FII Investment: विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। NSDL के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक 2.25 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की शुद्ध बिकवाली कर चुके हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह पैसा जा कहां रहा है?
इसका जवाब ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों में छिपा है। दरअसल, दुनिया इस समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दौड़ में लगी हुई है। ChatGPT से लेकर AI एजेंट्स तक, हर नई तकनीक के पीछे शक्तिशाली चिप्स, डेटा सेंटर और भारी कंप्यूटिंग क्षमता की जरूरत होती है। यही वजह है कि जिन देशों में चिप्स और AI हार्डवेयर बनाने वाली कंपनियां हैं, वे निवेशकों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं।
इस बदलते रुझान का असर अब साफ तौर पर दिखने लगा है। दक्षिण कोरिया मार्केट कैपिटलाइजेशन के मामले में भारत को पीछे छोड़ चुका है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, दक्षिण कोरिया का शेयर बाजार करीब 5 ट्रिलियन डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है, जबकि भारत का मार्केट कैप करीब 4.8 ट्रिलियन डॉलर रह गया है। ताइवान भी लगभग 4.95 ट्रिलियन डॉलर के साथ भारत से आगे निकल चुका है।
सवाल यह है कि क्या AI बूम ने वैश्विक निवेश का पूरा समीकरण बदल दिया है? क्या विदेशी निवेशक अब भारत की बजाय उन देशों पर दांव लगा रहे हैं, जहां AI की असली कमाई हो रही है? और सबसे अहम, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े AI टैलेंट पूल वाला भारत इस दौड़ में आखिर पीछे क्यों दिख रहा है?
2026 में एफपीआई की शुद्ध निकासी
| महीना | शुद्ध निवेश/निकासी |
|---|---|
| जनवरी | -29,240 |
| फरवरी | +37,804 |
| मार्च | -125,736 |
| अप्रैल | -70,885 |
| मई | -29,484 |
| जून* | -20,043 |
सोर्स: NSDL (01 जून 2026 तक का डेटा)
इसका सीधा जवाब है-चिप्स।
ताइवान की TSMC दुनिया की सबसे बड़ी सेमीकंडक्टर कंपनी है। Nvidia जैसी कंपनियों के लिए सबसे एडवांस चिप्स यहीं बनते हैं। AI बूम का सबसे बड़ा फायदा TSMC को मिला है और उसी का असर पूरे ताइवानी शेयर बाजार पर दिखा है। दूसरी तरफ दक्षिण कोरिया में Samsung Electronics और SK Hynix जैसी कंपनियां हैं, जो AI के लिए जरूरी मेमोरी चिप्स बनाती हैं। AI सर्वर और डेटा सेंटर की बढ़ती मांग ने इन कंपनियों की कमाई और शेयर कीमतों को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है।
नोमुरा का अनुमान है कि AI की मांग के चलते 2026 में कोरियाई कंपनियों की कमाई में 200 फीसदी तक बढ़ोतरी हो सकती है। जनवरी से अप्रैल के बीच दक्षिण कोरिया का निर्यात रिकॉर्ड 306 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें सबसे बड़ा योगदान सेमीकंडक्टर सेक्टर का रहा।
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यहां कहानी दिलचस्प हो जाती है।
चॉइस ब्रोकरेज के रिसर्च एनालिस्ट कुणाल बजाज कहते हैं कि भारत की समस्या क्षमता की नहीं, बल्कि उसकी स्थिति की है। आसान भाषा में कहें तो AI की दुनिया में इस समय सबसे ज्यादा पैसा उन कंपनियों को मिल रहा है जो चिप्स बनाती हैं, डेटा सेंटर चलाती हैं, क्लाउड प्लेटफॉर्म की मालिक हैं या बड़े AI मॉडल तैयार करती हैं। जबकि भारत की ताकत IT सेवाओं और सॉफ्टवेयर सेवाओं में है।
उनके मुताबिक, भारतीय IT कंपनियों को AI से जुड़े नए ऑर्डर मिल रहे हैं, लेकिन उनसे कमाई धीरे-धीरे आ रही है। इसकी वजह यह है कि ज्यादातर कंपनियां फिलहाल AI का इस्तेमाल खर्च कम करने और काम की रफ्तार बढ़ाने के लिए कर रही हैं।
इतना ही नहीं, AI कई ऐसे काम भी खुद करने लगा है जो पहले बड़ी संख्या में लोग करते थे। यानी जिस आउटसोर्सिंग मॉडल पर भारतीय IT इंडस्ट्री खड़ी हुई, AI उसी मॉडल को भी चुनौती दे रहा है।
