अभी के दौर में ‘लोन’ शब्द सुनते ही अक्सर लोगों के मन में डर या चिंता का भाव आता है। सामाजिक धारणा यही रही है कि कर्ज लेना मुसीबत को दावत देना है। लेकिन आर्थिक जगत के जानकार इसे अलग नजरिए से देखते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि लोन हमेशा गलत नहीं होता; बल्कि अगर इसे सही रणनीति और सूझबूझ के साथ लिया जाए, तो यह आपकी आर्थिक उन्नति का सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकता है। असल सवाल यह नहीं है कि आपने कर्ज लिया है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि आपने उस पैसे का इस्तेमाल कहां किया है।
इसमें समझदारी की शुरुआत इस बात को पहचानने से होती है कि कौन सा कर्ज आपको अमीर बनाएगा और कौन सा आपको गरीबी के दलदल में धकेलेगा। Nitstone Finserv के CEO और MD सेंथिल कुमार आर के अनुसार, अच्छे और बुरे कर्ज के बीच का फर्क सिर्फ ‘इरादे और नतीजे’ में छिपा है। जो कर्ज आपकी कमाई बढ़ाने या आपकी संपत्ति की वैल्यू बढ़ाने में मदद करे, वह ‘गुड डेट’ यानी अच्छा कर्ज है। उदाहरण के लिए, बिजनेस बढ़ाने के लिए लिया गया लोन या शिक्षा के लिए लिया गया कर्ज भविष्य में बेहतर रिटर्न देता है।
वहीं दूसरी ओर, चॉइस फिनसर्व के CEO विजेंद्र का मानना है कि जब कर्ज का इस्तेमाल ऐसी चीजों पर किया जाता है जो केवल उपभोग (Consumption) के लिए हैं और जिनकी कीमत समय के साथ घटती है, तो वह ‘बैड डेट’ बन जाता है। वे
विजेंद्र सिंह कहते हैं कि अगर कोई इंसान सिर्फ दिखावे के लिए या ऐसी चीजें खरीदने के लिए लोन लेता है जिन्हें वह अभी अफॉर्ड नहीं कर सकता, तो वो खुद ही परेशानी बुला रहा है। सीधी बात ये है कि प्रॉपर्टी या बिजनेस के लिए लिया गया लोन आगे चलकर फायदा दे सकता है, लेकिन महंगी छुट्टियां मनाने या बेकार के गैजेट्स खरीदने के लिए लिया गया कर्ज सिर्फ बोझ बनता है।
जबकि SaveIN के फाउंडर और CEO जितिन भसीन का कहना है कि सीधे शब्दों में कहें तो, लोन लेना तब ‘गुड डेट’ है जब वह आपके भविष्य की वैल्यू बढ़ाए, जैसे घर, पढ़ाई या बिजनेस, लेकिन अगर आप दिखावे या महंगी लाइफस्टाइल के लिए भारी ब्याज पर कर्ज लेते हैं, तो वह ‘बैड डेट’ बन जाता है। असली समझदारी इस गणित में है कि लोन से होने वाला फायदा उसके ब्याज से ज्यादा होना चाहिए। यहां तक कि 0% EMI भी एक स्मार्ट तरीका है क्योंकि इसमें आप बिना एक्स्ट्रा पैसा दिए बस पेमेंट को किस्तों में बांट रहे होते हैं।
अंत में, लोन खुद में बुरा नहीं है; उसे आप किस काम के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं और कितनी अनुशासन से किस्त चुकाते हैं, यही तय करता है कि वह आपकी तरक्की की सीढ़ी बनेगा या गले की फाँसी।
