकार की कारोबार में कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए’ और दूसरा ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन।’ अब हमें वही बातें थोड़ी अलग भाषा में सुनने को मिल रही हैं। बीते सात सालों के दौरान हमारा सामना शर्मिंदा करने वाले मीम, चुटीली बातों, जुमलों और चतुराईपूर्ण शब्दावली के साथ-साथ विभिन्न योजनाओं और परियोजनाओं से हुआ। अफसरशाही से हमारा पाला कुछ ज्यादा ही पड़ा और हमें नोटबंदी भी झेलनी पड़ी।
इस अवधि में न तो बहुत अधिक निजीकरण हुआ और ना ही निजी क्षेत्र के लिए बहुत अधिक घोषणाएं की गईं। इसके विपरीत मोदी ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार की योजनाओं के नाम बदलना, उनका विस्तार करना और कई नई योजनाएं शुरू करना प्रारंभ कर दिया। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार से सीख लेते हुए उसने मुद्रा ऋण मेला शुरू किया। विचारक और लेखक अरुण शौरी ने इस सरकार के बारे में उचित ही कहा था कि यह सरकार ‘संप्रग में गाय का इजाफा’ है कुछ और नहीं।
सार्वजनिक क्षेत्र
सार्वजनिक क्षेत्र में कोई सुधार नहीं हुआ, कोई सार्थक विनिवेश नहीं हुआ। केवल अदला-बदली हुई। मसलन ओएनजीसी ने हिंदुस्तान पेट्रोलियम में हिस्सेदारी खरीदी और पॉवर फाइनैंस कॉर्पोरेशन ने रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशन में खरीद की। लाभांश के रूप में सरकारी कंपनियों से अरबों रुपये निकाले गए। उनमें से कुछ के पास तो वेतन देने तक के लिए पैसे नहीं हैं। स्वामित्व, भ्रष्टाचार और सरकारी बैंकों में जवाबदेही को लेकर हालात पहले जैसे ही हैं। जबकि इन्हें चालू रखने के लिए इनमें सैकड़ों अरब की राशि डाली गई।
निजी क्षेत्र
आज संपत्ति निर्माताओं की सराहना की बात कैसे आई। याद रहे राहुल बजाज को कहना पड़ा था, ‘हमने 27 मई, 2014 को एक शहंशाह चुना था लेकिन अब सरकार चमक गंवा रही है।’ मोदी ने जो चुनिंदा नारे दिए थे उनमें से एक था, ‘आतंक नहीं पर्यटन’। परंतु विश्व आर्थिक मंच के एक अध्ययन में सांस्कृतिक संसाधन और कारोबारी यात्राओं के मामले में 140 देशों में आठवें स्थान पर रहने के बावजूद भारत पर्यटन सेवा अधोसंरचना के मामले में 109वें स्थान पर रहा। कुछ दिन पहले वित्तीय विशेषज्ञ और मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान के कट्टर समर्थक वल्लभ भंसाली ने कहा कि सन 2021 का बजट 1991 के सुधारों से बेहतर है। जबकि कुछ महीने पहले उन्होंने कहा था कि यदि कुछ कर प्रावधान सरकार के खिलाफ जाते हैं तो वह कानून बदल देती है। उन्होंने कहा कि नागरिक हमेशा घाटे में रहते हैं। सब्सिडी आदि का पूरा भुगतान नहीं होता है इसलिए भरोसे की कमी रहती है। उन्होंने कहा कि हम कारोबारी सुगमता से आगे निकल चुके हैं और सरकार को कहना होगा कि कृपया कारोबार करें। कहने का अर्थ यह है कि बीते सात वर्ष में निजी क्षेत्र की यह स्थिति रही है।
सन 2015 में जब मोदी ने मीडिया को पहला साक्षात्कार दिया था तब हिंदुस्तान टाइम्स के संजय नारायण ने उनसे पूछा, ‘कारोबारी समुदाय नाखुश है क्योंकि कारोबारी सुगमता के क्षेत्र में कुछ खास बदलाव नहीं हुआ है और कर नोटिस भी उन्हें परेशान कर रहे हैं? क्या आपको लगता है कि आपकी सरकार बदलाव लाने में कामयाब रही है?’ मोदी ने चतुराईपूर्वक बात घुमा दी। उन्होंने कहा, ‘मेरी सरकार आम आदमी के लिए काम कर रही है…उद्योग जगत को आगे आकर उस प्रक्रिया का लाभ लेना चाहिए जो हमने स्थापित की है…लालफीताशाही न होने का अर्थ नहीं है कि वह मुकेश अंबानी के लिए तो न हो लेकिन आम आदमी के लिए हो। यह सही नहीं होगा।’ हकीकत में आज छोटे और मझोले उपक्रमों के लिए लालफीताशाही और कर आतंक कहीं अधिक है।
सवाल यह है कि किस प्रधानमंत्री मोदी पर यकीन किया जाए? उन पर जिनके चुनाव पूर्व नारों ने आश्वस्त किया लेकिन बाद में कारोबारी सुगमता के क्षेत्र की कोई बाधा दूर नहीं हुई या फिर उन पर जिन्होंने यह कहकर हमारी आंख में आंसू ला दिए कि संपत्ति निर्माता देश के लिए जरूरी हैं क्योंकि केवल तभी संपत्ति का वितरण हो सकेगा। मोदी सरकार सात वर्ष तक बड़े सुधारों से बचती रही और सरकारी बैंकों को लेकर ज्ञान संगम, इंद्रधनुष, बैंक्स बोर्ड ब्यूरो, पुनर्पूंजीकरण, विलय आदि जैसे कई कदम उठाए गए। हालिया बजट में भी दो सरकारी बैंकों के निजीकरण की बात कही गई है।
हमारी स्मृति बहुत अल्प होती है। हम एक साथ बहुत सारी बातों पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सकते। हमें एकदम हालिया बातें याद रहती हैं और हम उन पर ही राय बनाते हैं। सुधारों के मामले में मोदी को मार्गरेट थैचर का भारतीय रूप मानना इसी का उदाहरण है। नीतिगत मामलों में तो हमारी स्मृति और कमजोर होती है। यही कारण है कि कई लोग ताजा नारों से उत्साहित हैं और कारोबारी सुगमता में कमी, कर आतंक, ऊंची तेल कीमतों और अफसरशाही पर निर्भरता के सात वर्षों को भुला बैठे हैं।