‘विगत चार कारोबारी सत्रों में बैंकों ने विदेशी मुद्रा आर्बिट्राज दांव की 75 फीसदी पोजीशन समेट ली है। बैंकरों का अनुमान है कि रुपये के मुकाबले लगाए गए 40 अरब डॉलर के दांव में से, लगभग 30 अरब डॉलर की खुली पोजीशन को बंद कर दिया गया है। – 7 अप्रैल’
‘कुल मिलाकर लगभग 40 अरब डॉलर की पोजीशन में से गुरुवार के कारोबार के अंत तक केवल लगभग 4 से 7 अरब डॉलर के दांव शेष रहने का अनुमान है। – 9 अप्रैल’
रिजर्व बैंक द्वारा हाल में रुपये की गिरावट थामने के उपायों को लेकर मीडिया ने कुछ इस तरह की प्रतिक्रिया दी। इन कदमों का परीक्षण करने के पहले आर्बिट्राज सौदों को समझना सही रहेगा। रिजर्व बैंक सभी बैंकों को नॉन डिलिवरेबल फॉरवर्ड यानी एनडीएफ बाजारों में भागीदारी की अनुमति देता रहा है जहां ऑफशोर पोजीशन को ऑनशोर पोजीशन के साथ समायोजित किया जाता था ताकि शुद्ध जोखिम का निर्धारण किया जा सके।
जब रुपये के कमजोर होने की उम्मीद होती है, तो एनडीएफ दरें आमतौर पर ऑनशोर दरों से अधिक होती हैं। बैंक इससे लाभ उठाते हैं। एनडीएफ बाजारों की ऑफशोर मांग को पूरा करने के लिए बैंक नॉन डिलिवरेबल फॉरवर्ड की बिक्री करते हैं। जब डॉलर की मांग बढ़ती है तो आर्बिट्राज का आकार तेजी से बढ़ता है। इस वजह से कुल आर्बिट्राज पोजीशन करीब 40 अरब डॉलर पहुंच गई।
इस लिहाज से इस कारोबार में सटोरिया गतिविधि की आशंका नकारी नहीं जा सकती है। रिजर्व बैंक के हालिया उपायों ने भी ऐसी गतिविधियों पर अंकुश लगाया है। 27 मार्च को रिजर्व बैंक ने ऑनशोर रुपया बाजार में बैंकों की नेट ओपन पोजीशन यानी एनओपी को 10 करोड़ डॉलर तक सीमित कर दिया और बाजार के हालात का हवाला देकर 10 अप्रैल से ऑफशोर एनडीएफ पोजीशन के साथ समायोजित की इजाजत खत्म कर दी।
पहले, बैंक दोनों पोजीशन को समायोजित कर सकते थे, और संयुक्त पोजीशन 10 करोड़ डॉलर तक सीमित थी। एनओपी बैंक की विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों और देनदारियों के बीच का अंतर होता है, जो मुद्रा उतार-चढ़ाव या विनिमय दर जोखिम के प्रति उसकी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
रिजर्व बैंक ने ऐसा पहली बार नहीं किया है। दिसंबर 2011 में इसने रुपये के कमजोर होने पर एनओपी सीमा को कुछ बैंकों के लिए 75 फीसदी तक सीमित कर दिया था जबकि बड़े बैंकों के लिए 50 फीसदी कर दिया गया था।
साल 2013 से बैंक बोर्डों को इजाजत दी गई कि वे खुद एनओपी सीमा तय करें। हालांकि रिजर्व बैंक ने 10 करोड़ डॉलर की एक उदार सीमा बरकरार रखी ताकि उतार-चढ़ाव के समय लगाम उसके हाथ में रहे।
इस वर्ष जनवरी में रिजर्व बैंक ने बैंकों द्वारा अपनी विदेशी मुद्रा जोखिम की गणना करने और संभावित जोखिम से बचने के लिए अलग रखे जाने वाले पूंजी में बदलाव का प्रस्ताव रखा। इसका उद्देश्य विनियमित संस्थाओं में वैश्विक मानकों के अनुरूप उन्हें संरेखित करना है। रिजर्व बैंक ने इन नियमों पर प्रतिक्रिया मांगी है, जिन्हें अप्रैल 2027 से लागू किए जाने की उम्मीद है।
27 मार्च के निर्देश का तत्काल प्रभाव सीमित रहा, क्योंकि आर्बिट्राज पोजीशन चला रहे बैंकों ने संभवतः कुछ कंपनियों और संबंधित विदेशी संस्थाओं के साथ सौदों के माध्यम से जोखिम को स्थानांतरित कर दिया। इसलिए, 1 अप्रैल को रिजर्व बैंक ने बैंकों को निवासियों और गैर-निवासियों दोनों को एनडीएफ अनुबंध देने से रोक दिया।
अधिकृत डीलरों (वे बैंक जिन्हें विदेशी मुद्रा खरीदने और बेचने की अनुमति है) को गैर-डिलिवरेबल रुपया डेरिवेटिव्स की पेशकश करने से प्रतिबंधित कर दिया गया, हालांकि वास्तविक हेजिंग के लिए डिलिवरेबल अनुबंधों की अनुमति दी गई। बैंकों को यह सुनिश्चित करना आवश्यक था कि ग्राहक ऑफशोर में ऑफसेटिंग पोजीशन न रखें।
