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बढ़ता संक्रमण

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 2:31 AM IST

भारत महामारी के खतरे से उबर नहीं सका है और तीसरी बल्कि चौथी लहर का खतरा भी हर किसी के ऊपर मंडरा रहा है। तीसरी लहर का प्रसार और उसकी गहनता न केवल टीकाकरण की दर पर निर्भर करेगी बल्कि इस बात पर भी कि टीके की पहली और दूसरी खुराक कितने लोगों को लग चुकी है। ऐसे में यह दुखद है कि सरकार ने महामारी की लहरों के प्रसार को लेकर विश्वसनीय आंकड़े जुटाने पर पर्याप्त मेहनत नहीं की और न ही उसने मौतों के आंकड़े जुटाए। हमारे पास केवल भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की सीरोसर्वे शृंखला ही उपलब्ध है जो देश में कोविड-19 की ऐंटीबॉडी के नमूने दर्शाती है। सर्वे के चौथे और सबसे अद्यतन दौर के आंकड़े इस सप्ताह जारी किए गए। आईसीएमआर ने देश के 21 राज्यों के 70 जिलों के 700 गांवों और वार्डों में 29,000 लोगों पर सर्वेक्षण किया। इससे पहले संपन्न तीन सीरोसर्वे में लोगों में ऐंटीबॉडी में तेज इजाफा देखने को मिला था। गत वर्ष मई और जून में जहां 0.73 फीसदी लोगों में ऐंटीबॉडी पाई गई थीं, वहीं अगस्त और सितंबर 2020 में 7.1 फीसदी लोगों में तथा दिसंबर 2020 और जनवरी 2021 में 24.1 फीसदी लोगों में ऐंटीबॉडी बन चुकी थीं।
चौथे दौर का सर्वेक्षण जून और जुलाई में किया गया और पाया गया कि दूसरी लहर के बाद 67.6 फीसदी लोगों में ऐंटीबॉडी बन चुकी हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रतिभागियों में से दो तिहाई में कोविड ऐंटीबॉडी थीं यानी उन्हें या तो कोविड हो चुका था या फिर टीका लग चुका था। एक तिहाई लोग अभी भी बिना ऐंटीबॉडी के हैं। इससे यही संकेत मिलता है कि तीसरी लहर बड़ी तादाद में लोगों को संक्रमित कर सकती है। ऐसे में यह अपेक्षा करना बुद्धिमानी नहीं होगी कि हम सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता हासिल करने के करीब हैं। जबकि इस बीच वायरस का डेल्टा स्वरूप तेजी से बढ़ा है जिसे ज्यादा संक्रामक माना जा रहा है। ऐसे में जब तक लगभग सभी लोगों का टीकाकरण नहीं हो जाता, सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता हासिल करना असंभव ही है। सरकार को इन आंकड़ों का सावधानी से विश्लेषण करना चाहिए। खासतौर पर यदि वह इसे भौगोलिक स्तर पर विभाजित कर सकती है तथा अन्य जनांकीय संकेतकों का इस्तेमाल कर सकती है तो ऐसा करना चाहिए। मसलन किन राज्यों में ऐंटीबॉडी का स्तर सर्वाधिक है? कहां संक्रमण होने पर ज्यादा मौतें हो सकती हैं? परंतु सरकार यह मानकर नहीं चल सकती है कि ऐंटीबॉडी के इस स्तर वाले सभी लोग समान रूप से सुरक्षित हैं।
कोविड-19 के मूल स्वरूप के साथ-साथ डेल्टा स्वरूप का संक्रमण भी उन लोगों में देखा गया है जिनके शरीर में ऐंटीबॉडी मौजूद हैं। दोबारा संक्रमण संभव है। कई मामलों में तो टीकाकरण के बाद भी लोगों में लक्षण सहित कोरोना देखा गया है। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि टीके गंभीर बीमारी रोकने में सक्षम हैं। महामारी के भविष्य का सटीक आकलन करने के लिए सरकार को इसके अतीत को समझना होगा। सीरोसर्वे इसका एक जरिया भर हैं। एक अधिक प्रभावी उपाय यह हो सकता है कि पिछली लहरों में मरने वालों का समुचित अनुमान लगाया जाए। यहां सरकार के प्रयास कमजोर हैं। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन समेत अर्थशास्त्रियों के एक समूह ने हाल ही में तीन तरीकों का इस्तेमाल कर कोविड-19 से हुई मौतों का आकलन लगाया है। ये अनुमान जो बताते हैं कि जून में संक्रमण की दर 65 फीसदी थी और जो सीरोसर्वे के आंकड़ों के अनुरूप ही है, उनके मुताबिक महामारी से अब तक 34 से 49 लाख भारतीयों की मौत हो चुकी है। यह आंकड़ा आधिकारिक तादाद से बहुत अधिक है। सरकार की ओर से ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि ऑक्सीजन की कमी से एक भी मौत नहीं हुई। ऐसे दावों के बल पर भविष्य की लहर नहीं रोकी जा सकती। सरकार को आंकड़ों का स्तर सुधारना होगा ताकि महामारी को लेकर बेहतर नीति बन सके।

First Published : July 21, 2021 | 11:43 PM IST