ITR Filing 2026: आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करने से पहले करदाताओं को अपने एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) की जांच जरूर कर लेनी चाहिए। AIS में दिखाई देने वाली जानकारी कई अलग-अलग संस्थानों से प्राप्त डेटा के आधार पर तैयार की जाती है, इसलिए इसमें कभी-कभी गलत या दोहराई गई एंट्री भी हो सकती हैं।
हाल ही में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने बैंकों, म्युचुअल फंड कंपनियों और अन्य रिपोर्टिंग संस्थाओं को वित्त वर्ष 2025-26 के लिए उच्च मूल्य वाले वित्तीय लेनदेन की सही रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
AIS आयकर विभाग के पोर्टल पर उपलब्ध एक विस्तृत वित्तीय विवरण है। इसमें किसी करदाता की आय, चुकाए गए टैक्स, निवेश और वित्त वर्ष के दौरान किए गए बड़े वित्तीय लेनदेन की जानकारी दर्ज होती है।
एसवीएएस बिजनेस एडवाइजर्स के मैनेजिंग पार्टनर Vishwas Panjiar के अनुसार, AIS में बैंकों, म्युचुअल फंड हाउस, स्टॉक ब्रोकर्स, कंपनियों और नियोक्ताओं द्वारा रिपोर्ट की गई जानकारी शामिल होती है। इसमें बड़े कैश डिपॉजिट, ब्याज से हुई आय, बड़े निवेश, म्युचुअल फंड रिडेम्प्शन और शेयर बाजार से जुड़े लेनदेन जैसी जानकारियां करदाता के पैन नंबर से जोड़कर दिखाई जाती हैं।
Vishwas Panjiar का कहना है कि ITR दाखिल करने से पहले AIS की समीक्षा करना बेहद जरूरी है। इससे यह पता चल जाता है कि आपकी सभी आय और वित्तीय लेनदेन सही तरीके से दर्ज हुए हैं या नहीं।
उदाहरण के लिए, किसी पुराने बैंक खाते से मिला ब्याज, छोटी डिविडेंड आय या अलग-अलग ब्रोकर्स के जरिए किए गए निवेश संबंधी लेनदेन कई बार करदाता की नजर से छूट सकते हैं। AIS की मदद से ऐसी जानकारियों का मिलान किया जा सकता है और भविष्य में आयकर विभाग की ओर से आने वाले नोटिस से बचा जा सकता है।
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AIS एक तरह से मिलान करने का महत्वपूर्ण साधन भी है। यह विभिन्न स्रोतों से प्राप्त वित्तीय जानकारी को एक ही जगह पर उपलब्ध कराता है। इससे करदाता उन आय या लेनदेन की पहचान कर सकते हैं जो अन्यथा छूट सकते हैं, जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट पर मिला ब्याज, जिस पर टीडीएस नहीं कटा हो, छोटी डिविडेंड आय या म्युचुअल फंड और शेयरों से जुड़े लेनदेन।
विशेष रूप से उन लोगों के लिए AIS काफी उपयोगी है जिनके कई बैंक खाते, निवेश प्लेटफॉर्म या विभिन्न वित्तीय उत्पादों में निवेश हैं। ऐसे मामलों में हर लेनदेन का अलग-अलग रिकॉर्ड रखना मुश्किल हो सकता है।
Panjiar का कहना है कि एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) एक उपयोगी दस्तावेज है, लेकिन इसे अंतिम और पूरी तरह त्रुटिरहित रिकॉर्ड मानना सही नहीं होगा। इसमें कई बार डुप्लीकेट एंट्री, गलत वर्गीकरण, समय संबंधी अंतर या गलत पैन नंबर से जुड़ी जानकारी दर्ज हो सकती है।
एक्सपर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में AIS में म्युचुअल फंड या शेयरों की बिक्री का पूरा लेनदेन मूल्य दिखाई देता है, जबकि कर की गणना केवल वास्तविक कैपिटल गेन पर होती है। उन्होंने कहा, “AIS में दिखाई गई जानकारी को बिना जांचे सीधे आयकर रिटर्न में भरने से गलत रिपोर्टिंग हो सकती है और करदाता को जरूरत से ज्यादा टैक्स भी चुकाना पड़ सकता है। रिटर्न दाखिल करने से पहले AIS का मिलान फॉर्म 26AS, फॉर्म 16, फॉर्म 16A, बैंक स्टेटमेंट और कैपिटल गेन रिपोर्ट से जरूर करना चाहिए।”
नांगिया एंड कंपनी एलएलपी के सीनियर पार्टनर Neeraj Agarwala के मुताबिक AIS में सबसे ज्यादा गड़बड़ियां टीडीएस से जुड़ी जानकारी में देखने को मिलती हैं। कई बार करदाता आय को टीडीएस काटने के बाद की राशि के रूप में दिखाते हैं, जबकि AIS और फॉर्म 16/16A में सकल आय दर्ज होती है।
