प्रतीकात्मक तस्वीर
जब 15 अगस्त को तिरंगा देश के शहरों में लहराया गया तब कई ऐसे शहर भी थे जो आजादी के बाद पहली बार झंडा फहराए जाने के वक्त मौजूदा स्वरूप में ही नहीं थे। गुरुग्राम तब खेतों का इलाका था, बेंगलूरु पेंशन पाने वालों का शांत शहर माना जाता था जबकि सूरत एक छोटे स्तर का बंदरगाह था। इन 79 वर्षों में भारत ने पूरे देश में एक विशाल शहरी सभ्यता खड़ी की है। अब समय आ गया है कि हम तय करें कि आखिर हम किस तरह के शहर बना रहे हैं और उनका उद्देश्य क्या है।
शहरों की हवा, पानी, कचरे और खत्म होते सार्वजनिक संसाधनों पर सवाल उठाना जरूरी है। लेकिन इन समस्याओं की सूची बनाने से पहले हमें यह पूछना चाहिए कि एक भारतीय शहर आखिर किसलिए है? एक नागरिक को अपने शहर से क्या-क्या सुविधाएं पाने का अधिकार होना चाहिए?
भारतीय शहरों का स्वरूप तेजी से बदल गया है लेकिन उन्हें परिभाषित करने का हमारा तरीका अब भी पुराना है। लगभग सौ साल पहले शहर व्यापार और उद्योग के केंद्र होते थे। उनकी सीमाएं साफ होती थीं और नक्शे पर उन्हें आसानी से पहचाना जा सकता था। अब शहर केवल एक जगह नहीं बल्कि एक बड़े क्षेत्र की व्यवस्था बन चुके हैं।
विडंबना यह है कि जिस जगह को सरकार ने आधिकारिक रूप से शहर घोषित नहीं किया है वह वास्तविक जीवन में पूरी तरह शहरी हो सकती है। सबसे तेज शहरी विकास उन इलाकों में हो रहा है जहां हमारी सरकारी परिभाषाएं और प्रशासनिक व्यवस्था अभी पहुंची ही नहीं हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के लिए डब्ल्यूआरआई इंडिया के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, विकास मुख्य रूप से शहरों के आसपास के बाहरी इलाकों और एक लाख से कम आबादी वाले 7,428 कस्बों में हो रहा है। ये छोटे कस्बे देश के कुल शहरी क्षेत्रों का 94 फीसदी हैं और इनमें करीब 40 फीसदी शहरी आबादी रहती है।
इनमें से आधे से अधिक कस्बे कानूनी रूप से शहर भी नहीं हैं। वे आज भी गांवों की तरह चलाए जाते हैं। वहां न ठीक से भवन निर्माण के नियम हैं, न नगरपालिका का बजट और न ही संपत्ति कर की व्यवस्थित व्यवस्था है। विकास सरकार से पहले पहुंच जाता है। इसके बाद आम परिवार खुद ही बोरवेल खोदता है और उन सेवाओं के लिए अपनी जेब से भुगतान करता है, जिन्हें उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसी तय संस्था की नहीं है।
यहीं से हमें यह समझने की जरूरत है कि शहर केवल सड़कों, इमारतों और पुलों का समूह नहीं है बल्कि एक जीवंत व्यवस्था है। वह पानी, ऊर्जा, जमीन और लोगों को अपने भीतर लेता है और उन्हें उपयोगी रूप में वापस करता है। अगर वह ऐसा नहीं कर पाता, तो उसकी व्यवस्था कमजोर होने लगती है।
शहर की असली ताकत उसकी आबादी है। वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा के अनुसार, किसी भारतीय शहर की आबादी दोगुनी होने पर उसकी उत्पादकता लगभग 12 फीसदी बढ़ जाती है। लेकिन दूसरी ओर, भारत के शहरी कामगारों में 68 फीसदी अब भी असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। शहर उन्हें अपने काम के लिए तो इस्तेमाल करता है, लेकिन उनकी आजीविका और सुरक्षा को पर्याप्त सहारा नहीं देता।
इसलिए शहरी ढांचे को हमें ऐसे चक्रीय और प्रकृति-आधारित शहरी तंत्र में तब्दील करना होगा जिनमें संसाधनों का दोबारा उपयोग हो और प्रकृति को व्यवस्था का हिस्सा माना जाए। अभी तक हमने शहर को एक मशीन की तरह बनाया है जबकि उसे एक जीवित तंत्र की तरह विकसित करने की जरूरत है।
आर्थिक समीक्षा के अनुसार, भारत में हर दिन लगभग 112 अरब लीटर गंदा पानी तैयार होता है। इसमें से करीब दो-तिहाई घरेलू इस्तेमाल के बाद शहरों और कस्बों से निकलने वाला पानी है। लेकिन इसका केवल 28 फीसदी हिस्सा ही उपचारित होता है और उपचारित पानी का सिर्फ 8 फीसदी ही दोबारा इस्तेमाल किया जाता है।
