भारत क्रिटिकल मिनरल्स यानी महत्त्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में उत्पादन क्षमता विकसित करने की कोशिश में है और निजी खननकर्ता भी संसाधन समृद्ध अफ्रीका में ग्रेफाइट, कोबाल्ट, लीथियम, टिन, टैंटलम और टंगस्टन के खनन उपक्रमों, स्थानीय साझेदारियों और संयुक्त उपक्रमों की मदद से अपनी दखल मजबूत कर रहे हैं। ये प्रयास भारत की महत्त्वपूर्ण खनिज रणनीति में एक कम उपयोग किए गए माध्यम की ओर संकेत करते हैं। वह है निजी क्षेत्र और प्रवासी खनिकों का नेटवर्क जो विदेशों में जोखिम उठाने को तैयार है। हालांकि इसे मजबूत संस्थागत और राजनयिक सहयोग की आवश्यकता है।
हाल ही में इस समाचार पत्र की एक रिपोर्ट ने दिखाया कि एक उद्यमशील विदेशी खनन पारिस्थितिकी तंत्र भारतीय राज्य के वित्तपोषण पर निर्भर हुए बिना उभरा है। इसलिए सरकार को इन कंपनियों को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखना चाहिए। खनन कंपनियों को मुख्यतः राजनयिक सहयोग, मेजबान सरकारों से निपटने में मदद और भारतीय निर्माताओं के साथ मज़बूत संबंधों की आवश्यकता है। चीन ने दशकों से इस तरह के दृष्टिकोण का मूल्य प्रदर्शित किया है जहां उसने खनन कंपनियों को वित्तपोषण, बुनियादी ढांचे और राजनयिक नेटवर्क के माध्यम से सहयोग दिया है।
अफ्रीका में भारतीय दूतावासों को इस संदर्भ में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए जबकि भारत को सरकार-से-सरकार के स्तर पर संबंधों का उपयोग भारतीय कंपनियों को खनन अधिकार सुरक्षित करने, नियामक कठिनाइयों को हल करने और तंजानिया, जाम्बिया और कॉन्गो लोकतांत्रिक गणराज्य जैसे देशों के साथ विश्वसनीय दीर्घकालिक संबंध बनाने में मदद करने के लिए करना चाहिए। भारत-जाम्बिया के बीच तांबे और अन्य महत्त्वपूर्ण खनिजों पर हालिया चर्चाएं ऐसे जुड़ाव के महत्व को रेखांकित करती हैं।
हाल ही में संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि भारत लीथियम, कोबाल्ट और निकल के लिए 100 फीसदी आयात पर निर्भर है और अपनी ग्रेफाइट आवश्यकताओं का 25 फीसदी आयात करता है। कम से कम प्रत्येक पहचाने गए महत्त्वपूर्ण खनिज का 55 फीसदी केवल 15 देशों में केंद्रित है जिससे विविधीकरण आवश्यक हो जाता है।
भारत के पास खनिज विदेश इंडिया लिमिटेड (काबिल) भी है जिसे नैशनल एल्युमीनियम कंपनी लिमिटेड, हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड और मिनरल एक्सप्लोरेशन ऐंड कंसल्टेंसी लिमिटेड का समर्थन प्राप्त है ताकि विदेशी खनिज संपत्तियों को हासिल करने की कोशिश की जा सके। सरकार-से-सरकार और व्यवसाय-से-व्यवसाय दोनों अवसरों की तलाश भारत सरकार कर रही है। निजी खनन पारिस्थितिकी तंत्र को इस रणनीति में शामिल किया जाना चाहिए न कि अलग से देखा जाना चाहिए।
भारत की घरेलू खनन पहल को भी नए सिरे से संतुलित करने की आवश्यकता है। हालांकि, देश में या विदेश में खदानें हासिल करना तो बस शुरुआत है। ज़्यादा गंभीर कमी प्रसंस्करण की है। संसदीय समिति ने बताया कि कोबाल्ट प्रसंस्करण का 77 फीसदी, ग्रेफाइट प्रसंस्करण का 91 फीसदी, रेयर-अर्थ प्रसंस्करण का 92 फीसदी और लीथियम प्रसंस्करण का 65 फीसदी हिस्सा चीन के पास है।
वह अक्सर इस फ़ायदे का इस्तेमाल भू-राजनीतिक समेत दूसरे मकसद पूरे करने के लिए करता है। इसलिए, दुनिया दूसरे विकल्प तलाश रही है और भारत एक भरोसेमंद स्रोत के तौर पर उभर सकता है। इसके लिए घरेलू रिफाइनिंग को ज़्यादा किफायती बनाने और जहां मुमकिन हो, वहां मौजूदा भारतीय रिफाइनिंग बुनियादी ढांचे में बदलाव करने की ज़रूरत है।
सरकार ने 24 महत्त्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों को केंद्रीय नीलामी के तहत रखा है और राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन शुरू किया है। फिर भी उद्योग की भागीदारी असमान रही है। उद्योग ने अपर्याप्त भूवैज्ञानिक डेटा, आर्थिक रूप से अव्यवहार्य छोटे ब्लॉकों और लंबी नियामक मंजूरियों को बाधाओं के रूप में उद्धृत किया है। सरकार को इन मुद्दों को शीघ्रता से संबोधित करना चाहिए।
खनिज सुरक्षा में पुनर्चक्रण भी शामिल होना चाहिए। लीथियम, कोबाल्ट, निकल, ग्रेफाइट और दुर्लभ खनिजों की पुनर्प्राप्ति एंड-ऑफ-लाइफ बैटरियों, इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक अपशिष्ट और खदान अपशिष्ट से घरेलू द्वितीयक संसाधन आधार बना सकती है। इसलिए भारत को एक एकीकृत रणनीति की आवश्यकता है: घरेलू अन्वेषण और खनन के साथ ही विदेशी निजी और राज्य-समर्थित परिसंपत्तियां। इसके साथ प्रसंस्करण, रिफाइनिंग और पुनर्चक्रण क्षमताओं को भी शामिल करना होगा।