facebookmetapixel
Advertisement
रुपये में पांच दिन से जारी भारी गिरावट थमी, डॉलर के मुकाबले रिकवरी में क्रूड और RBI का बड़ा हाथनीट पर्चा लीक को PM मोदी ने बताया ‘घोर पाप’, राहुल गांधी का प्रधानमंत्री आवास के सामने प्रदर्शनखाड़ी युद्ध के तनाव से गहराया विमानन संकट, पायलट एसोसिएशन ने UAE की उड़ानें रोकने की उठाई मांगबांकीपुर विधानसभा उपचुनाव से प्रशांत किशोर की पहली अग्निपरीक्षा, जन सुराज पार्टी के लिए दांव पर लगी साखभारत के उर्वरक निर्यात को मिली रफ्तार, 3 साल में निर्यात 52% बढ़ाजुलाई में फिर बढ़ा विदेशी निवेशकों का भरोसा, FPI ने चुनिंदा सेक्टरों में की ताबड़तोड़ खरीदारीपीएलआई योजना ने बदली विनिर्माण की तस्वीर, ₹2.4 लाख करोड़ का आया निवेश; 14.5 लाख को मिली नौकरियांसरकार ने कहा: बिना एथेनॉल वाले पेट्रोल पर वापस जाने का कोई प्रस्ताव नहीं, पंपों पर जारी रहेगी सप्लाईभारतीय रिजर्व बैंक ने स्वैप योजना से जुटाए 21 अरब डॉलर, शुरुआती हफ्तों में ही दर्ज हुई रिकॉर्ड आवकरिकॉर्ड वाहन बिक्री से बजाज ऑटो का मुनाफा 46% बढ़ा, राजस्व 65% उछला

Editorial: विक्रम-1 की ऐतिहासिक उड़ान ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में खोले निजी भागीदारी के दरवाजे 

Advertisement

यह निजी क्षेत्र का डिजाइन किया हुआ और बनाया गया पहला भारतीय रॉकेट है जिसने पृथ्वी की कक्षा में पहुंचकर उपग्रहों को स्थापित किया

Last Updated- July 20, 2026 | 10:36 PM IST
Vikram-1 Rocket
स्काईरूट एरोस्पेस के विक्रम-1 रॉकेट की सफलता भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में मील का एक पत्थर है।

स्काईरूट एरोस्पेस के विक्रम-1 रॉकेट की सफलता भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में मील का एक पत्थर है। यह निजी क्षेत्र का डिजाइन किया हुआ और बनाया गया पहला भारतीय रॉकेट है जिसने पृथ्वी की कक्षा में पहुंचकर उपग्रहों को स्थापित किया। तकनीकी खराबी के कारण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के सतीश धवन स्पेस सेंटर से इसके प्रक्षेपण में 35 मिनट की देर हुई। लेकिन धरती छोड़ने के बाद विक्रम-1 ने एकदम सही ढंग से काम किया। उसने तय उड़ान पथ का अनुसरण किया और उसके इंजन ने पहले से तय चार चरणों में फायरिंग करके 15 मिनट की उड़ान के बाद उसे 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित कर दिया।

भारत इसके साथ ही अमेरिका, चीन और न्यूजीलैंड के बाद चौथा ऐसा देश बन गया जिसने निजी क्षेत्र की रॉकेट क्षमता विकसित की है। इस अभियान को ‘मिशन आगमन’ का नाम दिया गया था और इसने सभी पेलोड (भेजे गए उपग्रहों) को कक्षा में स्थापित कर दिया। यह दो क्यूबसैट अपने साथ ले गया था। एक है स्काईरूट का स्कोप उपग्रह जो भविष्य के अभियानों के लिए आंकड़े एकत्रित करेगा और दूसरा है सोलारस एस 3 नैनोसैटेलाइट पाथ फाइंडर जिसे एक अन्य भारतीय स्टार्टअप ग्रह स्पेस ने तैयार किया है।