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एक्सपर्ट्स का कहना है कि कुछ हालात में लोन लेना सिर्फ सुरक्षित ही नहीं, बल्कि काफी समझदारी भरा फैसला भी होता है। विजेंद्र सिंह उदाहरण देते हैं कि अगर कोई बिजनेस अपने खर्च घटाने के लिए लोन लेता है, तो वो नुकसान का सौदा नहीं होता। मसलन, एक कोल्ड स्टोरेज ऑपरेटर ने सोलर पैनल लगाने के लिए कर्ज लिया। इससे उसका बिजली का बिल हर साल 11 लाख रुपये कम हो गया, जबकि उसकी EMI सिर्फ 8 लाख रुपये थी। यानी पहले ही साल से उसे इस लोन से फायदा मिलने लगा।
सेंथिल कुमार आर कहते हैं कि अगर आपके सामने ऐसा मौका हो जहां कमाई, ब्याज से ज्यादा हो सकती है, तो वहां लोन लेना समझदारी है। जैसे MSME में ऑर्डर पूरा करने के लिए या खेती में उत्पादन बढ़ाने के लिए लिया गया कर्ज आगे बढ़ने में मदद करता है। वहीं, इमरजेंसी में अपनी संपत्ति बेचने के बजाय गोल्ड लोन लेना एक अच्छा तरीका है, जिससे आप बिना अपनी लंबी अवधि की बचत को छेड़े पैसों की जरूरत पूरी कर सकते हैं।
वहीं जितिन भसीन कहते हैं कि जितिन भसीन लोन लेना तब सबसे सही है जब वह आपकी जेब पर बोझ बनने के बजाय आपकी तरक्की का जरिया बने। आसान भाषा में कहें तो, अगर आप ऐसी चीज के लिए कर्ज ले रहे हैं जिसकी वैल्यू ब्याज से ज्यादा तेजी से बढ़े (जैसे घर या बिज़नेस), जिसकी EMI आपकी सैलरी के 35% से कम हो, और जिसे लेने के बाद भी आपकी सेविंग्स सुरक्षित रहें, तो यह एक स्मार्ट फैसला है। यहां तक कि नो-कॉस्ट EMI का इस्तेमाल करके आप अपना पैसा बचाकर उसे कहीं और इन्वेस्ट भी कर सकते हैं। सीधा फंडा यह है कि अगर लोन आपकी लाइफ को आसान बना रहा है और भविष्य में फायदा देने वाला है, तो बेझिझक आगे बढ़ें।
अक्सर लोग लोन ले तो लेते हैं, लेकिन छोटी-छोटी गलतियों की वजह से बाद में मुश्किल में फंस जाते हैं। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि सबसे बड़ी गलती होती है अंदाज़े की कमाई के भरोसे कर्ज लेना। विजेंद्र सिंह के मुताबिक, लोग अक्सर सोच लेते हैं कि आगे प्रमोशन मिलेगा या बिजनेस में ज्यादा मुनाफा होगा, और उसी हिसाब से बड़ा लोन उठा लेते हैं, जबकि उनके पास अभी के समय में पक्का कैश फ्लो नहीं होता। इसलिए सलाह यही है कि लोन लेने से पहले कम से कम 6 से 9 महीने का खर्च चलाने जितना पैसा अलग से जरूर रखें।
सेंथिल कुमार भी मानते हैं कि बिना साफ रिपेमेंट प्लान के लिया गया लोन आगे चलकर परेशानी बन सकता है। कई लोग एक साथ कई कर्ज ले लेते हैं, जिसे ओवर-लेवरेजिंग कहा जाता है, और यही बाद में दबाव बढ़ाता है। इसके अलावा, लोग अक्सर लोन की छिपी शर्तें, प्रोसेसिंग फीस और ब्याज दर (फिक्स्ड या फ्लोटिंग) जैसी बातों को नजरअंदाज कर देते हैं, जो बाद में भारी पड़ती हैं। आज के समय में, जब ब्याज दरें ऊपर-नीचे हो रही हैं, तो बेहतर है कि EMI का हिसाब 1-2% ज्यादा ब्याज मानकर लगाएं। अगर इसके बाद भी आपकी EMI आपकी महीने की बचत के करीब 40% के अंदर रहती है, तो स्थिति काफी हद तक सुरक्षित मानी जा सकती है।