पश्चिम एशिया में ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के सैन्य अभियान और जवाबी हमलों से तनाव बढ़ गया है। संघर्ष की दिशा, अवधि और परिणाम सभी अनिश्चित हैं। भारत के लिए क्या वर्तमान अनुकूल आर्थिक स्थिति (कम मुद्रास्फीति, स्थिर विकास) बनी रह पाएगी, यह आगे तेल की कीमतों के अलावा होर्मुज स्ट्रेट में व्यवधान और नीतिगत प्रतिक्रियाओं पर निर्भर करेगा।
खाड़ी देशों और होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते तेल आयात पर भारत की निर्भरता उसकी एक कमजोरी है। भारत अपनी घरेलू तेल जरूरतों का 85फीसदी से अधिक आयात करता है। कच्चे तेल के आयात में लगभग 46 फीसदी हिस्सा इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत का है। होर्मुज स्ट्रेट एक महत्त्वपूर्ण अवरोध बिंदु है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 फीसदी हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है, जबकि भारत के लिए कच्चे तेल और एलएनजी आयात का लगभग आधा हिस्सा और आयातित एलपीजी का 100 फीसदी हिस्सा इसी स्ट्रेट से होकर पहुंचता है।
यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब रूस से भारत में कच्चे तेल की आपूर्ति में कमी आई है। जंग के कारण वाणिज्यिक ऑपरेटरों और बीमा कंपनियों ने इस मार्ग से अपना कारोबार समेट लिया है। इस वर्ष बहुत बड़े क्रूड कैरियर के हाजिर भाव में 1,100 फीसदी की भारी वृद्धि हुई है, जिससे होर्मुज स्ट्रेट वस्तुत: बंद हो गया है। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि व्यवधान कितने समय तक चलेगा, लेकिन यह जितना लंबा चलेगा, आपूर्ति श्रृंखला पर इसके व्यापक प्रभाव पड़ने का खतरा उतना ही अधिक होगा। तेल और गैस की लगातार ऊंची कीमतें परिवहन लागत बढ़ाती हैं, उर्वरकों की कीमतों पर इसका असर पड़ता है और इससे खाद्य पदार्थों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं।
भारत जैसे शुद्ध तेल आयातक देश के लिए तेल की कीमतों में वृद्धि एक मुद्रास्फीति संबंधी गतिरोधी झटका है, जिससे दोहरे घाटे की स्थिति और बिगड़ जाती है। ऊर्जा की बढ़ती लागत से कंपनियों के लाभ मार्जिन में कमी आती है, जिससे आर्थिक वृद्धि दर कमजोर होती है। उच्च मुद्रास्फीति से परिवारों की वास्तविक व्यय योग्य आय कम हो सकती है। बढ़ती अनिश्चितता और वित्तीय बाजार में अस्थिरता से भरोसा कमजोर हो सकता है।
हमारे अनुमान के अनुसार, यदि तेल की कीमतों में प्रत्येक 10 फीसदी की वृद्धि पूरी तरह से उपभोक्ताओं पर डाली जाए, तो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर में 0.15 फीसदी अंक की कमी आ सकती है, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति दर में 0.5 फीसदी अंक की वृद्धि हो सकती है और चालू खाते को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 0.4 फीसदी तक झटका लग सकता है। यदि तेल की कीमतों में वृद्धि उपभोक्ताओं पर नहीं डाली जाती है, तो मुद्रास्फीति और आर्थिक वृद्धि पर इसका प्रभाव संभवतः कम होगा, लेकिन राजकोषीय लागत जीडीपी के लगभग 0.15 फीसदी तक अधिक होगी।
तेल की बढ़ती कीमतों के परिणाम खराब होते हैं, लेकिन आर्थिक प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करता है कि यह उछाल कितने समय तक रहती है। कीमतों में अचानक लेकिन अस्थायी उछाल को संभालना आसान है, जबकि कीमतों में लगातार वृद्धि अधिक हानिकारक होगी। फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि आगे क्या हालत होगी।
किसी भी प्रकार की व्यवधान की स्थिति के लिए कुछ भंडार मौजूद हैं। भारत के वाणिज्यिक कच्चे तेल का भंडार 10 करोड़ बैरल और रणनीतिक भंडार 3.9 करोड़ बैरल है, जो लगभग 30 दिन की कच्चे तेल की खपत और पश्चिम एशिया से 60 दिन की कच्चे तेल की आपूर्ति के बराबर हैं।
