शिरोमणि अकाली दल (SAD) के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल | फाइल फोटो
बात सिर्फ इतनी नहीं थी कि कितनी तेजी से इनकार किया गया, बल्कि यह भी थी कि वह कितनी स्पष्टता से किया गया। शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर बादल के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने के कुछ ही घंटों बाद, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने घोषणा की कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पंजाब विधान सभा चुनाव के लिए शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी। इसके बाद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने बयान दिया कि भाजपा 2027 का विधान सभा चुनाव अकेले लड़ेगी। राज्य विधान सभा की 117 सीटों के लिए चुनाव अगले साल फरवरी में होंगे।
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि गठबंधन बनने से पहले ही खत्म हो गया है। कुछ महीने पहले पंजाब में हुए नगर निगम चुनावों के नतीजों को देखें तो इसका मतलब है कि ज्यादातर निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल तीसरे और चौथे स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगी। जानिए क्यों।
वर्ष 1996 में मोगा घोषणापत्र में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच बिना शर्त गठबंधन की बात कही गई। उसमें गठबंधन के आधार के रूप में सिख, हिंदू, दलित या मुस्लिम पहचान के बजाय ‘पंजाबियत’ पर जोर दिया गया। यह साझेदारी पंजाब के सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक गठबंधनों में से एक बन गई, जिसमें दोनों दलों ने लगभग दो दशकों से अधिक समय तक साथ मिलकर काम किया। दोनों दल एक साझा प्रतिद्वंद्वी, कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हुए थे।
हालांकि, जब सितंबर 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर शिरोमणि अकाली दल गठबंधन से बाहर हो गया, तो दोनों पक्षों को अच्छे समय की नहीं, बुरे समय की याद आई। साथ मिलकर, वे एक विजयी टीम थे, भले ही वे एक-दूसरे से असहमत होते थे, जो अक्सर होता था। लेकिन अलग-अलग, वे हर चुनाव हारते रहे।
पंजाब में भाजपा के भीतर यह प्रबल मत है कि पार्टी को अब अपने दम पर खड़ा होना चाहिए और बुरी तरह से समझौता कर चुकी शिरोमणि अकाली दल का साथ त्याग देना चाहिए। इसे बल देने के लिए पार्टी सिखों तक पहुंचने के प्रयास में एक ऐसी नीति अपना रही है जिसे कुछ हद तक अतिरंजित प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हालिया सार्वजनिक संबोधन में सिख समुदाय के लिए सरकार की पहलों का उल्लेख किया: अफगानिस्तान से श्री गुरु ग्रंथ साहिब स्वरूपों की वापसी, तख्त श्री पटना साहिब में गुरु गोविंद सिंह और माता साहिब कौर के 300 साल पुराने पवित्र जूते (जोड़े साहिब) की स्थापना, हेमकुंड साहिब रोपवे का निर्माण, स्वर्ण मंदिर के लिए विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के तहत विदेशी चंदे को मंजूरी देना और चार साहिबजादों की वीरता और शहादत को सम्मान देने के लिए 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस के रूप में स्थापित करना।
लेकिन इसमें राजनीतिक संकेत भी है: ‘वारिस पंजाब दे’ के दो उम्मीदवारों ने खडूर साहिब और फरीदकोट से 2024 का लोक सभा चुनाव जीता। दोनों ही खालिस्तान का खुलकर और निडर रूप से समर्थन करते रहे हैं। अब वारिस पंजाब दे ने विधान सभा चुनावों के लिए कम से कम पांच उम्मीदवारों की घोषणा की है, जिनमें से कई जेल में बंद हैं। अजनाला, मोगा, कपूरथला, कोटकापुरा, बस्सी पठाना और गिल निर्वाचन क्षेत्रों से उम्मीदवार किसी सरकारी रोकटोक के बिना अलगाववादी विचारधारा का समर्थन करेंगे।
इससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण मुद्दा यह है कि इसका शिरोमणि अकाली दल पर क्या प्रभाव पड़ेगा। लंबे समय से उदारवादी माने जाने वाली इस पार्टी के लिए यह एक बड़ा झटका है, जिससे उग्र अकालियों के लिए जगह बन जाएगी। पंजाब में उग्रवाद सीधे तौर पर दिखाई नहीं देता, लेकिन यह सतह के ठीक नीचे मंडराता रहता है।
भाजपा का मानना है कि हिंदू आबादी पहले से ही पार्टी के साथ है। लेकिन पंजाबी हिंदू सिख भी हैं और ग्रामीण पंजाबी सिख हिंदू भी हैं। इसके अलावा, पंजाबी हिंदू आर्य समाजी हैं, सनातनी नहीं। उनके लिए मंदिर उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना गुरुद्वारा, बल्कि दोनों एक समान हैं। कर्मकांड नाममात्र का है। इसका प्रमाण चाहिए?
वर्ष 2022 में राम मंदिर की लहर के बावजूद (जिसका निर्माण शुरू हो चुका था) आम आदमी पार्टी (आप) ने हिंदू मतदाताओं का जबरदस्त समर्थन हासिल किया और हिंदू बहुल 22विधान सभा सीटों में से 15 पर जीत दर्ज की, जबकि भाजपा को इनमें से केवल दो सीट मिलीं। (कांग्रेस ने 5 सीट जीतीं)। आम आदमी पार्टी भजन संध्या (पूरी तरह से सरकारी मदद से हिंदू तीर्थयात्राएं) और पटियाला में काली मंदिर के जीर्णोद्धार के माध्यम से इस लाभ को और मजबूत कर रही है। पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल ने कहा, ‘आज तक, पंजाब में किसी भी पार्टी या सरकार ने सनातन धर्म के लिए उतना काम नहीं किया जितना आम आदमी पार्टी सरकार ने किया है।’
भाजपा में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी से पलायन कर चुके वे नेता, जिन्हें पार्टी के आधार को बढ़ाने और अंदरखाने की जानकारी प्रदान करने के लिए माना जाता है, अपने साथ कई परेशानियां लेकर आए हैं। वे अपने गुटों और प्रतिद्वंद्विता को अपनी नई पार्टी में ले आए हैं और नए गुटों और प्रतिद्वंद्विता को जन्म दिया है, जैसा कि हाल ही में संगरूर में भाजपा नेताओं के इस्तीफे से पता चला, जब उन्हें भाजपा में शामिल हुए आम आदमी पार्टी के नेताओं की सलाह पर किनारे किया गया था।
पंजाब में मौसम तो ठंडा हो रहा है लेकिन चुनावी माहौल गरमा रहा है, जिससे वहां अत्यधिक अस्थिरता का माहौल छाया हुआ है। जलवायु परिवर्तन का राज्य के लिए एक नया ही अर्थ है।