स्काईरूट विक्रम श्रृंखला के जरिये बाजार में मौजूद कमी को दूर करने की कोशिश कर रहा है। विक्रम-1 को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि वह 350 किलोग्राम तक का पेलोड पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित कर सके। इसके उन्नत संस्करण विक्रम 1-यू में स्ट्रैप-ऑन बूस्टर होंगे। वह इस पेलोड क्षमता को बढ़ाकर 550 किलोग्राम कर देगा। ये पेलोड क्षमता छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए आदर्श है क्योंकि इस क्षेत्र में कुशल प्रक्षेपण यान की कमी है। भारी वजन उठाने वाले रॉकेट का उपयोग छोटे उपग्रहों के लिए सही नहीं होता है। यदि पर्याप्त पेलोड न हो तो रॉकेट का उपयोग अधूरा रह जाता है। यदि पर्याप्त पेलोड का इंतजार करना पड़े तो उपग्रहों के प्रक्षेपण में देरी होती है। विक्रम-1 इस कमी को पूरा कर सकता है।

स्काईरूट ने मई में 6 करोड़ डॉलर की राशि जुटाई जिसे उसने विक्रम श्रृंखला के डिजाइन और उत्पादन में निवेश किया। चार-चरण वाला सात मंजिल ऊंचा विक्रम-1 रॉकेट तीन ठोस ईंधन वाले चरणों से बना है जो अलग हो जाते हैं और चौथा तरल ईंधन वाला चरण होता है जो उपग्रह को वांछित कक्षा में सटीक रूप से स्थापित करने का मुश्किल काम करता है।

किसी नए रॉकेट की पहली उड़ान का पूरी तरह सफल होना असाधारण है। स्काईरूट डेटा का अध्ययन करेगा और पूरी तरह व्यावसायिक होने से पहले कम-से-कम दो और परीक्षण उड़ानें करेगा। स्काईरूट उन सैकड़ों भारतीय स्टार्टअप में से एक है जो नीति में बदलाव के बाद निजी उद्यम को अनुमति मिलने से एरोस्पेस क्षेत्र में आए हैं। यह 2018 में हैदराबाद में स्थापित हुआ था और इसके सह-संस्थापक पवन कुमार चांदना और नागा भारत डाका दोनों पहले इसरो में रह चुके हैं। 

स्काईरूट के संस्थापकों का इसरो से जुड़ा होना असामान्य नहीं है। भारत की अंतरिक्ष एजेंसी से अब तक 100 से अधिक इंजीनियर और वैज्ञानिक बाहर निकल चुके हैं। अधिकांश स्टार्टअप में चले गए हैं। छोड़कर जाने वालों की संख्या इतनी अधिक है कि एजेंसी को अपनी निर्गम नीति में बदलाव करना पड़ा ताकि अहम परियोजनाओं पर कर्मियों को बनाए रखा जा सके। इस पर बहस चल रही है कि निजी क्षेत्र अब अपनी क्षमताएं एजेंसी की कीमत पर बना रहा है।

हालांकि स्काईरूट का प्रक्षेपण इसरो की सुविधा पर हुआ और कंपनी को प्रधानमंत्री द्वारा बधाई दी गई लेकिन अब अंतरिक्ष एजेंसी और निजी क्षेत्र के बीच तनाव स्पष्ट और बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। तुलना के लिए अमेरिकी एजेंसी नासा अपने उपकरणों के लिए निजी क्षेत्र को निविदा देती है जबकि वह विनिर्देश तय करती है और कुछ डिजाइन खुद करती है। स्पेसएक्स और अन्य निजी कंपनियां जैसे ब्लू ओरिजिन नासा के विनिर्देशों के अनुसार रॉकेट बनाती हैं। नासा के पास हजारों पेटेंट हैं, जिन्हें वह लाइसेंस पर देती है। भारतीय नीति निर्माताओं को भी इसी तरह के रास्ते खोजने होंगे ताकि इसरो को नुकसान न हो और निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र भी विकसित हो सके।

Advertisement
First Published - July 20, 2026 | 10:36 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement