माल एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था को एक जटिल ढांचे के साथ पेश किया गया था जिसमें पांच दरों वाली स्लैब और समय-समय पर दरों को युक्तिसंगत बनाने की प्रतिबद्धता शामिल थी। दरों को युक्तिसंगत बनाने के कई प्रयास किए गए हैं जिनमें सबसे ताजा सितंबर 2025 में हुआ बदलाव है।
इन समायोजनों को अक्सर ग्राहकों को प्रसन्न करने और प्रणाली को सरल बनाने के तरीके के रूप में देखा गया है। ग्राहकों के लिए यह प्रसन्नता अक्सर मांग को प्रोत्साहित करने के रूप में अपेक्षित होती है। वस्तुओं के एक समूह पर कर दरों में कमी से इन वस्तुओं की मांग में वृद्धि होने की उम्मीद की जाती है। वृद्धि की सीमा मांग की मूल्य लोच और इस बात पर निर्भर करती है कि कम कर का लाभ किस हद तक उपभोक्ता तक कम कीमतों के रूप में पहुंचता है।
हालांकि, भारतीय संदर्भ में कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि यह अधूरे ढंग से पास थ्रू होता है। यहां पास थ्रू से तात्पर्य उपभोक्ताओं तक उसके प्रसार या पहुंच से है। राष्ट्रीय लोक वित्त और नीति संस्थान (एनआईपीएफपी) के एक कार्यपत्र (वर्किंग पेपर 444, 2025) में सच्चिदानंद मुखर्जी और शिवानी बडोला ने बताया है कि विभिन्न वस्तुओं की श्रेणियों में प्रसारण अलग-अलग होता है। उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं के लिए स्पष्ट पास-थ्रू और खाद्य पदार्थों, घरेलू उपभोग वस्तुओं तथा व्यक्तिगत देखभाल के लिए सीमित पास-थ्रू। इसका असर कर कटौती से उत्पन्न मांग प्रोत्साहन की सीमा पर पड़ेगा।
कर कटौती का अंतिम वस्तुओं और सेवाओं की मांग पर प्रभाव देखने का एक वैकल्पिक तरीका सीमांत और औसत उपभोग प्रवृत्तियों के माध्यम से हो सकता है। मूल्य परिवर्तन और लोच आमतौर पर करों में बदलाव के सीमांत प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यानी विचाराधीन वस्तु और उसके पूरक तथा विकल्पों पर मूल्य परिवर्तनों का प्रभाव। एक प्रश्न यह है कि क्या कर दरों में बदलाव औसत या सीमांत उपभोग प्रवृत्ति में बदलाव में परिवर्तित होगा। क्या कर दरों में कमी से समग्र मांग में वृद्धि होगी जिससे औसत उपभोग प्रवृत्ति अधिक हो जाएगी?
यदि ऐसा होता है, तो अर्थव्यवस्था के लिए गुणक अधिक होगा और इसका शुद्ध प्रभाव अधिक आय और उपभोग के रूप में सामने आएगा। दूसरी ओर, यदि उपभोग प्रवृत्तियां अपरिवर्तित रहती हैं, तो कर दरों में बदलाव उपभोग की संरचना में बदलाव लाएगा, न कि उसके समग्र स्तर में। यहां मांग प्रोत्साहन केवल कर बचत से उत्पन्न व्यय तक सीमित रहेगा।
भारत में इन मामलों में से कौन-सा परिदृश्य सामने आ रहा है, इसे समझने के लिए हम मासिक कुल आय और उपभोग के आंकड़ों को देखते हैं, जो सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी द्वारा किए गए कंज्यूमर पिरामिड्स सर्वे से मिले हैं। यह मासिक आंकड़ों का एकमात्र स्रोत है। इसमें उपभोग के दो अलग-अलग समग्र आंकड़े पर विचार किया गया है।
कुल उपभोग और किराया, ईंधन व बिजली तथा ईएमआई को छोड़कर उपभोग। पहले को कुल उपभोग कहा गया है, जबकि दूसरे को जीएसटी के अंतर्गत कर आधार के अधिक निकट लाने के लिए कर योग्य उपभोग कहा गया है। आय और उपभोग का अनुपात औसत उपभोग प्रवृत्ति को दर्शाता है। हम औसत उपभोग प्रवृत्ति पर विचार करते हैं क्योंकि यह सीमांत उपभोग प्रवृत्ति की तुलना में अधिक स्थिर होती है।
डेटा में मौसमी प्रभाव को अलग करने के लिए, चालू वर्ष की श्रृंखला की तुलना अन्य वर्षों के समान अनुपात से की जाती है।ग्राफ कुछ दिलचस्प प्रवृत्तियां प्रस्तुत करते हैं। कुल उपभोग के लिए औसत उपभोग प्रवृत्ति (एपीसी) पिछले दो वर्षों में 2022-24 की तुलना में मध्यम रूप से कम रही है। वर्ष 2025-26 में एपीसी नवंबर तक 2024-25 की प्रवृत्तियों से स्पष्ट रूप से अलग नहीं है।
ध्यान देने योग्य है कि कर दरों में कटौती सितंबर 2025 से लागू की गई थी। दिसंबर और जनवरी में उपभोग में वार्षिक गिरावट, हालांकि, 2025-26 में कुछ हद तक कम होती दिखती है। दिसंबर-फरवरी अवधि के दौरान 2025-26 में एपीसी पहले के वर्षों की तुलना में अधिक स्थिर हो जाती है। कर योग्य उपभोग की ओर देखते हुए, दिसंबर-फरवरी के दौरान देखी गई प्रवृत्तियां स्पष्ट हैं। दूसरे शब्दों में, ऐसा लगता है कि कर कटौती कुछ महीनों की देरी के साथ एपीसी में वृद्धि से जुड़ी हो सकती है।
यह कहा जा सकता है कि कर दर में कमी की वजह से मांग में वृद्धि से जनसंख्या के कुछ वर्गों के लिए आय में वृद्धि होनी चाहिए, जिससे प्रोत्साहन के द्वितीय-चरणीय प्रभाव उत्पन्न होंगे। हालांकि, कर कटौती के तुरंत बाद 2025-26 में आय वृद्धि के अधिक होने का कोई प्रमाण नहीं है। 2024-25 की तुलना में 2025-26 में वृद्धि केवल जनवरी 2026 से अधिक दिखाई देती है।
यहां उपलब्ध सीमित साक्ष्यों से यह प्रतीत होता है कि कर दर में बदलाव एपीसी में तुरंत वृद्धि नहीं करता। उपभोक्ता अपनी आय से उपभोग व्यय के लिए आवंटन नहीं बढ़ा रहे हैं। न ही कर कटौती के लगभग चार महीने बाद तक आय वृद्धि में मौसमी प्रभाव से अलग कोई प्रमाण मिलता है। यह वह अवधि भी है जब अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति में कमी के जवाब में रीपो दर को लगातार कम किया जा रहा था। जून 2025 और दिसंबर 2025 में दो बार 25 आधार अंकों की कटौती की गई। इसी अवधि में नकद आरक्षित अनुपात को क्रमिक रूप से 4 फीसदी से घटाकर 3 फीसदी किया गया। स्पष्ट है कि अन्य प्रोत्साहन भी काम कर रहे थे।
करों के प्रभाव को यथासंभव अलग करने की आवश्यकता है। इस चर्चा से सुझाए गए सहसंबंध यह संकेत देते हैं कि कर कटौती से उत्पन्न मांग प्रोत्साहन व्यापक होने के बजाय अधिक बारीक हो सकते हैं।
(दोनों लेखिकाएं राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान से संबद्ध हैं। ये उनके निजी विचार हैं)