बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की ओर से लौटाए या अस्वीकार किए गए विवरणिका मसौदों (डीआरएचपी) की संख्या वित्त वर्ष 26 में घटकर सिर्फ दो रह गई जबकि एक साल पहले यह संख्या 17 थी। बाजार के जानकारों के अनुसार इससे चीजों को सुविधाजनक बनाने के नियामक के दृष्टिकोण का संकेत मिलता है।
उद्योग के जानकारों का मानना है कि इस गिरावट की वजह इश्यू लाने वालों और नियामक के बीच बेहतर तालमेल होना है। सेबी अब कंपनियों को जांच-पड़ताल के दौरान पूछे गए सवालों का जवाब देने के लिए ज्यादा समय देता है। यह पहले के उस तरीके से बदलाव है जिसमें आईपीओ को तीन महीने के अंदर मंजूरी देने पर जोर दिया जाता था और अगर दस्तावेजों में कोई बड़ी गड़बड़ी होती थी तो उन्हें अक्सर लौटा दिया जाता था।
कुछ निवेश बैंकर खारिज करने में आई गिरावट का श्रेय इस बात को भी देते हैं कि इश्यू लाने वालों को संभावित खतरे के संकेतों की अब बेहतर समझ हो गई है। इन खतरों में मार्केटिंग के लिए फंड का इस्तेमाल, पहले किए गए आवंटन, डेट इश्यू और प्रवर्तकों का वर्गीकरण शामिल हैं।
पैंटोमैथ कैपिटल एडवाइजर्स के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक महावीर लुणावत ने कहा, हम जो देख रहे हैं वह कहीं ज्यादा सहज और परिपक्व आईपीओ इकोसिस्टम उभार है। सेबी का लीड मैनेजरों के साथ पहले ही जुड़ने के तरीके और समय पर सुधार की गुंजाइश देने से यह ज्यादा अनुमान लगाने लायक और कुशल प्रक्रिया बन गई है। मसौदे की वापसी की संख्या में भारी कमी इस बदलाव का साफ संकेत है।
वित्त वर्ष 26 में वापस लिए गए आईपीओ की संख्या भी घटकर 16 रह गई, जो पिछले साल 19 थी। खारिज करने के मामलों और वापसी दोनों में यह गिरावट ऐसे समय आई है जब प्राथमिक बाजार रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है।
वित्त वर्ष 26 में 112 कंपनियों ने मुख्य प्लेटफॉर्म के आईपीओ के ज़रिए 1.8 लाख करोड़ रुपये जुटाए, जो वित्त वर्ष 25 में 78 आईपीओ से उगाहे गए 1.62 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है। यह पहली बार है जब भारतीय बाजारों से लगातार दो साल तक रिकॉर्ड धन जुटाया गया है। इसने इस तरह मजबूत आईपीओ वाले साल के बाद सुस्ती वाले के पैटर्न को बदला है।
पूंजी बाजार से जुड़े एक कानूनी विशेषज्ञ ने कहा, अब शीघ्रता से मंजूरी देने के बजाय बारीकी से जांच-पड़ताल पर जोर दिया जा रहा है। कंपनियों और निवेश बैंकरों को नियामकीय सवालों के जवाब देने के लिए पहले के 7 से 10 दिन के समय के मुकाबले अब ज्यादा और उचित समय दिया जा रहा है। पहले मामलों के लंबे समय तक अटके रहने को अच्छा नहीं माना जाता था, लेकिन पिछले एक साल में नियामकीय स्तर पर इस मामले में कुछ नरमी देखने को मिली है।
निवेश बैंकरों ने बताया कि गहन जुड़ाव के बावजूद मंज़ूरी मिलने की समय-सीमा पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। बाजार में एक ही हफ्ते के भीतर 13 मंजूरी मिलीं, जिससे सेबी की मंजूरी देने की तेज़ रफ्तार जाहिर होती है।
सीएमएस इंडसलॉ में पार्टनर कौशिक मुखर्जी ने कहा, कंपनियां अब आईपीओ दस्तावेज तैयार करने में ज्यादा सावधानी बरत रही हैं। वे उन मसलों की पहचान करके उन्हें सुलझा रही हैं जिनकी वजह से पहले उनके आवेदन खारिज हो गए थे। इनमें फंड का इस्तेमाल, कैपिटल स्ट्रक्चर से जुड़ी चिंताएं या डीम्ड पब्लिक ऑफर शामिल हैं। जहां कहीं भी कोई अस्पष्टता होती है, वहां जारीकर्ता अब ज्यादातर गोपनीय तरीके से आवेदन का तरीका अपना रहे हैं, ताकि वे कमियों का पता लगा सकें और नियामक के साथ बातचीत कर सकें।
सेबी का मसौदा दस्तावेजों की प्री-फाइलिंग की अनुमति देने के कदम, जिसका मकसद लचीलापन और गोपनीयता बढ़ाना है, का काफी आकर्षण बढ़ा है, खासकर नई-पीढ़ी की तकनीकी कंपनियों के बीच। प्री-फाइलिंग का यह तरीका, जिसे गोपनीय फाइलिंग भी कहा जाता है, जारीकर्ताओं को शुरुआती चरण में ही संवेदनशील जानकारी रोककर रखने की सुविधा देता है, जिससे आम लोगों के सामने रणनीतिक खुलासों का जोखिम कम हो जाता है।