प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
बजट और टैक्स कानूनों में होने वाले बदलाव अक्सर कागजी और पेचीदा लगते हैं। लेकिन जब कोई नियम सीधे देश में आने वाले विदेशी पैसे, रोजगार और ग्लोबल इन्वेस्टर्स के भरोसे से जुड़ा हो, तो उसका असर काफी बड़ा होता है। इसी को देखते हुए सरकार ने हाल ही में ‘टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल’ में कुछ बदलाव प्रस्तावित किए हैं, जिन पर देश के आर्थिक और निवेश जगत की नजर है।
इस बदलाव का सबसे बड़ा फोकस भारत में बैठे फंड मैनेजर्स के जरिए विदेशों से चलने वाले फंड्स (ऑफशोर फंड्स) को मैनेज करना आसान बनाना है। अभी भारत के टैक्स कानूनों में कुछ सख्त शर्तें हैं। इनकी वजह से विदेशी फंड भारत में मौजूद टैलेंट का फायदा उठाने से हिचकते थे। उन्हें डर रहता था कि अगर उन्होंने भारत में फंड मैनेजर रखा, तो कहीं उनका पूरा ग्लोबल फंड भारत में टैक्स के दायरे में न आ जाए।
लेकिन अब सरकार इसी डर और झिझक को दूर करना चाहती है। इसके लिए ‘सेफ हार्बर’ नियमों की कई सख्त शर्तों को खत्म करने का प्रस्ताव रखा गया है। टैक्स एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह बदलाव भारत को ग्लोबल फंड मैनेजमेंट हब बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।
अब तक लागू नियमों के तहत, किसी विदेशी फंड को भारत में टैक्स छूट या ‘सेफ हार्बर’ का फायदा लेने के लिए कई मुश्किल शर्तों को पूरा करना पड़ता था। मसलन, फंड का औसतन साइज कम से कम 100 करोड़ रुपये होना जरूरी था। इसके अलावा फंड में कम से कम 25 अलग-अलग निवेशक होने चाहिए थे और किसी एक निवेशक की हिस्सेदारी 10 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती थी। साथ ही, किसी एक कंपनी में फंड का 25 फीसदी से ज्यादा पैसा लगाने पर भी रोक थी।
क्लियरटैक्स की टैक्स एक्सपर्ट सीए चांदनी आनंदन बताती हैं कि सरकार आंकड़ों और ढांचे से जुड़ी इन सभी पुरानी शर्तों को खत्म करने जा रही है। आसान शब्दों में कहें तो पहले विदेशी फंडों को कई तरह के चक्करों में फंसना पड़ता था, जैसे कम से कम 25 निवेशक जुटाना, किसी एक निवेशक का पैसा 10% से ज्यादा न होने देना, कम से कम 100 करोड़ रुपये का फंड साइज बनाए रखना और किसी एक कंपनी में 25% से ज्यादा पैसा लगाने से बचना।
आनंदन के मुताबिक, अब ये सारी पाबंदियां हटने से विदेशी फंडों को बार-बार अपने फंड का स्ट्रक्चर बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी और न ही कागजी नियमों (कंप्लायंस) को पूरा करने का बेवजह सिरदर्द रहेगा। इससे उनका काम बहुत आसान और टेंशन-फ्री हो जाएगा।
इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा छोटे विदेशी फंड्स, पारिवारिक संपत्तियों को मैनेज करने वाले ‘फैमिली ऑफिस’ और नए दौर के वेंचर कैपिटल फंड्स को हो सकता है। पहले इन फंड्स के पास टैलेंट तो था, लेकिन 25 निवेशकों या 100 करोड़ रुपये के फंड का ढांचा तैयार न कर पाने की वजह से वे भारत में मौजूद फंड मैनेजर्स की सेवाएं नहीं ले पाते थे।
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जब विदेशी फंड्स को यह भरोसा हो जाएगा कि भारत से काम कराने पर उन पर अलग से भारतीय टैक्स का बोझ नहीं पड़ेगा, तो वे अपनी मुख्य गतिविधियों को भारत में शिफ्ट करने के लिए आसानी से तैयार हो जाएंगे। इससे देश के फाइनेंस और टेक सेक्टर में नौकरियों के नए मौके खुलेंगे।
एसके पटोदिया एंड एसोसिएट्स एलएलपी के डायरेक्ट टैक्स एक्सपर्ट मिहिर तन्ना का मानना है कि टैक्स का डर खत्म होते ही भारत के फंड मैनेजर्स बिना किसी झिझक के ग्लोबल पोर्टफोलियो संभाल सकेंगे। इससे देश में पोर्टफोलियो मैनेजर, रिसर्च एनालिस्ट, रिस्क मैनेजमेंट एक्सपर्ट और कंप्लायंस ऑफिसर जैसे प्रोफेशनल्स की डिमांड तेजी से बढ़ेगी।
आनंदन भी इस बात से इत्तेफाक रखती हैं। उनका कहना है कि इस छूट के बाद विदेशी फंड केवल निवेश के फैसले ही नहीं, बल्कि रिसर्च, लीगल पेपरवर्क, एकाउंटिंग और टेक से जुड़े काम भी भारतीय टीमों को सौंपने लगेंगे। इससे हमारे फाइनेंशियल सर्विस सेक्टर को एक बड़ी ताकत मिलेगी।
