भारत के बुनियादी ढांचे में निजी पूंजी आकर्षित और प्रेरित करने के प्रयास में दो बाध्यकारी अवरोध सामने आते हैं। पहला है नई परियोजनाओं की पर्याप्त पाइपलाइन या आपूर्ति का अभाव, जिनमें निजी पूंजी के लिए जोखिम नहीं हो ताकि निजी क्षेत्र उनमें आत्मविश्वास से निवेश कर सके। दूसरा है गैर बराबरी का क्षेत्र, जिसका झुकाव आम तौर पर निजी क्षेत्र के विरुद्ध माना जाता है। इन दोनों के ही कारण निजी पूंजी बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) वाली परियोजनाओं से दूर रही है। दोनों अवरोधों की विस्तार से पड़ताल करते हैं।
अगले पांच साल में तकरीबन 57 लाख करोड़ रुपये की निजी पूंजी की आवश्यकता है यानी हर साल लगभग 11.4 लाख करोड़ रुपये। मान लें कि कोई बुनियादी परियोजना बनकर तैयार होने और चालू होने में चार साल लगते हैं तो अगले आधे दशक के लिए हमारे पास 11.4 लाख करोड़ गुणा 4 यानी लगभग 45.6 लाख करोड़ रुपये की ‘शॉवेल रेडी’ यानी ऐसी परियोजनाएं होनी चाहिए, जिन पर काम तुरंत शुरू किया जा सके। क्या पाइपलाइन में इतनी शॉवेल-रेडी परियोजनाएं हैं? बिल्कुल नहीं! इसलिए अच्छा होगा कि तीन संस्थाओं – वित्त मंत्रालय, नीति आयोग और सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय – में से कोई एक इस आंकड़े पर नजर रखे और हर छमाही इसे प्रकाशित करे।
पर्याप्त पाइपलाइन नहीं होगी तो निजी पूंजी कहां जाएगी? बुनियादी ढांचा क्षेत्र अनूठा है क्योंकि इसमें दीर्घकालिक, विनियमित, परिसंपत्ति-प्रधान सार्वजनिक उपक्रम भरे पड़े हैं, जिनका अक्सर किसी एक भौगोलिक क्षेत्र में एकाधिकार होता है। इसलिए निजी क्षेत्र के लिए ऐसी परियोजनाएं स्वयं बनाना लगभग असंभव है और अनुचित भी। निजी क्षेत्र केवल तब आता है, जब वह राज्य द्वारा तैयार बोली जीतता है। ऐसे में भारत में यह सुनिश्चित करने की इकलौती जिम्मेदारी किसकी है कि बोली लगाने योग्य और भरोसेमंद परियोजनाएं लगातार आती रहें? यह अहम मुद्दा है, जिसका जवाब आना चाहिए।
अब गैर बराबरी के क्षेत्र की समस्या पर ध्यान देते हैं। इस स्थिति को शायद इन उपायों की मदद से सुधारा जा सकता है।
- पहला उपाय है ऐसी प्रभावशाली संस्था की स्थापना करना, जो पीपीपी पर ध्यान दे और उन्हें वैधता तथा स्थायित्व प्रदान करे। अरुण जेटली ने जुलाई 2014 के अपने पहले बजट भाषण में ऐसी संस्था की घोषणा की थी। इसे ‘3पी इंडिया’ कहा गया था और इसे स्थापित करने के लिए 500 करोड़ रुपये का भारीभरकम बजट भी रखा गया था। दुर्भाग्यवश इस पर कभी अमल नहीं हो सका। ‘3पी इंडिया’ कुछ जरूरी काम कर सकती थी: एक तो वह सुनिश्चित कर सकती थी कि जिन परियोजनाओं में निजी पूंजी शामिल हो सकती है, उनमें सार्वजनिक धन नहीं लगाया जाए। दूसरा, वह पीपीपी प्रारूप को जांचकर सुनिश्चित कर सकती थी कि सार्वजनिक और निजी पक्षों के बीच जोखिम निष्पक्ष और तार्किक तरीके से बांटा जाए।
- दोबारा बातचीत को स्वीकृत प्रक्रिया मान लिया जाए। पीपीपी लंबे समय तक चले तो अप्रत्याशित जोखिम सामने आ सकते हैं और करार की शर्तों पर दोबारा बातचीत करनी पड़ सकती है। विश्व बैंक के 2004 के एक अध्ययन में लैटिन अमेरिका में 1985 से 2000 के बीच चली 1,000 से अधिक पीपीपी परियोजनाओं का विश्लेषण किया गया। पता चला कि 41.5 प्रतिशत परियोजनाओं की शर्तों पर दोबारा बातचीत की गई। इनमें 85 प्रतिशत पर तो चार साल के भीतर ही दोबारा बातचीत करनी पड़ी और 61 प्रतिशत में परियोजना विकसित कर रही निजी कंपनी ने बातचीत शुरू की।