उनका कहना है कि भारत की लंबी अवधि की कहानी मजबूत है, लेकिन जब तक भारत वैश्विक स्तर के AI प्रोडक्ट नहीं बनाता या AI हार्डवेयर इकोसिस्टम में अपनी मजबूत मौजूदगी नहीं बनाता, तब तक वह AI बूम का बड़ा विजेता नहीं बन पाएगा। फिलहाल भारत इस थीम का सीधा नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष लाभार्थी है।
यही सबसे बड़ा विरोधाभास है।
अर्था भारत इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के मैनेजिंग पार्टनर सचिन सावरिकर के मुताबिक, भारत दुनिया के 26 फीसदी AI यूजर्स का घर है। दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा AI टैलेंट पूल भी भारत के पास है। लेकिन वैश्विक निजी AI निवेश में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 1 फीसदी है।
यानी लोग भारत में AI का इस्तेमाल कर रहे हैं, AI इंजीनियर भी हैं, लेकिन AI से जुड़ा बड़ा निवेश कहीं और जा रहा है। सावरिकर कहते हैं कि इसका कारण यह है कि AI की वैल्यू चेन में सबसे ज्यादा पैसा चिप्स और इंफ्रास्ट्रक्चर के स्तर पर बन रहा है, जबकि भारत अभी उस हिस्से में मौजूद नहीं है।
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NSDL के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल 29 मई तक विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से 2.25 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा निकाल चुके हैं। आमतौर पर इसकी वजह महंगे वैल्यूएशन, कमजोर रुपया और कमाई पर दबाव को बताया जाता है। लेकिन सचिन सावरिकर का मानना है कि असली कहानी इससे कहीं बड़ी है।
उनके मुताबिक, दुनिया भर का पैसा AI और सेमीकंडक्टर थीम की तरफ जा रहा है। भारत के शेयर बाजार में ऐसी बड़ी लिस्टेड कंपनियां नहीं हैं जिन पर विदेशी निवेशक AI इंफ्रास्ट्रक्चर का सीधा दांव लगा सकें। सावरिकर का कहना है कि जुलाई 2024 में कैपिटल गेन टैक्स बढ़ाकर 12.5 फीसदी करना भी विदेशी निवेशकों के लिए एक नकारात्मक संकेत था। इससे निवेश की लागत बढ़ी, ठीक उस समय जब दूसरे देश विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए प्रोत्साहन दे रहे थे।
सचिन सावरिकर के मुताबिक तीन बड़ी चुनौतियां हैं।
पहली, भारत में बड़े पैमाने पर घरेलू चिप निर्माण नहीं है। टाटा-पीएसएमसी फैब और माइक्रोन जैसी परियोजनाएं अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन TSMC और Samsung से तुलना करें तो भारत अभी शुरुआती सीढ़ी पर है। दूसरी, भारतीय शेयर बाजार में ऐसी बड़ी लिस्टेड कंपनियों की कमी है जिन्हें AI इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च का सीधा फायदा मिलने वाला हो। तीसरी, नीतियों को जमीन पर उतारने की चुनौती। Semiconductor Mission, PLI योजना और IndiaAI Mission जैसी पहलें शुरू हुई हैं, लेकिन निवेशक घोषणाओं से ज्यादा नतीजे देखना चाहते हैं। उनके शब्दों में, “वैश्विक निवेशक ऐलान नहीं, नतीजों में पैसा लगाते हैं।”
MSCI Emerging Markets Index में भारत की हिस्सेदारी पिछले साल के करीब 19 फीसदी से घटकर 12 फीसदी रह गई है। इसका मतलब साफ है। वैश्विक फंड अब अपने पैसे का बड़ा हिस्सा उन बाजारों में लगा रहे हैं जहां AI और सेमीकंडक्टर कंपनियां मौजूद हैं।
हालांकि सावरिकर यह भी याद दिलाते हैं कि दक्षिण कोरिया की पूरी कहानी सिर्फ AI की नहीं है। वहां Samsung और SK Hynix जैसी कुछ बड़ी कंपनियों ने बाजार को ऊपर खींचा है। दोनों कंपनियां मिलकर KOSPI इंडेक्स का करीब 42 फीसदी वजन रखती हैं।
उनके मुताबिक, “दुनिया भर का पैसा पूरे कोरिया बाजार को नहीं खरीद रहा, बल्कि AI एक्सपोजर खरीद रहा है।”
सावरिकर का मानना है कि इसके लिए कुछ चीजें बदलनी होंगी। निकट अवधि में रुपये में स्थिरता, अनुमान से बेहतर कॉरपोरेट नतीजे और कच्चे तेल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रहना जरूरी होगा। लंबी अवधि में भारत को सिर्फ IT सेवाओं पर निर्भर रहने के बजाय चिप्स, डेटा सेंटर, AI इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म बनाने होंगे। साथ ही टैक्स, नियमों और नीतियों में स्थिरता भी दिखानी होगी।