पेट्रोल और डीजल दोनों के लिए तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) के पास कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को संभालने के लिए कुछ मार्केटिंग मार्जिन बफर मौजूद है। हमारा अनुमान है कि ओएमसी तब तक लाभ में रह सकती हैं जब तक ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतें 85 डॉलर प्रति बैरल के पार स्थिर रूप से नहीं पहुंच जातीं।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भारत की शुरुआती स्थिति कहीं अधिक मजबूत है। पिछले दो वर्षों से मुद्रास्फीति का स्तर नियंत्रण में रहा है, और ऐसे संकेत हैं कि पिछली नीतिगत ढील, आसान वित्तीय परिस्थितियों, विकासोन्मुखी बजट, स्थिर वैश्विक विकास, कम टैरिफ और हालिया व्यापार समझौतों के प्रभावों के कारण आने वाली तिमाहियों में चक्रीय वृद्धि में तेजी आएगी। बाहरी जोखिम मुख्य चिंता बनी हुई है। ब्रेंट तेल की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल टिकने पर, चालू खाता घाटा वित्त वर्ष 2026 में सकल घरेलू उत्पाद के 1 फीसदी से कुछ कम से बढ़कर वित्त वर्ष 2027 में 1.5 फीसदी से थोड़ा अधिक हो जाएगा।
ऐतिहासिक मानकों के अनुसार यह कम है, लेकिन पूंजी खाते से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। वैश्विक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति के कारण विदेशी निवेश का बाहर जाना, बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जारी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की वापसी और भारत के स्वयं के बाहर किए जाने वाले प्रत्यक्ष निवेश से अल्पावधि में भुगतान संतुलन पर दबाव पड़ सकता है।
अनिश्चितता के बढ़ते स्तर को देखते हुए, फिलहाल इंतजार करना और स्थिति पर नजर रखना ही समझदारी होगी। अगर यह वाकई ऊर्जा की कीमतों में अल्पकालिक उछाल साबित होती है, तो इसके दुष्प्रभाव नियंत्रण में रहेंगे।
यदि तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो सरकार को प्राथमिक उपाय के रूप में राजकोषीय नीति को सक्रिय करना पड़ सकता है। राजकोषीय हस्तक्षेप में सब्सिडी बढ़ाना, घरेलू ईंधन उत्पाद शुल्क में कटौती करना और कच्चे तेल और परिष्कृत उत्पादों पर आयात शुल्क कम करना शामिल हो सकता है। इसमें वृद्धि और राजकोषीय संतुलन के बीच संतुलन बनाना होगा, लेकिन यह एक सेतु का काम करता है।
मौद्रिक नीति के लिए तेल की ऊंची कीमतें ब्याज दरों को स्थिर रखने के पक्ष में तर्क को मजबूत करती हैं। यह आपूर्ति पक्ष का झटका है और इसका आर्थिक वृद्धि (कमी) और मुद्रास्फीति (वृद्धि) पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। मुद्रा बाजारों में अस्थिरता का प्रबंधन करना मुख्य प्राथमिकता है, साथ ही कीमतों पर बढ़ते दबाव पर भी नजर रखना आवश्यक है।
अंततः, ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना आवश्यक है, खासकर अमेरिका, कनाडा, पश्चिम अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की ओर देखना होगा। यह महंगा हो सकता है, लेकिन लचीलेपन के लिए आवश्यक है। जीवाश्म ईंधन के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए एक बड़ा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बनाना और नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग में तेजी लाना भी महत्त्वपूर्ण है।
अंततः, ईरान संघर्ष अल्पकालिक जोखिम हो सकता है, और यदि टकराव समाप्त हो जाता है और ईरान पर लगे प्रतिबंध हटा दिए जाते हैं, तो भारत को भी समय के साथ कच्चे तेल की आपूर्ति में वृद्धि से लाभ हो सकता है। हालांकि, यह एक महत्त्वपूर्ण चेतावनी है कि भू-राजनीतिक विखंडन की नई वास्तविकता से निपटने के लिए नीतियां बनाना आवश्यक है, जहां ऊर्जा बाजारों को मूल्य में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियों, दोनों का सामना करना पड़ता है।
(लेखिका नोमूरा में मुख्य अर्थशास्त्री (जापान के अलावा शेष एशिया और भारत) हैं)