- वास्तव में स्वतंत्र क्षेत्रीय नियामकों को विधिक मान्यता दी जाए। नीति आयोग को 2015 के बजट के बाद एक नियामकीय सुधार विधेयक तैयार करने का कार्य सौंपा गया था, जो अब तक लागू नहीं हुआ है। बुनियादी ढांचे की पाइपलाइन में 40 प्रतिशत परियोजनाएं तो सड़क और रेलवे की ही होती हैं। फिर भी न तो इनके पास और न ही अन्य प्रमुख बुनियादी ढांचा क्षेत्रों (जैसे जल) के पास कोई स्वतंत्र नियामक है। निवेशक लंबे समय से इस सुधार की मांग कर रहे हैं और इसे सबसे कम तवज्जो दी गई है।
- त्वरित विवाद समाधान तंत्र तैयार किया जाना चाहिए। इस विषय पर बहुत कुछ लिखा और सुझाया जा चुका है। अब समय आ गया है कि इस पर ठोस कार्रवाई की जाए।
- सुनिश्चित किया जाए कि नेशनल बैंक फॉर फाइनैंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड डेवलपमेंट (एनएबीएफआईडी) के पास एक मुख्य टीम हो, जो इसके नाम में शामिल ‘डी’ यानी विकास पर अमल कर सके। इस टीम में केंद्र और राज्यों की ओर से व्यवहार्य यानी चलने योग्य बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की परिकल्पना करने और प्रारूप तैयार करने की क्षमता होनी चाहिए ताकि शॉवेल रेडी परियोजनाओं की पाइपलाइन लगातार बढ़ती रहे।
- स्विस चैलेंज पद्धति को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिसमें कोई निजी कारोबारी परियोजना का प्रस्ताव रख सकता है और प्रस्ताव रखने वाले को (निर्धारित शर्तों के तहत) परियोजना के लिए अपनी बोली से ऊंची बोली की बराबरी करने का मौका मिलता है। इस पद्धति को सर्वोच्च न्यायालय ने भी मान्यता दी है।
- प्लग-एंड-प्ले प्रारूप का उपयोग करें, जिसमें संप्रभु जोखिम दूर करने का जिम्मा सरकार का हो। इसके लिए शुरुआत में सरकार के पूर्ण स्वामित्व वाली विशेष उद्देश्य की कंपनी (एसपीवी) बनाई जाती है, जो भूमि अधिग्रहण करती है और सभी मंजूरी लेती है। इसके बाद इस जोखिम से मुक्त शेल कंपनी सबसे ऊंची बोली लगाने वाले निजी पक्ष को बेच दी जाती है।
इनमें से ज्यादातर सुझाव बार-बार दिए जाते रहे हैं और विजय केलकर समिति की 2015 की रिपोर्ट ‘रीविजिटिंग ऐंड रीवाइटलाइजिंग दि पीपीपी मॉडल ऑफ इन्फ्रास्ट्रक्चर’ ने पीपीपी ढांचों में बड़े पैमाने पर सुधार के लिए उत्कृष्ट तर्क दिए हैं। अफसोस है कि एक दशक बाद भी यह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में पड़ी है, जबकि निजी पूंजी लाने की मांग तेज होती जा रही है। पीपीपी को सुधारें। संस्थागत सुधारों के घोड़े को निजी पूंजी की गाड़ी के आगे जोत दें और फिर देखें कि बुनियादी ढांचा निवेश कैसे एक बार फिर चमक उठता है।
(लेखक बुनियादी ढांचा विशेषज्ञ हैं। वह द इन्फ्राविजन फाउंडेशन के संस्थापक और प्रबंध न्यासी भी हैं। लेख में मुटुम चाओबिसाना का भी योगदान है। इसमें लेखक के निजी विचार हैं)
First Published - August 26, 2026 | 10:09 PM IST
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