प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
उदारीकरण का वादा और विनिर्माण की चुनौती
विनिर्माण नीति में नई स्टार्टअप और तकनीकी वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। बता रहे हैं नितिन देसाई
लगभग 35 वर्ष पहले वर्ष 1991 में तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने एक ऐसा बजट पेश किया था जिसने औद्योगिक लाइसेंसिंग का अंत करते हुए ‘उदारीकरण’ वाले सुधारों की शुरुआत की थी। यद्यपि उसे ‘निजीकरण’ सुधारों के रूप में अधिक जाना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें सरकारी क्षेत्र से निजी उद्योगों की ओर बदलाव को देखा जा सकता था। शायद इसका सबसे अहम इरादा था विनिर्माण में वृद्धि को रफ्तार देना। सकल मूल्यवर्धन (जीवीए) में विनिर्माण की हिस्सेदारी में वृद्धि भी देखने को मिली और 1995-96 तक यह वर्तमान मूल्यों पर बढ़कर 19.7 फीसदी हो गया। परंतु यह अस्थायी कामयाबी थी।
तब से जीवीए में विनिर्माण की हिस्सेदारी 17-18 फीसदी के आसपास बनी रही और 2011-12 में यह 17.4 फीसदी रही। इसके बाद इसमें गिरावट आने लगी और 2023-24 में यह घटकर 14.3 फीसदी पर आ गई जो 1974-75 में हासिल स्तर से भी 3 फीसदी कम था।
यह गिरावट सकल स्थिर पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) में विनिर्माण की हिस्सेदारी में कमी से भी मेल खाती है जो 2011-12 में 40.8 फीसदी से घटकर 2023-24 में 31.6 फीसदी रह गई। और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि रोजगार में विनिर्माण की हिस्सेदारी 1990-91 से लेकर अब तक 10 फीसदी से थोड़े अधिक पर स्थिर बनी हुई है।
वैश्विक विकास सूचकांक दिखाते हैं कि वर्ष 2024 में भारत में वर्तमान डॉलर में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में प्रतिशत के रूप में विनिर्माण मूल्यवर्धन का हिस्सा 12.6 फीसदी था।
यह हमारे पड़ोसी देशों बांग्लादेश (21.9 फीसदी) और श्रीलंका (17.6 फीसदी), दक्षिण-पूर्व एशियाई देश इंडोनेशिया (19.0 फीसदी), मलेशिया (22.5 प्रतिशत), थाईलैंड (24.3 प्रतिशत) और वियतनाम (24.4 फीसदी) तथा पूर्वी एशियाई राष्ट्र चीन (24.9 फीसदी) और दक्षिण कोरिया (26.6 फीसदी) से स्पष्ट रूप से कम है। चीन के साथ तुलना सबसे उल्लेखनीय है। वर्ष 1990 में चीन और भारत के विनिर्माण आधार लगभग समान थे। लेकिन 2025 तक चीन का विनिर्माण मूल्य वर्धन भारत से लगभग 10 गुना बड़ा हो गया।
स्पष्ट रूप से जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी में भारत और अधिकांश एशियाई देशों के बीच यह बड़ा अंतर इस बात का संकेत है कि हमारे यहां विनिर्माण प्रोत्साहन नीति पर्याप्त नहीं रही है।
भारत के सामने वर्तमान में सबसे महत्त्वपूर्ण विकास चुनौती विनिर्माण वृद्धि को नई गति देना और 25 फीसदी लक्ष्य हासिल करने की संभावना बढ़ाना है जिसे पहली बार 2012 में व्यक्त किया गया था और 2015 तथा 2025 की नीतिगत घोषणाओं में दोहराया गया। सच्चाई यह है कि विनिर्माण विकास का निजीकरण नए उद्यमियों के लिए उस तरह के अवसर नहीं पेश कर पाया जैसा कि उदारीकरण से अपेक्षित था। स्थापित औद्योगिक समूह फले-फूले और अपनी मौजूदगी का विस्तार करते गए।
सरकारी हस्तक्षेप को व्यवसाय-हितैषी होने से बाजार-हितैषी होने की ओर बढ़ना चाहिए। यह 1991 में शुरू किए गए ‘उदारीकरण’ बदलाव के साथ अधिक सुसंगत होगा। हमारी वर्तमान नीति में औद्योगिक लाइसेंसिंग समाप्त होने के बाद भी उद्यमिता चयन शामिल है और विनिर्माण में उत्पादन संबद्ध पहल (पीएलआई) जैसे समर्थन कार्यक्रमों में यह जारी है। इनमें से अधिकांश बहुक्षेत्रीय समूहों के पक्ष में हैं। सरकार और कुछ उद्यमों के बीच यह संबंध अन्य लोगों को संबंधित क्षेत्रों में प्रवेश करने और प्रतिस्पर्धा करने से हतोत्साहित करता है।
महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक विकास के लिए उस चीज की आवश्यकता होती है जिसे जोसेफ शुम्पीटर ने ‘रचनात्मक विनाश’ कहा था। सार्वजनिक नीति में स्थापित उद्यमों को समर्थन देना इसके विपरीत काम करता है। उद्यमिता की सफलता के लिए कॉरपोरेट प्रबंधकों, अफसरशाहों या मंत्रियों के बीच किसी करीबी संबंध की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि यह प्रतिस्पर्धा को रोक सकता है।
सर्वाधिक आवश्यकता नए उद्यमियों को प्रोत्साहित करने की है और इसके लिए बाजार हितैषी नीतिगत दृष्टिकोण आवश्यक है। इस दृष्टिकोण का आधार वही है जो सरकार छोटे और मध्यम उद्यमों यानी एसएमई लिए करती है। ध्यान दें कि चीन में विनिर्माण की शानदार वृद्धि मूल रूप से चीन की केंद्रीय और स्थानीय सरकारों द्वारा नए निजी उद्यमों को प्रोत्साहित करने से हुई। इनका ध्यान मुख्य रूप से एसएमई पर था।
भारत में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए कार्यक्रम का प्रभाव सीमित है, क्योंकि जीडीपी में इनका योगदान केवल 31 फीसदी है जो चीन से काफी कम है। 2025-26 के बजट में एमएसएमई के विकास को बढ़ावा देने की कोशिश की गई थी और रोजगार गारंटी कार्यक्रम तथा ऋण समर्थन योजनाओं के लिए लगभग 11,954 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था।
लेकिन 2026-27 के बजट में बताया गया कि 2025-28 में संशोधित आवंटन केवल लगभग 2,549 करोड़ रुपये था। यह राशि बड़े उद्यमों को पीएलआई योजना के माध्यम से मिलने वाले फंड से भी काफी कम है, जहां 2025-26 के लिए संशोधित आवंटन लगभग 13,145 करोड़ रुपये है और कर प्रोत्साहनों से कॉरपोरेशन टैक्स में बचत लगभग 98,095 करोड़ रुपये है।
हमारा एमएसएमई कार्यक्रम औद्योगिक नीति से अलग-थलग प्रतीत होता है। शायद एमएसएमई योजना को एक कल्याणकारी योजना के रूप में देखा जाता है। हमें एमएसएमई के कल्याणकारी हिस्से जैसे खादी और ग्रामोद्योगों की मदद करने वाले भाग को अलग कर विनिर्माण-उन्मुख समर्थन को व्यापक औद्योगिक नीति से जोड़ना चाहिए। साथ ही विनिर्माण प्रोत्साहन में नए उद्यमियों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।
हमें समझना होगा कि साहसी और तकनीकी रूप से उन्नत स्टार्टअप मुख्यतः नए उद्यमियों से ही आएंगे। इन्फोटेक के उछाल के समय भी यही हुआ था और शायद हाल ही में डिजिटल लेनदेन पहल के विस्तार में भी। एक दिलचस्प उदाहरण 2023 में आई भारतीय अंतरिक्ष नीति के बाद 190 अंतरिक्ष-संबंधी उद्यमों का उभार है जिससे भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था जल्द ही 44 अरब डॉलर पहुंचने की उम्मीद है।
अधिकांश अंतरिक्ष-सेवा प्रदाता तकनीकी रूप से दक्ष नए उद्यमियों द्वारा प्रोत्साहित नए स्टार्टअप हैं। हमारी औद्योगिक नीति को कई छोटे उद्यमों को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो नए उद्यमी के रूप में शुरू होंगे और आगे चलकर उन्नत प्रौद्योगिकियों के डेवलपर बनेंगे। वे न केवल आयातित उन्नत वस्तुओं की राष्ट्रीय उपलब्धता बढ़ाएंगे बल्कि तेजी से बढ़ती नई वस्तुओं में निर्यात क्षमता वृद्धि का भी समर्थन करेंगे।
हमें अतीत की उन प्रथाओं को बदलने की जरूरत है जिन्होंने विनिर्माण और रोजगार में तेज वृद्धि के लिए अपेक्षित परिणाम नहीं दिए। विनिर्माण पर केंद्रित केंद्रीय योजनाओं की संख्याओं को कम करने और उन्हें दीर्घकालिक और पूर्वानुमेय बनाने की जरूरत है। फिलहाल उनकी संख्या 100 से अधिक है। बड़े समूहों और स्थापित उद्यमों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत नहीं है जो बिना सरकारी समर्थन के भी बढ़ सकते हैं और संभवतः विकसित हो सकते हैं।
सरकार की विनिर्माण नीति का प्राथमिक ध्यान नए स्टार्टअप्स और तकनीकी वृद्धि के समर्थन पर होना चाहिए। यदि हम ऐसा कर सके तो 1991 के उदारीकरण से जुड़ी उम्मीदों को गति मिलेगी।