अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की घोषणा का व्यापक रूप से स्वागत किया गया लेकिन इस घोषणा के दो दिन बाद भी तनाव बना हुआ है जो स्थायी शांति की संभावनाओं को क्षति पहुंचा सकता है। यहां तक कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के इस सप्ताहांत बातचीत के लिए इस्लामाबाद पहुंचने के ऐन पहले इजरायल द्वारा लेबनान पर हमले जारी रखने को लेकर विवाद बना हुआ है।
इजरायल ईरान समर्थित हिजबुल्लाह को नष्ट करना चाहता है। ईरान ने इन हमलों को युद्ध विराम का गंभीर उल्लंघन बताया है। वहीं इजरायल का दावा है कि लेबनान युद्धविराम समझौते के दायरे में नहीं था। वेंस ने भी इस बात की पुष्टि की है। जाहिर है कि यह ईरान के गहन अविश्वास को दूर करने वाला घटनाक्रम तो नहीं है। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने सिनेमाई भाषा में धमकियां देना और तीव्र कर दिया है। यह वातावरण संघर्षविराम के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। संघर्षविराम की आवश्यकता अमेरिका और उसके सहयोगियों को भी उतनी ही है जितनी कि ईरान को।
इसमें दो राय नहीं कि 41 दिनों की हिंसा, विनाश और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उथलपुथल के बावजूद न तो अमेरिका और न ही इजरायल अपने तय लक्ष्यों को हासिल कर सके। ऐसे में संवाद की प्रक्रिया बहुत अधिक स्वागतयोग्य है। चूंकि अमेरिका ने वार्ता का नेतृत्व करने के लिए वेंस को शामिल करने के ईरान के अनुरोध को स्वीकार किया, इसे एक निकासी योजना भी माना जा सकता है।
हालांकि, ईरानी पक्ष के लिए जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ का इसमें शामिल होना शायद ही कोई राहत की बात हो, क्योंकि इससे पहले हुई विफल वार्ता की अगुआई इन्हीं दोनों ने की थी। अमेरिका ने जिन 10 बिंदुओं को वार्ता के आधार के रूप में स्वीकार किया है उनके विवरण अस्पष्ट हैं लेकिन होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने की शर्त के तौर पर दोनों पक्षों द्वारा कथित तौर पर अपनाए गए अतिवादी रुख से यह संकेत मिलता है कि किसी साझा सहमति तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है।
अमेरिका की शर्तों में ईरान द्वारा अपने अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का परित्याग और परमाणु हथियार न रखने की प्रतिबद्धता, अमेरिकी निगरानी में होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा शुरू करना, ईरान-समर्थित क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों का विघटन और अनुपालन की निगरानी के लिए अमेरिकी सैनिकों की निरंतर उपस्थिति शामिल हैं।
मीडिया में रिपोर्ट की गई ईरान की शर्तें अमेरिका की मांगों का प्रतिबिंब प्रतीत होती हैं, जिनमें अमेरिका से आक्रामकता न करने की मौलिक प्रतिबद्धता, होर्मुज स्ट्रेट से नियंत्रित आवाजाही, सभी प्रतिबंधों का हटाया जाना, युद्ध क्षति का पूर्ण मुआवजा, और इन मुद्दों की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव में पुष्टि शामिल है। संयुक्त राष्ट्र से अनुमोदन पर जोर उल्लेखनीय है। यह संकेत देता है कि ईरान बहुपक्षीय नियम-आधारित संस्थानों के साथ तालमेल में रहने के लिए उत्सुक है, इसके विपरीत अमेरिका ने ईरान पर हमलों में संयुक्त राष्ट्र नियमों का खुला उल्लंघन किया है।
वार्ता का परिणाम चाहे जो भी हो, स्थायी शांति वास्तव में इस पर निर्भर करेगी कि क्या अमेरिका परमाणु हथियारों से लैस इजरायल की ‘ग्रेटर इजरायल’ की चाह में बसे हुए लोगों के खिलाफ हिंसा को रोकने का विकल्प चुनता है। वास्तव में, यदि इस नवीनतम युद्ध ने किसी बात को रेखांकित किया है, तो वह क्षेत्र की सुरक्षा संरचना का मौलिक पुनर्संयोजन है, जो अमेरिका या इजरायल के लिए लाभकारी होने की संभावना नहीं है।
ईरान के इजरायल और पश्चिम एशियाई सहयोगी देशों में स्थित अमेरिकी परिसंपत्तियों पर लगातार हमलों ने अमेरिका की सुरक्षा छतरी में खामियों को उजागर कर दिया, जिससे 2020 के अब्राहम समझौते का महत्त्व कमजोर हो गया। क्षेत्रीय नेताओं ने समझ लिया है कि वे अब सुरक्षा के लिए दुनिया की एकमात्र महाशक्ति पर भरोसा नहीं कर सकते। वे संयुक्त कूटनीतिक प्रयासों पर आपस में चर्चा कर रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि 8-9 अप्रैल को ईरान और सऊदी अरब के विदेश मंत्रियों ने कथित तौर पर क्षेत्रीय स्थिरता पर चर्चा करने के लिए फोन पर बातचीत की, जो युद्ध शुरू होने के बाद पहला आधिकारिक संपर्क था। वार्ता का परिणाम चाहे जो भी हो, पश्चिम एशिया के हालात दिलचस्प मोड़ ले रहे हैं।