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डेविड बनाम गोलियत: ईरान युद्ध ने हथियार प्रणालियों की कीमतों में असमानता उजागर कर दी

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इतिहासकार कोरेली बार्नेट के अनुसार युद्ध ही अंतिम परीक्षा होती है। वे राज्यों, अर्थव्यवस्थाओं और संस्थानों की ताकत और कमजोरियों को उजागर करते हैं

Last Updated- March 10, 2026 | 9:54 PM IST
modern warfare
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई संघर्षों को जन्म दिया है। कुछ पुराने थे लेकिन उन्हें नया बल मिला, जैसे गाजा पर इजरायल की बमबारी या यूक्रेन पर रूस का आक्रमण। अन्य अचानक ही भड़क उठे, जैसे ईरान में चल रहा मौजूदा संघर्ष। इतिहासकार कोरेली बार्नेट के अनुसार युद्ध ही अंतिम परीक्षा होती है। वे राज्यों, अर्थव्यवस्थाओं और संस्थानों की ताकत और कमजोरियों को उजागर करते हैं। साथ ही, वे यह भी उजागर कर देते हैं कि कुछ आम धारणाएं गलत थीं।

अगर कोई एक आम धारणा है जिस पर पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं ने सवाल खड़े कर दिए हैं, तो वह यह है कि आधुनिक युद्ध में मात्रा से ज्यादा गुणवत्ता मायने रखती है। अमेरिका द्वारा कमजोर हथियारों से लैस दुश्मनों पर वर्षों तक किए गए सटीक बमबारी अभ्यास, क्रूज मिसाइलों और प्रीडेटर ड्रोन के इस्तेमाल से यह सहज धारणा बन गई थी कि तकनीकी बढ़त ही निर्णायक कारक है।

यह बात खासकर बड़े युद्धों में बिल्कुल भी सच नहीं हो सकती, जो विस्तृत मोर्चों पर लड़े जाते हैं और कुछ हमलों से कहीं अधिक समय तक चलते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध खासकर पश्चिमी देशों के लिए बड़ा झटका रहा है। रूसी संघ का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) केवल 2.5 लाख करोड़ डॉलर है, फिर भी यह किसी तरह यूरोप और उत्तरी अमेरिका में यूक्रेन के आपूर्तिकर्ताओं से अधिक उत्पादन करने में सक्षम रहा है, जिनका संयुक्त जीडीपी 50 लाख करोड़ डॉलर है।

शुरुआत में, यूक्रेन शिकायत करता था कि उसे जो कुछ भी प्राप्त करने की अनुमति थी, उन पर बहुत अधिक पाबंदियां हैं; लेकिन समय के साथ वास्तविक बाधा गोला-बारूद और इंटरसेप्टर के उपयोग की अस्थिर दर में बदल गई है, जो कि टिकाऊ नहीं है, खासकर रूस द्वारा इस्तेमाल की जा सकने वाली संख्या की तुलना में ऐसा लगता है।

लागत में भारी असमानता के कारण ऐसा हो सकता है। अमेरिका या जापान में निर्मित एक लंबी दूरी के पैट्रियट इंटरसेप्टर की कीमत 30 लाख डॉलर से अधिक है। वहीं, नॉर्वे-अमेरिकी नेसैम्स वायु रक्षा प्रणाली के एक गोले की कीमत 10 लाख डॉलर से अधिक है। दूसरी ओर, ईरान के शाहिद ड्रोन, जिनको रूस ने व्यापक रूप से लाइसेंस दिया है और यूक्रेन में इनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है, उनकी निर्माण लागत लगभग 35,000 डॉलर प्रति ड्रोन है और मारक क्षमता 2,500 किलोमीटर है।