भारतीय बैंकों को पहली बार जून 2020 में एनडीएफ बाजार में प्रवेश की अनुमति दी गई थी ताकि ऑनशोर और ऑफशोर मुद्रा बाजारों को बेहतर ढंग से एकीकृत किया जा सके, मूल्य खोज में सुधार हो और अस्थिरता कम हो। जून 2023 में केंद्रीय बैंक ने इस पहुंच का विस्तार किया और बैंकों को गैर-खुदरा निवासियों को हेजिंग के लिए एनडीएफ अनुबंध देने की अनुमति दी।
उसके बाद से केंद्रीय बैंक ने समय-समय पर रुपये को लेकर हस्तक्षेप किया है। उदाहरण के लिए जून 2022 में उसने बैंकों से कहा कि अतिरिक्त एनडीएफ पोजीशन निर्मित न करें क्योंकि इसके चलते उसे रुपये के बचाव के लिए अधिक आरक्षित नकदी व्यय करनी पड़ रही थी। अगस्त 2023 में उसने एक बार फिर अनौपचारिक रूप से डॉलर-रुपये सौदों को रुपये में गिरावट रोकने के उपाय के रूप में अपनाया। उसने अप्रैल 2024 में इन प्रतिबंधों को कम किया।
ताजा उपाय रुपये में तेज गिरावट को थामने के लिए किए गए। रुपया मार्च में पश्चिम एशिया में जंग छिड़ने के बाद डॉलर के मुकाबले 4 फीसदी गिरा। वित्त वर्ष 26 में रुपया करीब 10 फीसदी गिर चुका है।
रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर टी रवि शंकर ने पेरिस में 11 मार्च को एक सम्मेलन में कहा कि ऑफशोर और ऑनशोर बाजार के आर्बिट्राज के कारण बाजार से डॉलर की निकासी हो रही है क्योंकि रुपया कमजोर होने पर बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा बाहर जाती है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक रवि शंकर ने इस बात को लेकर नाराजगी जाहिर की कि बैंक अपने आर्बिट्राज सौदे कॉरपोरेट ग्राहकों को स्थानांतरित कर रहे हैं जबकि कंपनियों को ऐसे लेनदेन की इजाजत नहीं।
केंद्रीय बैंक का कहना है कि नए मानदंड वास्तविक हेजिंग गतिविधि को प्रभावित नहीं करेंगे। इसके बावजूद, कड़े प्रतिबंध निश्चित रूप से हेजिंग लागत को बढ़ा देंगे। इससे इक्विटी और बॉन्ड दोनों में विदेशी पूंजी प्रवाह हतोत्साहित हो सकता है। अक्टूबर 2024 से विदेशी निवेशकों ने कम से कम 45 अरब डॉलर की निकासी की है। भारतीय इक्विटी में उनकी हिस्सेदारी वर्तमान में 15 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर है।
अप्रैल के मौद्रिक नीति वक्तव्य में गवर्नर संजय मल्होत्रा ने एनडीडीसी (नॉन-डिलिवरेबल डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट) बाजार और बैंकों की एनओपी पर हालिया प्रतिबंधों को अस्थायी बताया। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि ये उपाय विशेष, अत्यधिक मुद्रा अस्थिरता से निपटने के लिए हैं और ‘हमेशा के लिए लागू नहीं रहेंगे।’
इन कदमों को कठिन समय में कठोर उपायों के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन जब रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण रिजर्व बैंक के एजेंडे में शीर्ष पर है, तब वह इन्हें लंबे समय तक जारी नहीं रख सकता। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 700.9 अरब डॉलर है, जो उच्चतम स्तर से कम है, लेकिन पर्याप्त है।
रिजर्व बैंक की फॉरवर्ड बुक फरवरी तक 77.7 अरब डॉलर पर थी, जो मार्च 2025 के बाद से सबसे ऊंचा स्तर है, और माना जाता है कि मार्च में यह और बढ़ी। फॉरवर्ड बुक उन शुद्ध बकाया अनुबंधों को बताती है जो रिजर्व बैंक ने भविष्य की तारीखों पर बाय-सेल स्वैप या डॉलर बिक्री के माध्यम से किए हैं। ‘ऋणात्मक’ या ‘शॉर्ट’ फॉरवर्ड बुक का मतलब है कि केंद्रीय बैंक ने रुपये को स्थिर करने के लिए डॉलर अग्रिम रूप से बेचे हैं, बिना विदेशी मुद्रा भंडार को तुरंत घटाए। लेकिन यह एक अलग कहानी है।