Neeraj Agarwala ने कहा कि AIS में विदेशी धन प्रेषण, विदेश में खर्च, डिविडेंड आय, शेयर और म्युचुअल फंड लेनदेन, बड़े नकद जमा, क्रेडिट कार्ड भुगतान और संपत्ति से जुड़े सौदों की जानकारी भी दर्ज होती है। यदि इन आंकड़ों और आयकर रिटर्न में घोषित आय के बीच अंतर पाया जाता है, तो आयकर विभाग की ओर से स्वतः नोटिस या जांच शुरू हो सकती है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि करदाता टैक्स भुगतान, टीडीएस, टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स (TCS), उपलब्ध टैक्स क्रेडिट और रिफंड से जुड़ी जानकारी का भी सावधानीपूर्वक मिलान करें। इससे गलत दावे, अतिरिक्त कर मांग या रिफंड मिलने में होने वाली देरी जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है।
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करदाताओं को AIS को अंतिम रिकॉर्ड मानने के बजाय एक शुरुआती दस्तावेज के रूप में देखना चाहिए। इसमें दर्ज जानकारी का मिलान सैलरी स्लिप, फॉर्म 16, फॉर्म 26AS, बैंक स्टेटमेंट, ब्याज प्रमाणपत्र, शेयर और म्युचुअल फंड निवेश से जुड़े स्टेटमेंट, संपत्ति के दस्तावेज और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड से करना जरूरी है।
Neeraj Agarwala का कहना है कि करदाताओं को खास तौर पर डिविडेंड आय, कैपिटल गेन, विदेश से प्राप्त राशि, संपत्ति से जुड़े लेनदेन और TDS/TCS क्रेडिट की जांच जरूर करनी चाहिए। इन मामलों में गलत रिपोर्टिंग होने पर आयकर विभाग की ओर से नोटिस आ सकता है या फिर करदाता को जरूरत से ज्यादा टैक्स चुकाना पड़ सकता है।
अगर AIS में कोई गलत या डुप्लिकेट एंट्री दिखाई देती है, तो करदाता को आयकर पोर्टल पर फीडबैक दर्ज कराना चाहिए। इससे यह रिकॉर्ड में रहेगा कि संबंधित जानकारी पर करदाता ने आपत्ति जताई थी।
विशेषज्ञ के अनुसार आयकर रिटर्न दाखिल करने से पहले यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि AIS पूरी तरह अपडेट हो। कई बार अंतिम तिमाही यानी जनवरी से मार्च के दौरान हुए लेनदेन या आय की जानकारी समय पर दर्ज नहीं हो पाती।
अग्रवाला के मुताबिक, करदाताओं को विशेष रूप से यह देखना चाहिए कि जनवरी-मार्च तिमाही की ब्याज आय, डिविडेंड, प्रतिभूति लेनदेन और TDS से जुड़ी जानकारी AIS में शामिल हुई है या नहीं। पहले ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जहां अंतिम तिमाही की जानकारी छूटने के कारण आयकर विभाग की ओर से स्वत: नोटिस जारी हुए या डेटा में असंगति पाई गई।
यदि AIS में दर्ज जानकारी और करदाता के वास्तविक वित्तीय रिकॉर्ड में अंतर पाया जाता है, तो आयकर विभाग की ओर से नोटिस भेजा जा सकता है। ऐसे मामलों में रिटर्न प्रोसेसिंग से जुड़ी सूचना, डिफेक्टिव रिटर्न नोटिस, स्क्रूटिनी असेसमेंट या री-असेसमेंट जैसी कार्रवाई हो सकती है।
अरीटे कंसल्टेंट्स एलएलपी (Areete Consultants LLP) की संस्थापक रूपाली सिंघानिया के अनुसार, यदि करदाता AIS और अपने दस्तावेजों के बीच मौजूद अंतर को स्पष्ट नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें जुर्माना, ब्याज देनदारी या टैक्स रिफंड में देरी जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि AIS एक महत्वपूर्ण संदर्भ दस्तावेज है, लेकिन यह मूल वित्तीय रिकॉर्ड का विकल्प नहीं है। इसलिए आयकर रिटर्न दाखिल करने से पहले इसकी जानकारी का सावधानीपूर्वक सत्यापन करना चाहिए।
सिंघानिया के मुताबिक, यदि किसी करदाता को आयकर विभाग से नोटिस मिलता है, तो सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि नोटिस किस प्रकार का है। यह रिटर्न प्रोसेसिंग, डिफेक्टिव रिटर्न, अतिरिक्त जानकारी की मांग, स्क्रूटिनी असेसमेंट या री-असेसमेंट से जुड़ा हो सकता है।
रूपाली सिंघानिया का कहना है कि करदाताओं को नोटिस में दी गई जानकारी को ध्यान से पढ़ना चाहिए, अपने दस्तावेजों से उसका मिलान करना चाहिए और निर्धारित समयसीमा के भीतर आयकर पोर्टल पर जवाब देना चाहिए।
यदि समस्या AIS में दर्ज गलत जानकारी के कारण उत्पन्न हुई है, तो करदाता आयकर पोर्टल पर फीडबैक देकर संबंधित त्रुटि की जानकारी दे सकते हैं। वहीं, स्क्रूटिनी या री-असेसमेंट जैसे मामलों में किसी कर विशेषज्ञ की मदद लेना बेहतर रहेगा।