लॉकहीड मार्टिन प्रति वर्ष लगभग 600 पैट्रियट ड्रोन बनाती है, जबकि रूस प्रतिदिन 400 ड्रोन बनाता है और यूक्रेनी आला कमान के अनुसार, उसका इरादा अंततः इस संख्या को बढ़ाकर 1,000 करने का है। पश्चिम की सामरिक बढ़त का कारण यह व्यापक धारणा थी कि उसके पास उन्नत, उच्च-तकनीकी उत्पादन के केंद्र थे जो आसानी से उन देशों से निपट सकते थे जिनके पास केवल कम मूल्य वाले विनिर्माण के बड़े क्षेत्र थे। यह धारणा अब बेबुनियाद साबित हो रही है।

खाड़ी क्षेत्र में चल रहे बेहद असमान मुकाबले में भी यह स्पष्ट हो रहा है। अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी यह दावा किया कि दुनिया की ‘दो सबसे शक्तिशाली वायु सेनाओं’ को ईरान पर पूर्ण हवाई श्रेष्ठता प्राप्त है लेकिन लगभग उसी समय उन्होंने यह भी कहा कि वे ईरान द्वारा दागे गए हर हमले को ‘रोक नहीं सकते’। इजरायल के अनुसार, ईरान के पास शायद 10,000 शाहिद मिसाइलें हैं। उन्होंने केवल कुछ हजार मिसाइलों को दागकर अपने पूरे पड़ोस में अफरा-तफरी मचा दी है।

हालांकि उसके मिसाइल प्रक्षेपणों की गति धीमी हो गई है, ऐसा प्रक्षेपण ढांचों पर हमलों के कारण भी हो सकता है। वैसे यह भी सही ​है कि मिसाइल को कहीं से भी दागने के लिए तैयार किया जा सकता है जैसा कि यूक्रेन-रूस संघर्ष में देखने को मिला है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अगर ईरान चाहे तो वह महीनों तक खाड़ी और होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरने वाले जहाजों के साथ-साथ कतर और सऊदी अरब में जीवाश्म ईंधन निष्कर्षण के बुनियादी ढांचे को खतरे में बनाए रख सकता है।

पश्चिम एशिया में अमेरिकी सहयोगियों के लिए यह असंतुलन एक गंभीर समस्या है। स्टिमसन सेंटर के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान द्वारा दागी गई मिसाइलों में से 92 फीसदी को मार गिराया है, जिनमें 165 बैलिस्टिक मिसाइल और 541 शाहिद मिसाइल शामिल हैं। लेकिन अमीरात द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे अमेरिकी गोला-बारूद की घटती आपूर्ति की भरपाई करने के उसके अनुरोधों को अनसुना कर दिया गया है।

उधर पूर्वी एशियाई देशों को ताइवान स्ट्रेट में एक और, और कहीं अधिक भयावह, संघर्ष छिड़ने की आशंका सता रही है, जिससे उनकी चिंता और भी बढ़ जाएगी। जापान में मित्सुबिशी कंपनी लॉकहीड मार्टिन के लाइसेंस पर पैट्रियट मिसाइल बनाती है। वह सालाना लगभग 30 मिसाइल का ही विनिर्माण करती है। उत्पादन बढ़ाना मुश्किल है, क्योंकि कुछ महत्त्वपूर्ण कच्चा माल अमेरिका से आता है, और ऐसा लगता है कि उनकी आपूर्ति कम होती जा रही है।

ऐसा लगता है कि हम उस दुनिया से बहुत दूर नहीं हैं जिसमें युद्ध उन देशों द्वारा जीते जाएंगे जो उच्च तकनीक वाले शत्रु से होने वाले शुरुआती नुकसान को झेलने में सक्षम हों और साथ ही अपने कम तकनीक वाले सैन्य-औद्योगिक आधार को भी पर्याप्त रूप से संरक्षित रख सकें। द्वितीय विश्व युद्ध में सोवियत संघ द्वारा नाजी जर्मनी को हराने का तरीका आज भी एक मिसाल है।

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First Published - March 10, 2026 | 9:46 PM IST

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