अक्सर यह डर जताया जाता है कि नियमों में ढील देने से कुछ लोग टैक्स बचाने के लिए इसका गलत फायदा उठा सकते हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि सरकार ने नियमों में राहत देने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित किया है कि फर्जी या सिर्फ कागजों पर बने फंड इस सुविधा का गलत इस्तेमाल न कर सकें।
नियमों में यह शर्त अभी भी पूरी तरह लागू है कि फंड में भारतीय निवासियों का सीधा निवेश 5% (Corpus Cap) से ज्यादा नहीं होना चाहिए। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कोई भारतीय नागरिक अपना ही पैसा विदेश भेजकर और फिर वापस लाकर टैक्स बचाने की कोशिश न करे। इसके अलावा, विदेशी फंड भारत में सीधे कोई कारोबार या व्यापार नहीं चला सकता।
फंड मैनेजरों के लिए भी कुछ सख्त सीमाएं रखी गई हैं। फंड मैनेजर का SEBI के साथ रजिस्टर्ड होना जरूरी है। वह फंड का कर्मचारी या उससे सीधे जुड़ा कोई करीबी व्यक्ति नहीं होना चाहिए। साथ ही, फंड मैनेजर और उससे जुड़े लोगों की उस फंड के मुनाफे में हिस्सेदारी 20 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती।
आनंदन के मुताबिक, ये सभी सुरक्षा उपाय यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि इस योजना का फायदा सिर्फ असली और प्रामाणिक विदेशी फंड ही उठा सकें, न कि टैक्स बचाने के लिए बनाए गए फर्जी ढांचे।
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प्रस्तावित नियमों में ढील का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि टैक्स डिपार्टमेंट आंखें बंद कर लेगा। जानकारों का साफ कहना है कि जो भी फंड टैक्स में राहत या सुरक्षा पाना चाहता है, उसे यह साबित करना होगा कि उसका कामकाज असली है, सिर्फ कागजों पर नहीं।
मिहिर तन्ना समझाते हैं कि नए बदलावों के बावजूद ‘जनरल एंटी-अवॉयडेंस रूल’ (GAAR) जैसे कड़े नियम लागू रहेंगे। अगर कोई छोटा या चुनिंदा निवेशकों वाला फंड कागजी शर्तें तो पूरी कर लेता है, लेकिन उसके पीछे कोई असली बिजनेस नहीं दिखता, तो टैक्स अधिकारी उस पर सवाल उठा सकते हैं और उसे टैक्स चोरी का जरिया मानकर कार्रवाई कर सकते हैं।
वे आगे बताते हैं कि पुराने अदालती फैसलों में भी यह देखा गया है कि कोई फंड कितना असली है, यह परखने के लिए अधिकारी ‘लुक-एट’ टेस्ट का सहारा लेते हैं। इसमें जांचा जाता है कि फंड कितने सालों से चल रहा है, उसका कामकाज लगातार सही ढर्रे पर है या नहीं और क्या उसने अलग-अलग देशों से पैसा जुटाकर कम से कम 5 साल तक निवेश बनाए रखा है। अगर कोई फंड इन पैमानों पर खरा उतरता है, तो उसकी विश्वसनीयता और असली बिज़नेस होना अपने आप साबित हो जाता है।
विदेशी निवेशक भारत जैसे तेजी से बढ़ते बाजार में पैसा लगाना तो चाहते हैं, लेकिन यहां के उलझे हुए टैक्स सिस्टम और आए दिन बदलने वाले नियमों को लेकर हमेशा सतर्क रहते हैं। ऐसे में यह नया ढांचा विदेशी निवेशकों में भरोसा जगाने और एक सकारात्मक माहौल बनाने में काफी मददगार साबित हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक वोडाफोन मामले की बात करते हुए मिहिर तन्ना कहते हैं कि अदालत ने भी यह माना था कि ‘टैक्स नियमों में स्थिरता किसी भी कानून का सबसे जरूरी हिस्सा है।’ जब टैक्स नियम एकदम साफ और स्थिर होते हैं, तभी विदेशी निवेशक बेझिझक होकर लंबे समय के लिए भारत में बड़ा निवेश करने की योजना बना पाते हैं।
हालांकि, एक्सपर्ट्स यह भी साफ करते हैं कि इस प्रस्तावित बिल से विदेशी पैसे की कोई गारंटी नहीं मिल जाती। आनंदन का कहना है कि इस संशोधन को एक ‘सपोर्टिव कदम’ के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी तय नतीजे के तौर पर। विदेशी निवेशक भारत में कदम रखने से पहले सिर्फ टैक्स ही नहीं देखते, बल्कि यहां के SEBI के नियम, FEMA के कानून और कानूनी मुकदमों के निपटारे में लगने वाले समय पर भी पूरा ध्यान देते हैं।