कचरा प्रबंधन में कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार जरूर हुए हैं। अब 98 फीसदी वार्डों में घर-घर से कचरा उठाने की सुविधा पहुंच चुकी है। यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। लेकिन वर्ष 2024 में कचरा-मुक्त शहरों की रेटिंग में शामिल शहरों में से 884 को केवल एक स्टार मिला, जबकि सिर्फ 12 शहर सात स्टार की सर्वोच्च श्रेणी तक पहुंच पाए।
दूसरी ओर, जमीन का बड़ा हिस्सा अस्पष्ट मालिकाना हक और कम निर्माण घनत्व की वजह से पूरी तरह उपयोग में नहीं आ पाता। उदाहरण के लिए, मुंबई में जमीन के अनुपात में निर्माण की अनुमति लगभग 1.3 है जबकि न्यूयॉर्क में यह करीब 15 और सिंगापुर में 25 तक है।
हम शहरों के किनारों पर लगातार फैल रहे हैं, लेकिन शहर के भीतर मौजूद संसाधनों को फिर से उपयोग में लाने और उन्हें मजबूत करने पर बहुत कम ध्यान दे रहे हैं। यही कारण है कि हमारा शहरी तंत्र धीरे-धीरे पुराना और कमजोर होता जा रहा है, जबकि उसे लगातार विकसित और पुनर्जीवित होना चाहिए।
कोई जीवित चीज़ इसलिए जीवित रहती है क्योंकि उसका जो हिस्सा नुकसान को महसूस करता है, वह उस पर प्रतिक्रिया कर सकता है; लेकिन हमारे शहरों में अभी तक यह क्षमता विकसित नहीं हुई है। जमीन के इस्तेमाल, पुलिस व्यवस्था, जरूरी सेवाओं और नगर निकायों में कर्मचारियों की व्यवस्था जैसे महत्त्वपूर्ण फैसले राज्य स्तर पर तय होते हैं। बाकी कई जिम्मेदारियां विकास प्राधिकरणों के पास हैं जो अक्सर शहर में रहने वाले लोगों के प्रति सीधे जवाबदेह नहीं होते।
इसके साथ ही नगर निकायों के पास काम करने के लिए पर्याप्त धन भी नहीं है। पिछले एक दशक से नगर निकायों की अपनी आय देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के करीब एक फीसदी के आसपास ही अटकी हुई है। इसके मुकाबले ब्राजील में यह 7.4 फीसदी और दक्षिण अफ्रीका में 6 फीसदी है। आज, हमें यह याद रखना भी जरूरी है कि देश के हर पांच में से तीन शहरी स्थानीय निकायों में परिषद के चुनाव समय पर नहीं हो पाए हैं।
फिर भी भारत के सामने अपने शहरों को नए सिरे से विकसित करने का एक बड़ा अवसर है बशर्ते हम तेजी से काम करें। आर्थिक समीक्षा के अनुसार, केवल उपचारित पानी के दोबारा इस्तेमाल से 2047 तक लगभग 2.4 से 3.2 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक मूल्य पैदा किया जा सकता है। इससे एक लाख से अधिक रोजगार के मौके भी तैयार हो सकते हैं।
16वें वित्त आयोग ने शहरी स्थानीय सरकारों के लिए अनुदान में भी बड़ी बढ़ोतरी की है। यह राशि लगभग 1.55 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर करीब 3.56 लाख करोड़ रुपये कर दी गई है। इन अनुदानों को अब ऑडिट किए गए खातों से जोड़ा गया है। साथ ही करीब 10,000 करोड़ रुपये अलग रखे गए हैं जिसके तहत उन राज्यों को प्रति व्यक्ति लगभग 2,000 रुपये मिलेंगे जो शहरों के आसपास के गांवों को पास के नगर निकायों में शामिल करेंगे।
वर्ष 1947 में आजादी एक राष्ट्र के लिए हासिल की गई थी। अब चुनौती यह है कि आजादी का वही अर्थ हमारे शहरों में रहने वाले लोगों की जिंदगी में भी दिखाई दे। भारत का अधिकांश शहरी विकास अभी होना बाकी है। वर्ष 2047 तक देश को जितने शहरी बुनियादी ढांचे की जरूरत होगी उसका लगभग 70 फीसदी हिस्सा अभी बनाया जाना बाकी है। यही हमारी सबसे बड़ी चुनौती है, लेकिन यही सबसे बड़ा अवसर भी है।
(लेखक इंस्टीट्यूट फॉर कंपेटेटिवनेस के अध्यक्ष हैं। लेख में मीनाक्षी अजित का भी सहयोग है। ये उनके निजी विचार हैं)